भूषण-विमश

लेखक -- साहित्य-रकज्ष श्री भगीरथप्रसाद दीक्षित आूतपूब इन्स्पेक्टर आ्रॉव स्कूल्स कोटा, प्रधानाचार्य द्विन्दी विद्यापीठ प्रयाग, साहित्य अ्रन्वेषक नागरीप्रचारिणी सभा“काशी; साहित्य सुधाकर, साहित्य विनोद श्र शिवाबाबनी आदि ग्रन्थों के रवयिता और टीकाकार श्रादि।

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प्रकाशक सरस्वती प्रकाशन मन्दिर

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जाने टाउन, इलाहाबाद

पहल्ला संस्करण | १6७४ [ मूल्य २॥॥|)

प्रकाशक-- सररवती प्रकाशन मन्दिर, ज्ञाजे टाउन, इलाहाबाद

मुद्रक--- पुरुषोत्तम सहाय, सरस्वती प्रेस, भाजं टाउन, इलाहाबा५

प्राकपने

संवत्‌ १६७६ बि० में नागरी प्रचारिणी सभा काशी के तत्वावधान में मैंने ग्सनी, जिला फतहपुर की यात्रा की थी | इस यात्रा का उद्द श' हस्तलिखित पुस्तकों का अ्रन्वेषण करना तथा उनकी रिपोर्ट लेना था पुण्यसल्लिला भागीरथी के किनारे अ्रसनी एक अत्यन्त मनोहर ग्राम है। यहाँ. पर प्राचीम काल से संस्कृत और हिन्दी के विद्वान और कवि होते चले अआये हैं। बादशाह अ्रकबर के दरबारी कबि नरहरि महपात्र यहीं रहते थे | इनके अतिरिक्त ओर भी अनेक कवि इसी नगरी में हुए हैं। झाज भी यहाँ साहित्यिकों की एक श्ररुछी संख्या है। पचासों अपढ़ लोग ऐसे मिल्लेंगे, जिन्हें सैकड़ों कवित्त याद हैं। सम्ध्या के समय हन लोगों का कबिता-पाठ एक अपूव आ्ानन्द देता है। यहाँ मैं और मेरे एक अन्य साथी महीने तक हिन्दी की इस्तलिखित पुस्तकों की पॉटिसे' लेते रहे परन्तु वे समाप्त नहीं हुईं! उनमें सबसे उत्तम संग्रह नरहरि महापात्र के वशज श्रीलालजी महापात्र के पास हैँ | उसी संग्रह में एक पुश्तक मतिरामकृत “कत्त कोमुदी' ( छन्दसार पिंगल) नामक भी थी, जिसके आधार पर ही इस “भूषण विमश” की रचना हुईं है। बृत्त कौमुदी में सतिराम के पिता का नाम, वश, गोन्न श्रादि भूषण के वश, गोत्र श्रौर पिता के नाम से भिन्न है। अतः भूषण ओर मतिरास सहोदर भाई नहीं माने जा सकते इसी विषय को लेकर नागरी प्राचारिणी पत्रिका, भाग अंक में एक विवेचनात्मक/लेख लिखा गया था जो तरकालीन ध्र्णा के नितान्त वियद्ध था इस पर हिन्दी संसार एक बार ही विज्लुब्ध हो उठा। उस ल्लेज़ में कुछ महानुभाषों को एक ऐति- हासिक्‌ मर्यादा इृटती हुई दिखलायी दी | कई विद्वान श्राल्ोचकों ने

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इस लेख के वियद्ध आवाज़ उठायी और इसके खंडन में श्रनेकों लेख प्रकाशित हु: ; परम्तु इन विरोधी लेखों से मुझे बल ही मिला श्रनेकों बातों के ( जो अ्रतुमान पर श्रेवर्लम्बित थीं ) स्पष्ट प्रभाण मिलने लगे | भूषण मतिराम सम्बन्धी खोज और भी ज़ोरों से होने लगी | इसी कार्य के लिए मैंने भूषणं के निवास-त्थांन तिकर्मापुरे की यात्रा फी वहाँ सिवाय खंडदरों के श्र कुछ मिला | हाँ, मंतिरोम॑ के घ'शज गेंगापसाद नमक तजने तिकमापुर से ७-५ भील के अन्तर पर बाद ग्राम, तहसील घाटमंपुर जिला कामपुर में मिलें उनके पास इनकी एक शापली, ग्रांचोम पत्रों पर भूषण के कुछे छन्द, भतिराम के पंच्ती त्िहारी लॉले कंत्रि के कुछ पंत्र श्रौर हन्देल राजा विक्रमशाह तंथा जयपुर नरेश की _्षमदे' मिलीं, जो ब्रिद्वारीलाल के पास थी. उहुत सम्मब है, वे पन्नों भूषण या मतिरामें के लिखे हों। ये ५५ भरे पास सुरक्षित हैं

मैंने राजा बीरबल का बनवायों महादेवजी का मन्दिर और भाग भी देंखा जिसका उल्लेख भूषण ने शिवरा ज-्भूषणु में किया है और जो घाटभपुर-हमीरपुर रोड पर श्रवत्थित है। गजेती में गतिराफ्-नओेः, एंक श्र बंशन मान! जी मित्ते। थे जोग शअ्रपने को बछुए' के तिवारी कहते हैं ति+भापुर से डेढ़-रो मील के श्रन्तर पर रन-बन की भुद्याँ देवी का मन्दिर है। इनके विपय में प्रसिद्ध है. कि पहीं भूषण के पिता रक्षाकर देवी की उपासना किया करते थे। यहाँ बड़ा मन्दिर तो 'नहीं हैं, परन्तु पीछे की बनी मढ़िया श्रवश्य है। पुराना मन्दिर सम्मवत; नष्ट हो गया इसी अ्रन्वेषण का उद्देश्य लेकर मैंने तीसरी यात्रा रीवाँ राज्य की की | वहाँ के दोवान बहादुर पड्ित जानकी प्रसादजी चतुब्ेदी के० स॑|० एस० थआ्राई०, महोदय ने वहाँ का रेकड श्राफिस देखे के लिए दर प्रकार की सुविधा कर दी थी श्रौर पटेहरा ( जहाँ पर हृदयराम के बंशज रहते हूँ ) की यात्रा का भी पूरा प्रबन्ध फरने की कृपा की थी

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तद्थ उन्हें अनेक धन्यवाद हैं| रीबाँराज के इतिहास में हृंदयशाम की जागीर का वशुन भी दिया है शोर यही विवरण रेकर्ड आफिस में भी प्राप्त हुआ जो महाराजा अवधूनसिद ( भूषण के आ्राश्रयदाता ) के पुत्र अजीतर्तिह न॑ सग्रहद कराया था। पठेहरशा में हृदयराम के बंशज कुंवर अ्रवधेश प्रतापभिह श्रोर राजा राभेश्वर प्रतापसिद्द के पास सुरक्रियों की एक बशावली और महजरनामा झ्रांद कई काशञज़ात मिलते, जिनसे भूषण के उपाधिदाता और अ्राश्रयदाता छृदयराम के समय पर भी अच्छा! प्रकाश पड़ता है। रीवॉ-यात्रा में पड़ित अम्बिका प्रसादजी भद्ठ अम्बिकेश?, राजकवि रीवॉ [दरबार से अधिक सद्दायता मिली थी

मुझे पजाब में भी कई मास तक खोज करने का श्रवसर मिल्ला श्रौर वहाँ भी भूषणु-मतिराम सम्बन्धी अ्रच्छी सामग्री मिल्ली थी। पटियाज्ञा स्टेट लाइब्रेरी मं मतिराम कृत 'अलकार पचाशिका' और नारनौल में चिस्तामणि कृत पिगल क॑ शझ्रत्यस्त प्राचीन प्रति तथा मतिराम कृत वृत्त- कोमुदी की दूसरी प्रति, जो अधिक शुद्ध भर अधिक प्राचीन थी, प्रा हुईं इनसे मुझे भूषण शोर मतिराम के बारे भे अनेकों नवीन बातें शात हुई |

चित्रकूट को यात्रा मैंने दो बार की | वहाँ पर मुझे भ्रविक सामग्री तो प्राप्त हुई; परन्तु हृदयराम के वंशज गगारसिंद नास के एक घृद्ध- सज्जन्त श्रम्नश्य मिले जिन्होंने बतलाया कि हृदयरास, सुरक्ियों की भागलपुर बाली शाखा के पृ्बज थे वहाँ से यद्द भी पता चला कि भूषण चित्रकूट-नरेश ब्रसन्‍्तराय सुरकी के दरबार भें भी गये थे जो हृदग्रराम के भतीजे थे बसस्तराय सुरकी की प्रशसा में यह पर्याश भी मिला;

/बसन्तराय सुरकी की कहूँ बाग मुरकी ।”

इसे खोई ( चित्रकूद ) के प्रसिद्ध ब्रह्मचारी रामप्रसादजी ने बतलाया था। 'शिवसिह सरोज? के स्वयिता स्वर्गीय ठाकुर शिवधिंह जी सेंगर के पुस्तकालय का भी मैंने कई मास तक अन्वेघण किया। ये महाशम

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काँथा, ज़िला उन्नाव के निवासी थे। यहाँ भी मुझे कई मास तक रहने का अवसर मिला श्रौर वहाँ हम लोग इस्तलिखित पुस्तकों की नोटिसे लेते रहे | यहाँ से भी एक पुस्तक रतन कवि कृत 'फतह प्रक्नाश” मिली जिसमें भूषण के दो नवीम छन्द मिले | इमका उल्लेख इस पुस्तक में यथास्थान किया गया है। 'शिवसतिंदद सरोज” की रचना मविराम ओर भूषण का इतिहास और चरित्र शुद्ध करने के लिए हैं की गयी थी इससे स्पष्ट है कि जनता भें भूषण-सतिराम विषयक बहुत भ्रान्ति फैली हुई थी। भिनगा राज, ज़िला बहराइच में मुझे कई मास तक पुस्तकों के अन्वेषण के लिए रहना पड़ा था। वहाँ से भी एक छन्द भूषण क़त मिल्ला जो भगवन्तराय खीची की मृत्यु पर उन्होंने लिखा था

इस प्रकार मुझे भूषण सम्बन्धी अ्रन्वेषण में भिन्न-मिन्न स्थानों से अनेक प्रकार की सहायता प्राप्त हुईं, जिनका श्राधार लेकर नागरी प्रचा« रिणी पत्रिका, माधुरी, हिन्दोस्तान, सुधा, मनोरमा, गंगा, भारत, प्रताप, साहित्य इत्यादि पत्न-पत्रिकाशों सें समय-समय पर श्रनेंकों लेख प्रकाशित हुए | इनमें भूषण की जीवन सम्बन्धी घटनाश्रों के भिन्न-भिक्तन- पहलुओं पर बिचार किया गया था | इसके विरोध मे भी छ्षेख प्रकाशित हुए मिनसे विचार करने का और भी श्रवसर मिला और भूषण -विषयक- शान को वृद्धि हुई, तथा सुझे अपने विचारों को श्रागे बढ़ाने के लिए उत्कृष्ट सामग्री मिली। इनमें मुख्यतः स्वर्गीय पंडित मयाशंफरजी याशिक के लेखों से मुझे अ्रत्यन्त' सहायता मिल्ली, जिससे भूषण के बारे भें फैली हुई श्रनेकों भ्रान्तियाँ दूर हो सकी

सभासद बखर में भी भूषण का उल्लेख मिक्षता है। उसमें लिखा है कि भूषण कवि कुमाऊँ इत्यादि पहाड़ी राज्यों का भ्रमण करने के पश्चात्‌ दक्षिण में शिवाजी के पास गये थे | ये बखरे बञमीराव पेशवा के समय अ्रथवा उसके पीछे एकत्रित की गयी थीं इसी प्रकार गुजरात के प्रतिद्ध विद्वात्‌ लेखक स्वर्गीय गोविन्द गिलला भाई ने भी अपनी

( )

शिवराज शतक! नामक पुस्तक में लिखा है कि भूषण ने पहले कुमाओं इत्यादि पहाड़ी स्थानों में भ्रमण किया, फिर वे राजपूताने में घूमकर दक्षिण की ओर गये थे | वास्तव में भूषण शिवाजी के दरबार में नहीं गये थै--शाहू की सेवा भे उपस्थित हुए थे। दक्षिण की दूसरी यात्रा में भूषण संभवतः बाजीरव पेशवा के भाई चिमनाजी (चिन्तामणि) से मिलते थे और उनकी प्रशमा में उन्होंने एक छुन्द भी कहा था |

कुछ लोगों ने चिमनाजी के बारे में लिखा है कि वे शिवाजी के पापदों में से थे। भूषण ने शिवाजी के किसी सरदार की तो प्रशंसा की आर उनका कुछ वर्णन ही किया है। ऐशी दशा में श्रपने से पूब कालीन किसी साधारण व्यक्ति की शिवाजी के समान प्रशसा करना कभो सम्भव नहीं यथार्थ में मूषण ने बाजीराव पेशवा के भाई चिमनाजी की ही प्रशसा की है जिसन गुजरात इत्यादि कई सूबों को बड़ी बीरता से विजय किया था। ये महानुमाव छत्रपति शाहू के मतिद्ध सरदारों से थे और बाजीराब पेशवा क॑ छाटे भाई थे

भूषण की योग्यता के विपय में भी लोगों ने श्रनेक प्रकार के अ्राक्षेप किये हैं। थे श्रात्षेष भी अनुचित हैं। भूषण की उपाधि ही श्राल्नंकारिक और उन्हें सामाजिक और राजमीतिक योग्यता के कारण दी गयी थी। भूषण की भावन! वैदिक श्राधार पर ही असरित हुई थी, अतः भूषण” शब्द में भी हमें वही ध्यनि निकलती हुई जान पड़ती है जो उनकी बल कार सम्बन्धी तथा राजनीति विषयक कार्यकुशलता की परिचायक है। वे वाध्तव में भारतीय समान के भूषण थे

उनकी कविता भी पर्याप्त थी, परन्तु उसमें से अधिकांश लुप्तप्राय है। केवल थोड़ी सी रचनाएँ, ही प्रकाशित हुई हैँ 'शिवतिंद सरोज' में भूषण की रचेनाओ्ों में भूपण हज़ारा, भूषण उल्लास ओर दूषण उल्लास का भी उल्लेख है, परन्तु ये तीनों ही ग्रन्थ श्रप्राप्त हैं। यदि भल्नी प्रकार अन्वेषण किया जाय तो सम्भव है ये प्न्ध, जिनके अन्दर भारतीय समाज

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की श्रपूव॑ विभूति गर्भस्थ है प्राप्त हो जाँय। मद्गाकवि भूषण के ग्रतिरिक्त अन्य श्रनेक उत्तम कवियों की रचनाएं भी खोज में प्राप्त दी सकती हैं। श्रतः धाग्तीय सरकारों श्रौर देशी राज्यों को इस झोर विशेष ध्यान देना चाहिए। मुख्यतः हिन्दी भाषी प्रात्तों में सरकार का ध्यान इस ओर अवश्य जाना धाह्विए | क्‍योंकि यह प्राचीन विभूति दिन-प्रति* दिन नष्ट होती जा रही है, जिसकी पूत्ति होना फिर सम्भव नहीं इनके ग्रन्थों के सशञ्रह के काम में भी तत्परता की श्रावश्यकता है | ऐसे साहित्य से भारतीय इतिहास रचने मे भी बहुत बड़ी सहायता मिल सकती है, क्योंकि बहुधा कवियों ने श्रपने श्राश्रयदाताओं का वर्शन उनकी विजयों और विशेष कार्यो' के साथ किया है। उन रचनाश्रों से सामाजिक जीबन का भी श्राभास मिल जाता है। श्रत। ' हस्तलिखित पुस्तकों का संग्रह देश श्रोर समाज के लिए. श्रवश्य हितकर सिद्ध होगा

विद्वत्प्बर काका कात्ेलकर महोदय ने भूषण सम्बन्धी एक विशेष उल्लेखनीय बात यह बतलायथी कि भूषण सम्बन्धी विवरण बाजीराध पेशवा से पूत्र क्रे साहित्य में नहीं मिलता उनका उल्लेख पेशवा के समकालीन अ्रथवा उनके पीछे फ्रे गन्थों में ही पाया जाता है

कर्माटक के विषय में समाज में कई धारणाएं प्रतलित हैं। आन्ट डफ़ ने स्पष्ट रीति से कर्माव्क को लाई का उल्लेख पूर्वी मदरास फे लिए किया है, जैता भूषण ने वर्णन किया है। परसु दक्षिण में कुछ महाराष्ट्र लोग पूर्वी और प्रश्चिमी दोनों भागों को कर्नाटक के नाम से पुकारते हैं, जिसमें बीजापुर, गोलकु डा, तगीर तथा क्षृष्णा बदी के दक्षिण का पूरा प्राग्त भी माना जाता है। भूषण की रचना से यह बात सष्ठ हो जाती है क़ि कर्नाटक प्रात से उनका आशय पूर्वी भाग से है मर तंज़ौर, जिंजी तंग्रा कृष्णा नदी का द्धिणीपूर्वी भाग है |

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द।-एक सज्जनों ने भूषण की रचना में कुछ दोष दिखलाये हैं। उनका शतांश भी भूषण में नहीं मिलता | तो उन्होंने कहीं श्रश्लील रचना की है, उन्होंने जातीय विद्वेष फैलाने का उद्योग किया है और वे भिखमेंगे ही थे राजदरबारों में जो महान्‌ सम्मान उन्हें प्रेस हुआ था, वहां सका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि वे राष्ट्र के परम उन्नी- यक, समाज सुधारक, संगठनकर्ता और वेदिक धर्म के प्रसारक थे | मेरे बिचार से विध्णुगुप्त चाणक्य के पश्चात्‌ भारत मे दो सहक्ष बर्षों' के भीतर भूषण के समान विभूति उत्पन्न ही नहीं हुई उन्होंने समाज को एक नवीन आदर्श देकर सर्वा गीण उत्थान देने का सफल प्रयक्ष किया था। उनकी कार्यप्रणाली भिन्न-भिन्न मार्गों का अवलम्बन करती हुईं तामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और औद्योगिक उत्थान देने के लिए सतत प्रयक्षशील रहती थी देश में कर्मण्यता, श्रात्मनिर्मरता, सदाचार, कार्यदक्षता, गुणग्राहकता, सलग्नवा और परिश्रम श्रादि सत्‌- शु्ों का अभाव हो गया था। उनके उद्धारक भूषण ही थे। पशधी- आहा में ग्रस्त भारतीय समाज दीन-हीन दशा में केबल ईश्वरीय भरोसे पर आश्रित हो रहा था | उसे भूषण ने ग्रपनी वीररसमयी रचना द्वारा झटके देकर सैनिक ओर सुधारक रूप में ज्ञाकर खड़ा कर दिया था। भूषण के छृदय में जिस प्रकार उपयुक्त सम्पूर्ण गुणों का सम्रावेश था, उसी मकार उनके सन में त्याग, उदारता, निल्हता, परोपकारिता आदि भाव भी जाम्रत हो रहे थे, जिसके प्रभाव से क्रूषण को रचना स्वतोगामिनी श्रौर उनका ग्रताप सब व्यापी हो रहा था ।.“#

भूषण की इस विचार-#ंखला का मूलाधघार भगवान्‌ शिवाजी ये, जिन्होंने औरंगजेब की धर्मान्धता, तश्नस्सुब, मकारी और चालबाक़ियों को खोल कर उनका नान रूप समाज के सम्मुख, खड़ा कर दिया था ओर जो अपनी कार्यकुशलता से उसके बरदृत्साप्राज्य को छित्त-मिश्ष करने में सफल हुए थे | जिस प्रकार शिवाजी मे धार्मिक बिरोध नहीं था उसी

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प्रकार भूषण में भी नाममात्र को धर्मान्धता थी | महाकवि भूषण ने शिवाजी के इसी श्रादर्श को सप्ताज के सम्मुख रफ्खा और उन्हीं के अनुकरण पर औरंगजेबी अ्रध्याचार को दबाने के लिए भारतीय समाज का संगठन किया; जिसका प्रत्यक् फल यह हुआ कि भूषण के जीवन- काल में ही मुग़लिया साम्राज्य छित्त-मिन्न हो गया था श्रीर राष्ट्र का एक स्पष्ट ध्वरूप सब के सामने धृष्टिगोचर हो रहा था ! भूषण को इस महत्ता को श्रभी तक हिन्दी-भाषियों ने अ्रनुभव ही महीं कर पाया है

भूषण की रचना और उनके कार्यो' पर इस पुस्तक में विवेचना- त्मक दृष्टि से विचार किया गया है। यदि देश ओर समाज ने इसके द्वारा कुछ भी जागरण अमतुमव किया और उसकी प्रगति में इससे कुछ भी सहायता मिली तो मैं भ्रपने जीवन को सार्थक और अपने परिश्रम को सफल समभ्ूगा।

इस पुस्तक के रचने में मुझे जिन-जिन प्रन्‍्थों शोर पत्र-पन्षिकाश्रों से सहायता मिली है, उनके लेखकों श्रौर सम्पादकों के प्रति में कतझता प्रकट करता हूँ | मुख्यतः मित्रदर साहित्यरत्ञ पंडित उदयनारशयण नी तनिपाठी, एम० ए० ने इस पुस्तक के सम्पादन तथा प्रूफ देखने में प्त्यत्त सहायता प्रदान की है, तदथ उन्हें हार्दिक धन्यवाद है। श्रन्त में परमात्मा से प्रार्थना है' कि बह देश और समाज को सत्पय का श्रनुगामी बनावे जिससे भारत एक राष्ट्र के रूप में संगठित हो सके विशेष किमधिकम्‌ |

विद्यामन्दिर, लखनऊ निवेदक विजय दशमी, १६६५ बि० भगीरथप्रसाद' दीक्षित

विषय-सूची

प्राक्षयन का प्रृ० १--है. १--भूषणु का जीवन-चरिन्न :-- १-१४ भ्रान्तियाँ ( जीवन सम्बन्धी ) असली नाम भूषण का जन्म-काल ( श्र ) भूषण और मतिराम ( ) मतिराम के आश्रयदाता श्रौर उनकी रचानाएं.. £ (स) भूषण अ्रौर मतिराम की सम-सामयिकता 5६

|गि 4 6७८ «5

(द ) भूषण श्र मतिराम का बन्धुत्व॒.,.. १६ चिन्तामणि भ्रौर नीलकेठ मी १६ भूषण की जन्म-भूमि और निवास-स्थान ... २६ भूषणकालीन परिस्थिति बडे श्८

२--शिवराजभूपण का निर्माण-काल ३४-३० शिवा बावनी थक ४७ छुदयराम का समय-निरुपण हे ४७

३-- ऐतिहासिक विवेचन ;--- ६१--५८१

शिवराजभूषण में निर्माशकाल के पीछे की घटनाएं... ६१ कर्नाटक की चढ़ाई हब ६१

( २१ )

भड़ोंच पर श्राक्रमण रा ६७ रामनगर विजय 0ह ६६ बहादुर ख्नाँ ( खानेजहों ) कम ७० दिल्लेर खाँ ५०० ७३ रायगढ़ और सितारा डा ७४ भूषण के सम्मुख घटित घटनाओं का अ्रभाव ७७ शब्द-साक्ष्य 2 ७६ ४--भूपण के आश्रयदाता ।--- ८१--१४४२

मोरग द्रबार और कुमाऊँ नरेश' उद्योतवन्द प्र श्रीनगर ( गढ़वाल ) नरेश फ़तहशाह ... ष्प रीबॉ-नरेश अवधूत सिह ६० राजपूताने का भ्रमण 5 8 ( श्र) जयपुर, (ब ) जोघपु/ ( ) उदयपुर दरबार

दक्षिण की यात्रा की 8७ ( श्र ) छत्रपति शाह से भेट जप श्प ( ) बाजीराव पेशवा से भेट शा १०० दिल्ली नरेश जहाँदारशाह का १०२ बूंदी नरेश बुद्धसि १४४ मैंढ़् नरेश अनिरद्ध सिह गन १०७ श्रसोथर नरेश भगवन्तराय खीची. ,,, १०९६

( ) छत्रपति छत्रसाल फी सहायता... ११५ (ये ) खिमनाजी से सेट ११६

(स॑ ) बंगस युद्ध मर ११७

(द ) छत्नसाल-भूषण मिलन शो ११८

अश्रयदाताश्रों की सूची *+« ११० ((--भूषण और शिवाजी :-- १२३--१३०

शजाश्रों के संगठन का कारण | १२६ €६--भूषण की विशेषताएँ :-- १३०---१९४७

भाषा पर विचार ही १३०

(श्र ) भूषण की शैली दे १३६

( ) विवेचनात्मक शैली हर १४२

((स) संश्लिष्ट शैली कल १३४४

( ) शैली की विशेषताएं हि १४५,

[रस निरूपण शत १४४

भूषण को श्रालकारिकता मा १६०

(क्र) भूषण की रचना में वैदिक भावना १६५८८

( वे , वैदिक उपाधना' १७१

धीर रस का विकास और भूषण २४७ १७६

हग्र) तुलनात्मक आलोचना कर श्छ्प

( ) 'शिंवराज भूषण” में विम्ब-्प्रतिबिम्ब भाथ १६६

भूषण की रचना में मोलिकता ८६ ७--समभाज-सछुधार की योजना १६४--२१२

विवाह का आादश रे १६४

वर्णू-व्यवस्था सम्बन्धी सुधार मल २०१

( )

भूषण में मेल की भावना 5६ २०४

उत्साह और साहस की भावना २०६

नीति वर्णन ५५० २११

-आक्तेपों का उत्तर ;-- २११--२४४

क्या भूषण मिखभंगे थे ! मन २१३

अश्लीलता का श्रारोप ! हम ५१८

जाति-विद्वेष का आज्लेप धर २२३

म्तेच्छ और तुक शब्द का प्रयोग. ,.. श्श्प्

मध्यदेश पर श्रारोप किक २३४३

ऐतिहासिक श्राक्षेप मर २४४

भूषण और भठेती डे २४७

'मूषण को राष्ट्रीयता के श्श्फ

९--उपसंहार 4-- २४६--१५७८

१०--परिशिष्ट सवायी जयसिंह |. #&.« २४९--२४९१ै

११--सहायक म्नन्‍्थों की सूची :-.. .... २४२--२४५४ १ए--नामातुकमशणिका -- के २४६--२७२

भूषण-विमशे

शक > ८773 3 चक० ६7---->->मुम मल

१--भूषण का जीवन-चरितश्र भ्रान्तियाँ

भारतीय इतिहास श्रान्त-भरित भावों का भाण्डार बना हुआ है। अन्वेषण ने यद्यपि अनेक अ्रमपूर्ण बातों एवम्‌ धारणाओं “की हटाकर इतिहास का परिष्कृत रूप प्रत्यक्ष कर दिया है, परन्तु विद्वानों का ध्यान राजनीतिक घटना-चक्र। और राजबंशों की ओर ही अधिक आकर्षित हुआ है; कवियों की ओर उन्होंने विशेष ध्यान ही नहीं दिया | |

समाज में राजवीतिक क्रान्ति की अपेक्षा साहित्यिक क्रान्ति, अधिक महत्वपूर्ण एवम्‌ स्थायी होती है। उदाहरण के लिए, गोस्थामी तुलसीदास ने द्िन्दू सभाज को जा जीवन अदान किया है, बहू इतना प्रभावशाल्ली और अमिट है कि सूर्यवत्त अपमे ग़काश से अखिल भारतवष का देदीप्यमान कर रहाहै। इसी धफार महाकबि भूषण ने अपनी रचना द्वारा जो राजनीतिक

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क्रान्ति की थी, वह समाज का मस्तक आज भी ७न्नत किये हुए है | उसमे हिन्दू जाति में एक विलक्षण स्फूति, नवजीवन-ज्योत्ति एवम्‌ जाग्रति उत्पन्न कर दी थी। परन्तु जब ऐसे महान व्यक्तियों का जीवन-चरित्न ही भ्रमपूर्ण बातो से परिपूर्ण है, तब वृसरों के विषय में कया कहना !

ठाकुर शिवसिंद जी सेंगर ते अपने 'शिवसिंह सरोज” की भूमिका के प्रारम्भ में ही लिखा हे :---

“मैंने रम्बतू १६३३ विक्रमी में भांपा-क्रषियों के जीवन-चरिक्र' सम्बन्धी एक दो ग्रन्प ऐसे देखे जिनमें ग्रन्थकत्तों ने मतिराम श्ध्यादि ब्राह्मणों को लिखा था कि वे असनी के महापात्र भाद हैं। यह सब बाते देखकर मुझसे चुप रहा गया। मैंने सोचा, अभ कोई ऐसा ग्रन्थ बनना चाहिए, जिसमें आचीम और श्रर्वाचीन कवियों का' जीवन-चरित्र सन्‌, सम्बत्‌, जाति, मिवास-स्थान, कंग्रिता के प्रन्‍्थी समेत वित्तारपृष लिखा हो ॥?&

इससे स्पष्ट है कि आज से पचास-साठ वर्ष पूबे से ही भूषण- मतिराम आदि कवियों के सम्बन्ध में बहुत ही अशुद्ध आ्रान्तियाँ "फैली हुई' थीं। अनुसन्धान द्वारा इन आब्तियों करे निराकरण का प्रयत्ञ तो दूर रहा, इधर कई लेखकों ने तो भूषण के चरिभ्न पर भी भिन्न-भिन्न प्रकार के घुरित आज्षेप आरोपित करके उन्हें ज़ातीय विद्वेष फैलाने वाला, कामुक और लोलुप तक कह ढाक्षा

४7 णएंथए्ा७ाााााा4 2८ ताक 7923 मम जड जहि मल ललकिक कपल कम नल सन अतभाहल

( )

है भूषण सम्बन्धी अनेक किम्बदन्तियाँ है, जो उनके जीवन-चरित्र को अन्धकार में डाले हुए हैं | एक ही बात भिन्न-भिन्न रीति से कही जाती है। एक सज्जन अपने 'शिवराजभूषण” की भूमिका प्रष्ठ पर, बंगवासी प्रेम में छपी 'शिवाबावनी' का आधार लेकर चिन्तामणिण का जन्म सम्बत्‌ १६४८ झोर भूषण का सम्बत्‌ १६७९ बवि० मानते हैं. किन्तु हिन्दी नवरत्र” में भूषण का जन्म सम्बत्‌ १६९२ वि० लिखा गया है

एक दूसरे सब्जन उनका साहू के द्रबार में जाना तक स्वीकार नहीं करते 'शिवराजभुषण” के निौ|ण-काल पर भी आपका गहरा मतभेद हे। इसी प्रकार उनके भाइयों के सस्वन्ध सें भी हिन्दी साहित्य के विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत हैं लोगों को महद्दा- कवि भूषण के असली नाम तक का पता नहीं है। उनका मूल निवास किस स्थान पर था; उसका जन्म काल कया था, उनके कौन-कोन भाई थे; किस-क्रिन परिस्थितियों में रहकर उन्होंने अपनी रचना द्वारा देश में नवजीवन-संचार किया था, उनका शिक्षाजी से क्‍या सम्बन्ध था; साधारण जनता पर उनकी रचन( 'का क्‍या प्रभाव पड़ा था; राजाओं को किस प्रकार श्रोट्साहित करके उन्होंने उन्हें संगठित किया था; शिवाजी को ही उन्होंने अपला आदर्श क्‍यों मांना था; उनके फौन-कोन आश्रयदाता थे तथा संगठन में पूर्णरूप से सफलत्ता प्राप्त करने के लिए, इस भद्दाकवि को क्या-क्या भगीरथ प्रयत्न करने पड़े थे--इन बातों

( )9 की विवेचना का प्रयत्न वैज्ञानिक ढंग से श्रब तक विद्वानों से नहीं किया |

असली नाम

'भूषण! कवि का नाम नहीं है, उपनाम है। इनका असली नाम क्या है इसका ठीक-ठीक पता अभी तक बिद्गवानों को नहीं ज्ञग सका है |

सम्बत १९८५ बि० के श्रावण मास के विशालभारत के एक लेख में इनका नाम पतिराम' बताया गया है, जो कि मतिशाम के वजन पर ही लिखा गया प्रतीत होता है'। मतिराम वास्तव में भूषण के सहांदर भाई थे, जैसा कि आगे चल कर घतलाथा गया है। मेरा अ्रतुभान है कि भूषण का असली नाम “सनिरास”? था पहले मेरा अनुमान यह थ| कि जटाशंकर ही भूषण ह्ला असली नाम हे, जैसा कि मैंने जुल्लाई १६३२ ३० की हिन्दुस्तानी पत्रिका में संकेत किया था, परन्तु इधर पंडित 'बद्रीद्त जी पाण्डेय कृत 'कुमाओं के इतिहास में बरणित एक घटना से मुझे अपना पूषे अनुमान बदलना पड़ा इस इतिहास में राजा उ््योतचन्द का वणुन करत हुए खऊ ने लिखा है---

“सितारागढ़ नरेश साहू महाराज के राज फ्त्रि 'मतिशम! राजा के पास अलमेड़ा आये थे। उन्होने राजा की प्रशंमा में यह कवषित्त बनाकर सुताथा था। राजा ने दूस हजार रुपये तथा एक हाथा इनाम से दिया ।* '

( )

धह छुन्द इस प्रकार है ;-- पुराण पुरुष के परम हग दोऊ अरहैं, .»-कहत वेद घानी थों पढ़ गईं, ये दिवसपति थे निस्रापति जोतकर हैं, काहू क्री बढ़ाई बढ़ाये ते बढ़ गई; सूरम के धर में करण महादानो भयो, यहे सोचि-मम्मुझि चिते चिन्ता मदि गई, अब तोहि राज बेठत उदोतचन्द चन्द* के, करण की किरक करने सों कह़ि गई | इस छुन्द में क्रिसी कर्बि का नाम नहा है। परन्तु प्रथम चरण में तीन अक्षर कम है। सूषण नाम में भी तीन ही अक्षर है, झतः यह कहना अनुचित होगा कि इस रिक्त स्थान पर से अमवश भूषण नाम ही उड़ गया है ) इसके अतिरिक्त सितारश- नरेश साहू महाराज के राजकषि भूषण ही थे ओर कोई दूसरा हिन्दी कवि उनके दरबार से था। आयः सभी बिद्वानों ते इस बात को स्वीकार क्रिया है कि!भूपण! तथा 'मतिराम' उद्योत्चन्द्‌ के दरबार में गये थे | छन्द्‌ की रचना-रोली ओर शब्द-विन्यास पर ध्यान देने से भी थद्दी प्रमाणित होता हे कि यह छन्द भूषण का ही है। ये

हि नशा ताज डटलि जज

नकुमाऊ का इतिहास १० ४०३ ,

( )

महाकवि वैदिक संस्कृति तथा भावना के पक्षापती थे साथ ही ऐेतिहासिक-विवेचल-पद्धति भी उनकी रचना फी एक विशेषता थी। इसी प्रकार पौराणिक विचारों को भी थे सदैव नवीन रूप में ही उपस्थित किया करते थे। इन सब बातों का आभास उनकी कविता में मिलता हे और वह इस छन्द में भी स्पष्ठ रूप से भलक रहा है। यत्र-तत्र उसमें शक्षेप ओर अ्रन्योक्ति का पुट भी मिला रहता है ओर बह आपको यहाँ भी दिखल्ायी देगा | श्रतः स्वाभाविक रूप से कहा ज्ञा सकता है कि यह छन्‍्द' महाकवि भूषण का ही है; अन्य किसी कवि का नहीं और मनिराम ही भूषण का असली नाम है

यहाँ पर तुलना के लिए 'फतह प्रक्राश' से भूषण क्षत्त छन्द उद्धुत है, जो श्रीनगर नरेश फतहशाह की प्रशंसा में ऊपर लिखे छन्द्‌ के कुछ समय बाद ही रचा गया है'। मह्दाकीव भूषण कुमाऊ से प्रस्थान कर श्रीमगर ( गढ़वाक्ष ) के दरबार में गये थे |

वह छन्द्‌ यह है| ।-- देधता को पति नीको पतिनी शिवा को हर, श्रीपति तीरथ पिरथ पर आनिषो, परम धरम को है सेहबो ब्रत भेभ, भोग को सेजोग प्रिशुवन जोग भानियों 3

( ) “भूषनं कंहा भगति ने कनक मनि ताते, दिपति कहा वियोग सोग ने बखानियों। सभ्पति कहा सनेह ने गथ गाहिरो सुख

कह निरखिबोई सुकुति मानियों ॥&

इत दोनों छुन्दों पर घिचार करने से विदित होता है कि दोनों में पौराणिक भावना एक सी ही हो। इन्द्र ओर शिव की महत्ता बतल्ञाते हुए तीर्थों का श्रमण, ब्रत, मेम आदि निरथंक कह! गया हे। इस छुन्द' के अन्तिम चरण में यह भी बत- लाया गया है कि अगर गहरा ग्रेम नहीं है, तो सम्पत्ति व्यर्थ की वरतु है; केवल सुख ही मोक्ष नहीं हे। इस छन्द में भी भूषण की बेदिक भावना स्पष्ट सल्षक रही है। साथ ही उनका संकेत उद्योत्चन्द्‌ के दिये दान को त्यागने की ओर भी है, जैसा कि 'किम्बदन्ती रूप में हिन्दी जगत में प्रसिद्ध है। इस छुन्द द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्त करता भीं एक भुझ्य कार्य बतलाया गया दे प्रथम छन्‍्द की भांति इस छन्द्‌ में भी श्लेष का पुट स्पष्ट प्रतीत होता है

बक्त दोनों छनन्‍्दों की शेली, भाषना ओर शब्द-व्यंजना भी पक सी ही है। अतः वक्त प्रथम छन्द्‌ को भूषण कृत मानने में हमें कुछ भी हिचकिचाहठ नहीं है | ऐसी दशा में यह भी मानना 'घड़ेगा कि 'सनिराम! ही महाकथि भूषण का असली नाम हे

#फतद् प्रकाश, संग ४, छुन्द १६४

( )

और भूषण उतकी उपाधि है | ऐतिहासिक प्रमाण, समय, रचना--सब इस एक ही बात की साक्षी दे रहे है

भूषण का जन्म-काल

भूषण के जन्मकाल पर हिन्दी संसार में घोर मतभेद है। किसी ने इनका जन्मकाल सं० १६७२ वि०, तो किसी से सं० १६७२ वि० माना है! मिश्रबन्धु महोदय “हिन्दी नवस्त्र! तथा 'मिश्रबन्धु विनोद! में इनका समय सं० १६७२० वि० ही मानते है परन्तु ठाकुर शिवसिंह सेंगर अपने "“स्रोज*” में चिन्तामरित का जन्म समय सं० १७२९ वि० और भूषण का णन्मकाल सं० १७१८ वि० लिखते हैं। काँथा ( ठाकुर शिवसिंद् सेंगर की जन्मसूमि ) तिकमापुर ( भूषण का निवास स्थास ) से १५०२७ मील के ही अन्तर पर है। साहित्य के इतिहासों में उन्‍हें भूषण- मतिराम सम्बन्धी अशुद्धियाँ बहुत खटकी थीं। इसका स्पष्ट उल्लेख उन्होने 'सरोज” की भूमिका में किया है; इसलिए उसका दिया हुआ समय अधिक शुद्ध मानना पड़ेगा। वास्तव में (शिविंह सरोज! की सवना ही भूषण-मतिराप्त फे जीवन चरित्र फो संशोधित कर परिष्कृत रूप देने के लिए हुईं है। इससे प्रतीत होता है. कि 'सरोज' में दिया गया भूषण तथा चिन्तामणि का यह, जन्मकाल अन्य विद्वानों की अपेक्षा अधिक शुद्ध हे

साथ ही उनके कविता-काल, आश्रयदाता, उपाधिदाता तथ

पश+यीवयपन्कत- 7 कन्या, 7 *००१*+कन्फ जड़ «७ 7०१० फ०फफ- कुछ. फ्त या

#शिवहिंह सरोज प(० ४६७

कि,

अन्य कार्या' तथा रचनाओं से भी इसी बात की पुष्टि होती है कि भूषण का यह जन्मकाल नितानत शद्ध और ऐतिहासिक घटना-चक्रों के अनुरूप है'। इसके लिए सब प्रथम इस बात पर बिचार कर लेना अत्यन्त आवश्यक है कि भूषण, मतिराम, चिन्तामशि तथा त्तीलक॑ठ में परस्पर क्‍या सम्बन्ध था !

भूषण और मसतिराम

जनश्रुति और कुछ लेखकों के श्रम के कारण भूपण-मतति- राम भाई भाई माने जाते है उनके समय आदि के बारे में भी गहरा मतसेद है। तजकिरए सब आज़ाद, वंश भास्कर, शिव- सिंद्द सरोज, मिश्रबन्धु-विनोद, साहित्य का इतिहास आदि अनेकों ग्रन्थों में यह्‌ श्र भरा हुआ हैं। अतः भूषणार्मातराम के भनिरूपण एवं बन्धुत्व सम्बन्धी अ्रान्तियों पर विवेचनात्मक हँपि डालना युक्ति-युक्त प्रतीत होता है

मतिराम के आश्रय-दाता तथा उनकी रचनाएँ

महा[कवि सतिराम का समय रहीम काल से प्रारम्भ होता है। उनकी जो सबसे प्रथम रचना प्राप्त हुईं है, उसमें रहीम के बरवै नायका भेद्‌ पर लक्षण पाये जाते है। रहीम का शरीरान्त संबत्‌ १६८४ घि० में हुआ था। उस समय उनकी अवस्था ७२ बष की थी 'बरबे नाथका भेद! यदि रहीम ने ४०-४५ बे की अवस्था में भी लिखा हो तो यह रचना संबत्‌ १६४४ वि० के लगभग ठददरती है सम्भवतः उसके ४-५ बष पीछे सतिराम ने उस पर

( १० )

लक्षण लिखे होंगे। अतः उनकी यह अरधम रचना संघंत्‌ १६६० बि० के आस-पास की होगी। यदि उस समय मतिराम की अवस्था ३० वर्ष की भी समान ली जाय तो उनका जन्म संचत्त्‌ १६३० बवि० पड़ता है। लक्षण लिखने के ४-५ वर्ष पीछे ही खान- खाता द्वारा वे बादशाह जहाँगीर के दरबार में उपस्थित हुए होंगे अतः फूलमझ्तरी का रचनाःकाल संवत्‌ १६६४ वि० के समीप पड़ता है। प॑० क्रष्ण बिहारी जी मिश्र मतिराम' भप्रत्थावल्ी की भूमिका में फूलमझरी का रचना--काल संबत्‌ १६७८ वि०

मानते हैं। यह ठीक प्रतीन नहीं होता, क्योंकि उस सभय तो रहीम पर ही जहाँगीर की वक्र दृष्टि थी। ऐसी दशा में उनके आश्रित कवि पर बादशाह हारा उदारता प्रकंद की जाने फी बात दरबारी ढेगों के अनुकूल नहीं जान पड़ती !

इनके अतिरिक्त मतिराम के निम्नलिखित अन्ध और पाये जाते हैं:-( १) रसराज (२) ललित लत्ाम ( 8 ) भमतिशम सतसई (४) साहित्य सार ४) लक्षण खंगार ( ६) छुन्द सार पिगल ( बृत्त कौमुदी ) ( ७) अलंकार पचाशिका |

इनमें से न॑० १, के प्रन्थ प्रकाशित भी हो चुके हैं इन अन्धों में से ललित कलाम बूंदी नरेश भाऊसिह के आश्रय में संबत्‌ १७१४-३८ वि० के बीच किसी समय और मतिराम सतसई किन्हीं राजा भोगनाथ के लिए रची गयी है। अलकार पंचाशिका का निर्माण कुमाओँ के राजकुमार ज्ञानचन्द्र फे लिए संबत्‌ १७४७ बि० सें ओर छन्द्सार पिंगल का निर्माण छुण्डार

( ११ ) पति स्वरूपसिंह बुन्देला के अथे संबत्‌ १७५घ८ वि० में हुआ था ; शेष ग्रन्थों फा रचना-काक्ष अज्ञात है पं० कृष्ण बिहारी जी मिश्र ने मतिराम का एक छुन्द भगषंत राय खीची के लिए भी रचा हुआ प्रकाशित किया है वह छन्द्‌ यह है! -- दिल्ली के अमीर दिरली पति सों कहत वीर, दक्खिन की फौज लेके सिंहल दबाइहों। जाइती जनजमेन की जेर के सुमेर हू लीं, सम्पति कुबेर के खजाने ते कढ़ाइहों | कहे 'मतिरास! लंकंपति हू के धाम जाई, जंग जुर जमहँ कों लोह सो बनाइही। आगि में गिरंगे कूदि कूप में परंगे एक, भ्रूप भगवंत की मुहीम पे जाइहों # असोथर नरेश भगवन्तराय खीची का समय संबत्‌ १७७० बि० से संबत्‌ १७९२ बि० तक है। इनमें से उनका स॒त्यु समय संबत्‌ १७८२ निश्चित है, क्‍योंकि इसी संबत्‌ में वे सहादत खाँ से थुद्ध करते हुए मारे गये थे।। भगवन्तराय खीची एक साधारण जमींदार के लड़के थे और अपने बाहुबल द्वारा एक

न्‍न्‍ननताओॉक-वयान. नमन फू ऑलजलाताफ-+ “७. अनथ अपस्कात- 3-8७ अप त-पफऊ--+ कर ५० अनननाााता--. जन जा करी /नमकनननन «नम

# साधुरी ज्येष्ठ, संचत १६८१ बि० * भागरी प्रचारिणी पश्षिका, साग < श्रंक

( १५ ) विशाल राज्य के अधिपति हो गये थे | अतः उक्त छन्द में बणित द्शा संबत्‌ १७८४ वि० के पश्चात्‌ की ही हो सकती है, जब उन्होंने फोड़ा जहानाबाद के सूबेदार को मारकर वहाँ का राज्य हस्तगत कर लिया था। इसी अनुमान पर उक्त छनन्‍्द का समय निर्धारित किया जा सकता है। मतिराम ने “लतित ललाम” में एक छन्द यह भी लिखा है ओरंग दारा जुरे दोऊ जुद्ध, भए भट क्रुद्ध बिनोद बिलासी | मारू बने मतिराम बखाने, भई अति अख्ननि की बरखा सी | नाथ तने तिहि ठौर भिरथौ, जिय जानिके छत्रिन को रम कासी | सीस भयो हर हार सुमेरु,

छता भयो आपु सुमेरु की बासी ।$

इसी प्रकार लक्षित जत्ञाम के छन्द्‌ न॑० १९४, २६० भादि

में बड़े सम्मान के साथ बूंदी राजकुमार ग्ोपीनाथ फो "नाथ

कहकर सम्बोधन किया गया है। इनके अतिरिक्त 'लक्षित लताम'

के छुन्द नम्बर ३० में गोपीनाथ की, जो प्रशंसा फी गयी है, उससे

यही अनुमान होता है कि ये महाशय महाराजा भाऊसिंह के कल ले 0422 कि, कलम कप कस 5 कल

९+ &7+%-/वी% पक आ+ 53. नी) नर+नफानाआ ॥सन

# जद्ित जलाम, छुन्द ३३

( ९३ 9

पिता महाराज कुमार मोपीनाथ के भी आश्रय में रहे हॉंगे। परन्तु हाड़ा छन्नशाल के समय में मतिराम का बंदी में रहने का कुछ प्रभाण नहीं मिलवा सम्भव है, इस समय सम्मान कम होने अथवा अन्य कारण से थे वहाँ से चले आये,हों और भाऊसिंह के सिंहासनारूढ़ होने पर फिर बूंदी चले गये हों

छुन्द्‌ सार पिंगल में अपने आश्रयदाताओं का वर्णन करते हुए मतिराम ने एक छन्द्‌ लिखा हैं. जो नीचे दिया जाता है :---

दाता एक जेसो शिवराज भयो तेसों अब, फ्तेसाहि सीनगर साहिबी समाज है जैेसो चित्तोर धनी रामा नरनाह भयो, तैसोई कुमाऊं पति पूरो रजलाज है। जेसे जयसिंह जसघन्त महाराज भए, मिनको मही में अनों बढ्यो बल साज है | मित्र साहिनन्द सी बुन्देल कुल चन्द जग, ऐसी अब उदित स्वरूप महाराज है ।&

इस छुन्द में मतिराम ने अपने तीन आश्रय-दात्ताओं का उल्लेख किया है;--( १) श्रीनगर ( गढ़वाल ) नरेश फतहसाह, (२) कुमाऊ पति उद्योत्चन्द ज्ञानवन्द और (३ ) कुडार

७93०... ॑र अनम«ममीनी रीता... अमम«>«% अमर 4-3.

जी ना जभखझज हज आया

# लत्त कोमुदी, सर्ग

( ९१४ )

अधीश्वर स्वरूपसिंह बुन्देशा इस प्रकार मतिराम् के आश्षय- दाता मिम्नक्षिखित ठद्दरते है. !--

( ) अ्रब्दुल रहीम खासखाना ( रहीम कि ) सं० १६१३ ब्रि: से १६८४ बि० तक

(२) बादशाह जहाँगीर, सं० १६६२ वि० से १६८४ वि० तक

(३ ) राजकुमार गोपीनाथ बूंदी, सं० १६८८ धि० से पूछ्र

(४) महाराज भाऊसिंह ( बूँदी नरेश ) स॑ं० १७१४ वि० से १७३८ वि? तक

(४ ) राजा भोगनाथ

(६ ) फतह॒शाह ( श्रीत्षगर नरेश ) सं० १५४१ से सं० १७७३. बि० तक

(७) उद्योतचन्द्र ज्ञानचन्द्र ( छुमाऊ पति ) सं० १५४४ बवि० से १७६५ घि० तक

(८ ) कुंदार पति रप्ररूपसिद् बुन्वेज्ञा, सं? ९०४ पि० फे. लगभग

(6 ) भगबन्तराय खीची ( असोथर नरेश ) सं० १९७७० घि० से १७९२ वि० तक

ऊपर की सूची ओर छन्दों पर विचार करने से जात होता है कि सतिराम का फविता समय सं० १६६० से प्रारम्भ होकर सं० १७६० थि० तक पहुँचता है। इस १३० वर्ष के दीध काल तक एक कथि कदापि रचसा नहीं कर सकता अतः अवश्य दो मतिराम हुए हैं। 'त़जित लताम' प्रन्थ भ्राऊर्सिद्द के आश्रय में:

( १४ ) रह कर रचा गया है; वह अधूरा है। उसमें स॑० १७१८-१७१९ बि० तक की ही घटनाएँ आयी हैं। अतः अलुमान होता है कि प्रथम मतिराम का समय सं० ९६६० वि० से सं० १७१६७ बि० तक था| रसराज़, लतित लल्ाम और मतिराम सतसई के छन्द एक दूसरे में ओतग्रोत हैं। भाषां और शैली भी मिलती हुई है। अतः ये तीनों एक ही कवि की रचना हैं मतिराम अन्धावली के सम्पादक महोदय ने उक्त भ्न्ध की भूमिका पृष्ठ २२३ पर फतहशाहू का समय स॑० १७०० से १७१० बि० रखा है ज्ञात नहीं इसका उनके पास क्या आधार है। गढ़- चाल पति* फतहशाह का समय गढ़वाल गज्ेटियर में सं० १७४१ वि० से १७७३ वि० तक निश्चित्‌ है। इस पर हम आगे चलकर विशेष रूप से विचार करेंगे स॑० १७१९ वि० तथा १७४७ वि० के बीच का कोई अ्न्थ भति- राम का रचा नहीं मिला, इससे यही प्रतीत होता है कि प्रथम पाँच संज्नन--रहीम, जहाँगीर, गोपीनाथ, भाऊसिंह और भोगचन्द्‌-- ये प्रथम मतिराम के आश्रयदाता थे और उद्योतचन्द्र, ज्लानचन्द्र फतहदशाह, स्वरूपसिंह बुन्देला और भगवन्तराय खीची--ये पाँच आश्रयदाता दूसरे मतिशम के थे। इनमें से प्रथम चार का उल्लेख वृत्तकफोसुदी के उक्त छन्द में गया है। भगवस्तराय खीची के दरबार में मतिशम पीछे गये थे, अतः उनका उल्लेख इस छुन्द में नहीं किप्रा गया यहाँ इस बात की चर्चा करना भी असंगत नहीं

२5 कारक नमन नमन _+45५4-५क कक वतन वननिनानान मी नानक नी ती+ 3० मम आनआान नाम ऊना नौत पाप सन पकैत-फ पर पक आता पी कक का पता अकी कप अर पाया सा. 3.५8. +-+कानआआ5५क+९3#++७.७3/३)७५+--ककन नाना; मरनन

$ गढ़वाल्ल ग़ज़ेदियर, पु० ११८

( १६ )

है कि दोनों कवियों की रचनाओं में बहुत अन्तर है | भापा और शैल्ली दोनों में ही विभिशन्नता पायी जाती है। इस प्रकार दो भिन्न मतिरामों का होना निश्चित और प्रमाण-सिद्ध प्रतीव होता है

भूषण और सतिराम की सम-सामयिकता

महाकाव भूषण और मतिराम के आश्रयदाताभों पर विचार करने से ज्ञात होता है कि प्रथम' मतिराम के आश्रयवाताश्रों ( रहीम, जहाँगार, गोपीनाथ, भाऊर्सिह और भोगमाथ ) में से भूषण का एक भी आशभ्रयदाता नहीं है ओर उतकी भ्रशंसा का कोई छुन्द ही मिलना है। इसके विरुद्ध दूसरे मतिराम के पाँच आश्रयवाताओं ( ) जद्योतवन्द्र, ज्ञानचन्द्र, ( ३) फतह शाह, (४) स्वरूपसिंह, बुन्देता और (४५) भगवन्तराय खीची--में से उ>तचन्द्र, ज्ञानचन्द्र, फतहशाह और भगवनन्‍्तराय खीची, ये चार भूपण के भी शआश्रयदाता है। अते। यह निश्चित से कहा जा सकता है कि द्वितीय मतिरशम ही भपण के समकालीन थे, प्रथम नहीं; जैसा कि विहारीक्षात्ष कषि से भी इन दोनों को सम सामयिक लिखा है

भूषण और ग्रतिराम का बन्धुत्व

सतिराम कृत छुन्द सार पिंगत्न (बृत्त कौमुदी ) की हस्त- लिखित <तियाँ लाज्ञ कवि महापान्न ( नरहरि कवि के बशज ) असनी+#, जिल। फतहपुर निवासी और पं० भवानीप्रसाद शर्मा

# खाज रिपोर्ट सन्‌ १६२००२२ नं० ११४

( ९७ ) नारनौल, राज्य पथ्टियालानिवासी के पास प्रस्तुत हैं, जिनका उल्लेख खोज-रिपोर्टों में भी चुका है | इसमें मतिराम का बंश- परिचय इस प्रकार दिया है :-- तिरपाठी बनपुर बसें, वत्स गोन्न सुनि गेह ; विवुध चक्रमणि पुत्र तहँ, गिरिधर गिरिधर देह ।२१ भूसि देव बलभद्र हुवब, तिनहिं तनुज् मुनि गान ; मंडित पंडित मंठली, मंडन मही महान ।२२ तिनके तनय उदार मति, विश्वनाथ हुव नाम ; दुतिधर श्रुतिधर को अनुज, सकल गुननि को धाम ।२३ तासु पुत्र मतिराम कवि, निज मति के अनुसार ;

सिंह स्वरूप सुजान को, बरन्यों सुनस अपार ।२४ इन्हीं प्रतियों में आश्रयदाता के सम्बन्ध में यह दोहा मिलता है :-- तत्ति कौपुदी ग्रन्य की सरसी सिंह स्वरूप , रची सुकवि मतिराम सो पढ़ी सुनो कविभूष ।है महाकापि भूषण अपने को शिवराज भूपण के छन्द नं० २६ में कश्यपग्ोन्नी रह्लाकर का पुत्र बतलाते हैं। मतिराम के पन्‍ती बिहारीलञाल ने विक्रमंसतसई की रस- चन्द्रिका नामक टीका में अपना परिचय इस प्रकार दिया है :--- छन्दसार पिगन, सग ििओ भू? वि०--२

( (९८ ) पत्ती मतिराम के रफकबि विहारीलाल कश्यप वंश कनोजिया विदित ब्रिपाठी गोत; कविरानन के इन्द में कोघिद सुमति उदात ।# इन तीनों ( भूषण, मतिशाम ओर विहारीलाज्ष ) के बर्ण्मनों पर विचार करने से ज्ञान होता है कि मतिराम बत्सग्रोन्नी विश्व- नाथ के पुत्र और भूषण कश्यपगोन्नी रज्नाकर के पुत्र थे। अतः भूषण और मतिराम सहोदर कद्रापि नहीं हो सकते | थे तो एक गोत्र के भी नहीं हैं, फिर बन्धुत्व कैसा ! यहाँ पर एक यह शंका अवश्य उत्पन्न होती है कि सतिरशाम तो अपने को बत्सयांत्री कहते है. परन्तु उनके पन्‍ती बिहारीलाल अपने की कश्यपगोत्री बतलाते हैं। इसका क्‍या कारण है ! मतिराम के वंशज तिकमापुर के समीप सेँजेती आर बाँद नामक गाँवों ( घिल्ा कानपुर ) में रहते हैं। वे सभ अपने को केश्यपगीत्री बलुई' के तिवारी कहते हैँ। उन्तके यहाँ से जो कान्य - कुब्ज-बंशावली प्राप्त हुई है, उसमें भी बछुई' के तिवारी कश्यप- गोत्र के अन्तगंत है| इससे स्पष्ट हे कि मतिराम ओर उसके पंशाज वास्तव में कश्यपगोन्नी हैं। इस दशा में फिर यह प्रश्न होता है कि सतिराम ने कश्यपयोत्नी होते हुए भी अपने को बत्सगोत्री क्यों लिखा ? इसका कारण यही प्रतीत होता है कि घछुई' 'बत्स! का अपभ्रश रूप है, अतः उन्‍होंने बछुई' की बधष्स रूप वेफर

++-++ *-जक+ के 3.८4 5-०... पैकिकनर-++ कल

# विक्रमततसई, प्रथम शतक

( १6 )

अपने को शुद्ध और परिष्कृत रूप में लाने का प्रयन्न किया है ऋ.+ ६५ ह। कं कप कान्यकुब्जों में आज भी निग्न कोट के कनीजिया उच्च वंश में होने के लिए आस्पद और गोत्र बदल लेते हैं मतिराम में भी सम्भवतः वही भावना काम करती हुई प्रतीत होती है! विहारीलाल कबि का

“कश्यप वंश कनोजिया विदित त्रिपाठी गोत,”

छन्दांश भी मतिराम की उक्त भूजल का माजन करता हुआ प्रतीत होता हैं; अन्यथा कश्यप-गोत्र और त्रिपाठी-बंश लिखना थुक्ति- युक्त होता। “त्रिपाठी गोत! से का बछईं' के त्रिपाठी की ही ओर सकेत कर रहा है और कश्यप-बंश उसका पूरक बन कर यहाँ बैठा है। इस प्रकार पन्ती विहारीलाल ने अपने पितामह मतिराम की त्रुटि का प्रच्छालन कर अपने को पुनः परिष्कृत रूप में लाने की कोशिश की है इस विचरण से यहू तो स्प हो जाता है कि प्रथम मतिराम भूषण के जन्म से बहुत पहले मर चुके थे और द्वितीय मतिराम भूषण के समकालीन होते हुए भी उनके सहोइर थे

चिन्तामशि ओर नीलकंठ

यह बात प्रसिद्ध हे के भूषण चार भाई थे। शिवसिहसरोज ओर मिश्रबन्धुविनोद दोनों इस विपय में एकमत हैं। मतिराम के सम्बन्ध में हम देख चुके हैं. कि थे भूषण के समकालीन होते हुए भी उनके सहोदर थे। अब यह प्रश्न उठता है कि अन्य दो

(. १० )

भाई--चिन्तामणि ओर नीलकंठ -के सम्बन्ध में उक्त कथन कहाँ तक सर्व्य है

चिन्तामशिक्ृत पिंगल की एक प्रति मुझ सारगौत, राज्य फटियाला में प्राप्त हुई थी उसमें निर्माणकाल का योहाड़े इस प्रकार दिया हुआ है :---

“कहत अंक मनि दीप जानि बराबर लेहु ।”

इसके अनुसार पिगल का भिर्माणकाज्ञ सं० ९७७० बि० ठहरता है यह पिंगल्ल ग्रन्थ मकरन्रशाह भौंसला के लिए रचा गया