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पयणयययासनावलरस्कागिकसयसपयधययािजजनरययकटयपज वान्तः जसता लमत

भूमिका

-न-विनन2ःॐ--~- ~

भक्तामरस्तोत्रका परिचय देनेकी आवद्यकता नहीं है रनियोभं शायद दही कोई एेसा होगा, जो भक्तामरको जानता हो भक्तामर जर सूत्रजीका ( तत्त्वार्थका ) पाठ कयि चिना सेकटौ जनी भोजन नर्ही करते जवतक जेनीका वाक ^“ भक्तामर सूत्रजी = नहीं पद ठेता, तव तक वह पडा लिखा नहीं कदखा सकता इसीसे समक्ष ठेना चाद्ये कि इस स्तोत्रका कितना माहात्म्य है ओर लोग इसे कितनी आदरकी दृ्टिसे देखते दँ परन्तु खेद है कि, जिन अपूर्वं अद्वितीय गुणि कारण इस म्न्थका इतना माहात्म्य ओर प्रचारवाहुल्य दै, अव हमारा समाज संस्कृत विद्याके अभावसे उन गुणोके भभिन्ञानसे वंचित होता जाता है वद यह नहीं जानता दै, किं इसमे कौनसा अत भरा हुमा हे, जिसे पान करके मिन्नधर्मीं पंडितगण भी वारवार दिर सचान करते दै ओर सुग्ध हदो जाते है संसरेतानभिज्ञ लोगोको उसी अपूर्व अमृतका आखादन करामेके ल्यि हमने यद अरन्थ तयार क्रिया है

देववाणी संस्छृतके पाठ्से जो रसाखाद तथा आनन्दाञुभव शेता है, वह हिन्दी भापाके अञुवादमें ला देना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य दी है) तौ भी हमसे जहा तक वना है, इस वातका भयन्न किया है कि, मूलके किसी मी पदका भाव रद जावे। हम समक्षते है कि, दमारी दस टीका तथा अचुवादसे भाषा रसिकजन उस

यथार्थमे शस स्तोत्रका नाम आदिनाथस्तोत्र है परन्तु श्सके प्रारभके भक्तासरप्रणतमोकिमणिप्रामाणम्‌ इस पाटर्भे भक्तामर ेसा पद नेसे इसका भक्तामरस्तोत्र नाम मरचङ्ति हो गयां है! अन्यान्य यन्धमिं मीणेसा देखा जात्रा है सृक्तसुक्तावरी सिन्दूरभरकरके नामसे जौर पाश्वनाथ- सोत्र कल्याणमन्ठिरके नामसे प्रसिद्ध हे इमी मकार एकीभावस्तोत्र वगैरह भी प्रसिद्ध इन सव अन्धके नाम प्रारभके पद्करे कारण ददी परे है।

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आनन्दके बहुत ऊुछ अलोका अदुभवन करनेमं समर्थं हो सकेगे, जिसके उपभोगके अधिकारी केवर संस्छृतज्ञ जन दी समन्ने जाते हं

जहां तक हमे माटम दै, ईस पुण्यस्तोत्रकी अभी तक कोई भी रेसी टीका प्रकाशित नदीं हु थी, जिससे विदयार्थां तथा स्वैसाधारणजन इसके मर्म्तो समञ्च सके, ओर शायद एसी कोई टीका वनी मी नहीं है, नो वर्तमान समयके अनुसार सर्वभ्रिय ओर स्वोपयोगी हो गुजराती अयुवादके साथ एक सजननने हिन्दी अर्थं छपवाया था परन्तु वह केवर भावार्थं था, उसे टीका नहीं कह सकते इसी ज॒टिकी पूर्तिके च्यि हमने यह भयत किया है इसमे हम कितनी सफकठता प्राप्त कर सके है, इसका उत्तर हमारे चतुर विद्धान्‌ पाठक दे सकेगे

एक वात पद्यासुवादके विषयमे कदना है वह य्‌ है कि, जव पंडित हेमराजजीका न्दर पदयानुवाद उपस्थित था तव इसकी क्या आचवस्य- क्ता थी शायद कोई सनन यद शंका करर, तो उसके उत्तरे हम उर श्रीमपितगलयाचार्यका यह शोक स्मरण कराते है.--

कृतिः पुराणा सुखदा नूतना भाषणीयं चचनं वुधैरिदम्‌ भवन्ति भव्यानि फङानि भूरिशो भूरुहां प्रसवप्रसूतित्ः

[ धर्मपरीक्षा ]

जथौत्‌ ^“ पराचीन कविता ही उखदायक होती टै, नवीन नहीं » दद्धिमानकि यद कचन नदीं कहना चाहिये दृक्षोको अतिवषै नये नेये भवे द, तो क्या वे पके वषोकि फरोसरीखे श्रेष्ठ ओर मिष्ट नदीं

खनते हे कि, भक्तामरस्तो्रके कई पदायुवाद दो चुके परन्दु हमे सिवाय दैमराजजीकफे दूसरा को अनुबाद टेखनेका अवसर भाप नहीं हुआ 1 भराय सव जगह इसीका प्रचार अधिक है दूसरे भयुवाद अभसिद्ध है, ओर शायद अच्छे भी नही है इसमे सन्टेह नही कि, हेमराजजीका अयुवाद बहुत अन्दर भ्रसादगुणयुक्त भौर श्रेष्ट है, परन्तु वह एक खत॑न्न अनुवाद है, उसमे भावमात्र अरहण करिया गया है। श्रयेक पद तथा श्ब्दकी ओर अचुवादक महाश्ययने रक्ष्य नहीं दिया हे उदादरणके लि सेतीसवे शोकका अरुवाद्‌ देखिये,--

ज्ञेसी महिमा तुमवियै, ओर धरै नरि कोय सूरजमे जो जोति है, तारनमे नदि सोय ३७

देमराजजीके अलुवादके विपये हम एक वात ओर भी कटना चाते दै, बह यह कि, इस स्तोमे अगुवादके व्यि चोपाई छन्द यथेष्ट नहीं है छन्दकी सकी्णेताके कारण अदेवाद अनेक स्थानम छ्िष्ट ओर भावच्युत हो गवा अथैवोध भी कहीं कठिनतासे दोत्ता है जसेः--

तुम शुनमहिमा हत-दुखदोप

सो तो दूर रो खुखपोष पापविनादाक दै तुम नाम

कमर विकासे व्यो रविधाम

इसमे सूरूका वह भाव नही पाया, जो सवे भधिक आनन्दजनक था! यहं हमारा आशय रेमराजजीके प्रन्थकी निन्दा करनेका नहीं है किन्तु यद्‌ भ्रगट फरमका है फं, उनका अनुवाद उत्तम होनेपर भी

सम्पूण नरह है

®

इन सवं कारणे हमारा वहुत्त दिनसे विचारं था कि, एक एसा अनुः वाद वनाया जावे, सर्वेया मूका अ्रतिस्प हो, साथ ही सरक सुल. पाठ्य ओर शओीघ्ाथवोधक भी हो ) ह्धकी वातै कि, आज उस विचा. रको इम कार्यम परिणतं करनेको समर्थ॑हुए है ।! यद्यपि हमने इसे“ रर वनानेके व्यि शक्किभर भयन्नं न्या है परन्तु संरछतके भाव दी कुछ एसे कठिन होते दे, करि परिभरम करनेपर भी हमारे अनुवादमे कई जगद्‌ कारिन्य गया है पारक इसत अपराधके व्यि हमें क्रमा करे

कविता कुछ हमारी रखी अरसादजनक नदीं दै, जिसके च्यि हमे अपने इस अलुवादक् ग्य हो; ओर पाठके आह हो कि वे इते पे ही पटे 1 हमारा उद्य केवर मूखके सम्पूणं भावोंको स्पष्ट करनेका है, ओर उसीके व्यि हमारा यह्‌ अयल्ल हे जो पाठक इसके अभि. छापी रगे, उन्ही दमारा यह परिश्रम रचिकर होगा, दू्रोको नहीं

इस अन्धका योधन अवलोकन करके हमारे जिन पंडित सिच्रोनि हमको आसारी क्रिया ह, उन्द हम अनेकानेक धन्यवाद देकर इस भरस्ावनाको समाप्त करते हे 1

देवरी ( सागर ) } विद्वानाक्त सेवक्--

ता० ११५०७ नायृराम ममी

श्रीमन्मानतुङ्कसूरि

उजयिनी नगरीके महाराजा भीजकी सभम बडे विद्वान्‌ वाग्मी ओर कवि ये उनमें एक वररुचि नामके प्रडित भी ये वररुचिके एक कन्या थी, जिसका नाम बद्यदेवी था जिस समय ब्रह्मदेव यौवन सम्पन्न इई, उससमय पितताने पृछा-पुत्रि, अव तू विवाहके योग्य इई है, कह, त्ने कैसा वर॒ चाहिये 2 यह वात ब्रह्मदेवीको अच्छी नहीं लगी उसने कहा, पिताजी, पु्रीके सम्मुख भापको एसे कजाद्यत्यवचन नहीं कहना चाहिये इस प्रश्ना उत्तर देना हम कुलीन कन्यार्ओका कर्म नहीं है उ्वर्वशयकी कन्याये मर जातीं हे परर अपने युखसे यह नहीं कती दूसरे यह सव भाग्यसे होता हे, अपके कहने ओर करनेसे दही क्या " वररचिका खभाव अतिदाय कोधी था पुत्रीकी इस धृष्टतासे वह आगववृला हो गया ओर यह कहते इए रसे निकल पडा कि, देख, तुक्षे मे कैसे मूख॑के गक वाधता द्भ क्रोधे विहर हए वरख्चिने सदसद्वुद्धिशूल्य होकर अनेक नगर ओर आम छन उ्टे, पर उन्दं अपनी अभिरुचिके अनुकूर कोर वरन मिला ! आखिर एक स्थानमे देखा कि, एक मूख बक्षी जिस डा- रपर वैटा है, उसीको काट रहा है वररुचिको उसकी यह बुद्धिमानी वहुत रुची उसने उसे नीचे उतारकर बातचीत की, तो माद्म हुआ कि, उसका नाम दुर्य है, भौर जातिका भी ब्राह्मण है जन्मके दसि उस मूख भौर छऊुरप ब्राह्मणको पाकर वररुचि वहुत असन्न हुमा वद उसे किसी तरद फुसलाकर अपने घर ञे आया भौर र्डकीके साम्हने खडा करफे वोला-यु्रि, यद तेरे योग्य वर॒ दै ब्रह्मदेवी वोखी- पिताने जिसे योग्य समन्ना दै, वह खीकारदै जो मेरे भाग्यमे था, वह॒ मिला इसके प्रात्‌ श्चमसुहर्तमें ब्रह्मदेवीका विवाह दुरयंशके साथ कर दिया गया { विधिकी गति वडी इंकष्य है ब्रह्मदेवी नसी चिडषी

रूपवती कन्याऊे ल्थि दुर्यक्च जसे मूख कुरूप पतिका मिरना, कर्मवेचित्य नहं तो ओर स्याद!

चरश्चिने क्रोधान्ध होकर वहं अनुचित कय करते तो कर डाल, परन्तु पीछे वह पछताने रगा कि, हाय, मेने यह अकार्य क्यो किया रोग सु्चे क्या कगे? क्योकि चररुचिकी भोजके द्रवारमे बडी भारी भ्रतिष्टठा थी इसव्यि उसे सवसे चडी भारी चिन्ता यह इई कि, महाराज सुनेगे, तो दुरथश्चको यह समक्न कर अव्य दी बुखर्चेगे कि, चरस्चि- का जमाई कोई भश्चुतपूवं विद्वान्‌ होगा 1 परन्तु जव इसकी मूखेता प्रगट होगी, तव सुञ्े कितना ललित होना पडेगा बहुत विचारके पश्चात्‌ वररुचि निश्वय किया कि, इसे पठाना चाहिये 1 परन्तु महीनों सिर खमे पर भी उसे एक अक्षर नहीं आया आखिर यहं विचार छोडकर वररुचिने उसे फैवरु एक “सख्स्व्यस्तुः का उच्चारण सिखाया ्रारेस करिया इसल्यि किं, शायद कमी द्रवारमें जानां पड़ेगा, तो मद्यराजको आशीर्वाद तो दे देगा

पूरे एक वधे सिरपच्चीकरके वररचिको एक दिन जमाई सरित्त दरवारमें जाना पड़ा परन्तु वहा प्ुचते > दुयेशच खस्यस्तु कहना भूक गया ओर उसके स्थान मे उश्चरट वोर उठा, जिसका कोड अर्थ नहीं होता था इसे सुनकर सम्पूणं समके विद्वान्‌ नाक भह सिकोडने लगे कि, यह क्या अपरव्द्‌ कहा 2 तव चिद्वान्‌ वररचिमे अपनी वात जाती देखकर तत्का दी कहा, कि-“यद्रा एक विद्रत्समूह वैढा हुमा है, उसे विचार करना चाहिये ओर महाराजको खय देखना चाहिये कि, मेरे जमाने अयुक्त क्या कहा है यों विना सोचे विचारे एक विद्वानके वाक्यको अप- दाष्द कह देना ठीक नहीं है! = यह सुनकर जव सभा थोडे खमयके स्थि सव्य हो रदी ओर किसने उत्तर दिया, तब वररबि अपनी विद्वत्ता भकंट करता हुआ बोख,- महाराज, उश्षरट शब्द स्व" सकि समान ही आी्वादात्मक है सो इस प्रकारसे छि, “८ उ~उमा,

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पार्वती, शष-रोकर-महादेव, थे रक्षा करे ओर स-विजयके वाद्य टकार होते रहे 1” इस अर्थैको नकर महाराज भोज प्रसन्न हुए, ओर वरसचिको वहुतसा पारितोषिक टेकर वोले,-क्यों ने, तुम जसे वि द्वानका जामाता विद्वान्‌ न्दी होगा, तो आर फसिका दोगा इसके पश्यात्‌ समाका विसर्जन हुभा वरर्चि जमाईको साथ चयि हए धरको चदे मागमं उन्दनि कोपित होकर दुय॑शको चार छह छात धूसे लगाये, आर कदा, “रे णठ, वर्पभर पटाया, तो भी तू स््स्यक्षु भूर गया आज यदि सुस्रम विद्रत्ता नहींदोती,तोत्नेतोड़वोदीदीथी |

दम॒ मारका दुर्येदके हदयपर वदा असर हुआ शवञयुरकफे द्वारा पेखा अपमान गसो मत्य हो सकता 2 चह अपने जन्मको वार धिकछारता हुजा उसी समय कारिकाठेवीफे मघम पहुंचा आर अंधे दोकर द्वारपर यह कदते हुए पड गया कि,--“ सात , यातोयुक्ि विद्यादे, अथवा मेरे प्राण लेठे। ”” सात्त दिवस इसी तरद विना अन्न जल्के एक मात्रे कालिकापर ध्यान लगाये हुए, जव वह पड रदा, तव आयवे दिन कालिका प्रगट हुई बौर वोली,--“रे विप्र, मे तुक्षपर घसत हुईं ? राजपाट भंडार जो छु वहि, मे त्च देती द्रुं 1” दुय चोला-- ^ अर फुछ नहीं, केव वचनतिद्धि चादता हू कालिकाने कहा+-अच्छा वत्स, जा तुन्न वचनसिद्धि दी होगी स्सारमें तू कवि कािदासके नामसे प्रगट होगा = दुर्यञ्च प्रसन्न होकर उठ वैठा, भौर अपने धरकी भर चला 1 मठसे निकरुते दी उसके मंहसे शेपात्मक गभीराश्चयसम्पन्न शष्द्‌ निकरने रगे तव लेोर्गोको वदा आव्यं हुआ पूष्नेपर मादस इुभा कि, यद सव कालिकाकी छपा है वररेचिने जव यह जाना, तव उसे अलयधिकं प्रसन्नता हृद साथ दी वद इसल्यि ठनित इभा कि, मेने जरासी जिदके कारण ठदकीको जन्मभरके व्यि दुखी करना चादा था ! परन्तु सच है कि, ““ रेखपर मेख नही मारी जाती

कालिदासकी फति थोदे दी समयमे चारो भोर फेर गर ¦ समख

विद्वान्‌ उसे मस्तकं कने रगे 1 एक दिन भोजकी समामे कालिकाके साक्षात्‌ ददीन कराके तो उसने अपना भ्रमाव ओर भी चा जिया! महाराज भोजके हृदयम उक्के महत्वे भटीभाति स्थान पा जिया

एक दिन उजयथिनीके प्रसिद्ध ॒सेठ सुदत्त अपने मनोहर नामके पुत्र को साथ चयि हुए भोजमदहाराजकी समामे गये ये महाराजने कुशल. मगर पूकर उन्द आद्रके साथ विटाया जोर पृा,-रोठजी, आ- पका यह वारक होनहार जानं पड़ता हे आपने इसे कुछ पढाया भी हे या नही शठने कदा- महाराज, अमी इसका विवारेभम दी है ¦ केव नाममाराके शलोक इसने क॑स्य कयि है 1 एक अश्ूतपूवं अन्धका नाम॒ सुनकर भोजने पृछाः--नामसाखाका नास आज तक करीं सुननेमे नहीं आया 1 क्या आपको माद्धम हे किं, वह किसी चनाई हुई है सुदत्त नष्टि कहा.--महाराज आपके इसी नगरम एक धनंजय नामके महाकचि रहते है, उन्दीकी वनाद है यह नाममाला है इसपर भोजने सेढको उखाहना दिया कि, रसे बडे भारी विद्रानक्तो जानते हुए भी आपने हमसे कमी नहीं भिराया, यह आपको नहीं चाहिये काडिदास ओर ध्नजयके वीचमे कुछ असर्मजस था इस व्यिं राजाके समीप धर्नजयकी इत्तनी प्रदोसा उन्दं सदन नहीं इर वे बोले, ^ महाराज, करी, यति महाजन भी चेद्‌ पठते है इन चेचारोके पास विदा कासे आई परन्तु मदाराजको, तो विद्रानोसे मिखनेका एक व्य- सन ही था, इसघ्ि उन्होने यह सव सुनी अनसुनी कर दी, ओर अपने एक म॑त्रीको धनंजयके केनेके व्यि मेज दही दिया ! थोडी ही देरमे धनजय पहुचे 1 उन्हे एक आश्ीवोदात्मक इन्द्र शोक परकर सारी सभाको मरसन्न कर दिया महाराजने सत्कार करके विटाया ओर कुशल भरश्चके अनन्तर पूष्ा,-“आपको एक विख्यात विद्वान्‌ सुना है 1 परन्तु आश्चर्य है कि, भआाजतक हमसे आप नहीं मिरे 1” धनेजयने विेसकर कहा.-“छृपानाय, आप पृथ्वीपति हे, जवतक पुण्यका भरवङ“ उदय हो, तवतक आपके

द्भनोका ऊाम कंसे हो सकता है आज मेरे अदोभाग्य रै, जो आपसे -साक्षात्कार करके सफलमनोरथ हुञा ।*

सके पधात्‌ महाराजे पृछा+--भापका नाम इतनां वडा है, फिर यदह छोटासा प्रन्य तो आपको नहीं श्रोभता अवदय दी आपने कोई मह- देय वनाया दोगा या यनानेका प्रारंभ क्रिया होगा इतना चुनकर कालि. दाससे रहा गया वे बोठे, ““ महाराज, यद नाममाला हम रोगोकी है इसका यथार्थं नाम नासमंजरी है ब्राह्मण दी इसके वनानेवाके दो खकते टै ! ये वेचारे वणिक्‌ लोग भ्रन्थोके मर्मेको क्या जानें = यद्‌ घात धरन॑जयको वहत बुरी र्मी जीर रूगना ही चाहिये क्योकि दिन दहाडे उनकी एक कृतिपर दडतार फेरी जाती थी उन्देनि कदा-“ महा- राज, यद्‌ सर्वथा श्ट है मेने दी यह म्रन्थ वालकेकि वोधके लिये वना- याद यद सव फोई जानते दे आप पुस्तक मंगाके देख ऊीजिये। जान पडता हे, इन रोगेनि मेरा नाम रोप करके अपना नाम रख दिया ह, भौर जवर्दस्ती नामर्मजरी वना दी दै ^ यह सुनकर महाराजने ब्राह्मणेति कदा, ““ यद तुमने वदा अनर्थं किया, जो दूसरेकी छृतिको चु- पाकर अपनी वना डाटी यद चोरी नहीं तो ओर क्या है? इसपर ाष्यणोंी ओरसे कालिदास वोके,-"“महाराज, अभी कठ तो ये धर्नजय उस मानंतुगके पास विद्याभ्यासं करते थे, जिसके पास विद्रत्ताकी गध भी नरीह! आजये कहांसे विद्वान्‌ द्यो गये, जो भ्रन्थ रचने ठग गये उस मानतुंगको दी बुखाके हमसे श्ाल्नार्थं कराके देख खीजिये इनके पाडिदकी परीक्षा आप हो जावेगी > गुरदेवकी अवज्ञा धनजयसे सुनी नहीं गई वे छुपित दोकर वोले-“ कौन रसा विद्वान्‌ दै, जो युस जीके चरणेमि विवाद कर सकता है। मे देख, तुमसे कितना पाडिलय हे पटे सुक्षसे शाघ्नार्थं कर रो, तव गुरुदेवका नाम उना!” वस, इसके पश्चात्‌ ही काकिदास भौर धर्नजयका शाखार्थं दोने र्गा ! विविध विपयोमि बाद्विवाद हुआ धनजयके स्याद्वाद्मय वादसे अनेक वार निरन्तर होकर कालिदासं खितिया गये ओर राजसे वदी वातत फिर बोरे कि,-““ मं इनके गुर मानंतुगसे शाच्रार्थं करूगा यद्यपि महाराजं भोज ˆ धनजयका पक्ष प्रवर दै,” यदह जान चुके थे, परन्तु कालिदासके

१०

स॑तोषके स्यि भौर शाख्राथका कौतुक देखनेके च्य उन्होने श्रीमानकुग- सुनि महाराजके निकट अपना दूत बुलानेके ल्यि भेज दिया राजाज्ञा अनुसार उसने मुनिमद्याराजसे निवदेन किया किं“ भगवन्‌, मारवा घी महाराज भोजने आपकी ख्याति सुनकर ददोनोकी असिरषा की हे, जौर दरवारमे बुल्मया दै, सो कपाकरके चच्यि सुनिराजने कदा- भाई, राजद्वारसे हमारा क्या अयोजन दै हम खेती नहीं करते हेः वाणिज्य नहीं करते है, किसी प्रकारकी किससे याचना नहीं करते है, फिर राजा हमे क्यो वबुरावेगा " सुनिराजने जो उत्तर दिया था, दूतने मदाराजसे जा कडा इसपर राजने फिर॒ सेवक भेजे, परन्तु फिरभीवे नदीं आये 1 इस भ्रकार चार चार वार सैवक भेजे, परन्तु सुनिराजने उसीश्रकारका उत्तर दिया, जैसा फि पके दिया था पाचवीं वार कालिदासके उसकानेसे महाराजको कोध गया इसव्ि उन्दोनि सेव्कोको दरवारमे आज्ञा दे दी कि,“ उन्दं जिसतरह ह्यो, पकडके ङे आओ करई वारके मखे हुए सेवक यह चाहते ही थे तत्कार ही उन्दं पकड राये ओर सभाम खाके खडे कर दिये उस समय उपसर्ग समक्षके सुनिराजमे मोन धारण करके साम्यभावका अव्ङम्बन कर ज्या राजाने बहुत चाहा कि,ये छु वोर्ल, परन्तु उनके सुहसे एक अक्षर भी नदीं निकला तव काकदास तथा अन्य विदेषी ब्राह्मण वोले कि-“ महाराज, यह कणोटक देसे निकाला हभ यदा रहा हे महामूखै है, राजसभा देखके भयभीत हदो गया दे, इससे नही वोक्ता हे +” इसपर बहुत रोगोनि सुनिराजसे प्रार्थना की कि, आप साधु हं इस समय आपको इछ धर्मोपदेश देना चाहिये 1 राजा विद्याभिलासी द, खनकरं सतषट हेगि \"> परन्तु सुनिराज पंचपरमेष्टीके ध्यानमें अडोर हो रे सव रोग कहक्रदके थक गये, परन्तु ङु फर नहीं हुआ इसपर राजाने क्रोधित ह्योकर उन्दः अदतारीस कोठरि्योके भीतर एक ब॑दीगृहमे हथ कडी वेडी डालकर कद्‌ कर दिया प्रयेकं कोटड़ीके द्वारपर एक एक मजवूत ताला जडकर वाहर पहरेदार वेढा दिये सुनिराज उस ॒स्थानर्मे तीनं दिन तक कैद रे चौथे दिनि यद आदिनाथसतोज्न नामका काव्य र्चकर्‌ः जोकि्येत्र मने ऋद्धित गभत दहै, ज्यों ही, उन्दने एकं बार पाठ क्रिया,

११

लों दी हथकदी वेडी सदित सव ताले टट गये भौर खट खट क्िवाद्‌ शुरु गये सुनिराज वार निकल्कर द्वारके चवूतरेपर विराज्ञे येचारे परेदारोको वदरी चिन्ता हुई 1 उन्दने चिना किसीके कुछ कटे ने, फिर उसी तरह सुनिराजको कद कर दिया परन्तु थोडी ही दैरमें फिर वही दशा सुनीद्य फिर बाहर विराजे अवकी वार सेवकोनि राजास जकर सुनिराजकै यंधनरहित दोनेकी सवर ख॒नाई राजाको वदा आर्य हा परन्तु पटे यद सोचके किं प्रायद रक्षाम प्रमाद हुआ होगा, सेवकसि फिर का कि, उन्दँं फिर उसी तरहकदकर दो, ओर सख्त पटटरा रक्खो सेव्फीनि वेसा ही किया, परन्तु थोडी ही दैरमें वदी वात हुई ओर युनिराज वाह्र निकल आये भवकी वार वै वहासे सीधे राजसभाभें जा पहुचे उनके दिव्यदारीरके प्रभावसे राजाका हदय काप गया उन्दोनि काचिदासको बुलार कटा,-“ कविराज, मेरा आसन कम्पित दो रहा है, इसका कु यनन करो म॒ अव दस सिंहदासनपर क्षणभर भी नदीं उर सकता 1 कालिदास मदाराजको धैय देकर उसी समय योगासन ल्गा कर वैठ गये आर कालिकाका स्तोत्र पने लगे थोडे ही समयर्मे कालिका- देवी साक्षात्‌ भ्रगट हुई साथ दी सुनिराजके समीप चक्रश्वरीने ददौन दिये राजसभा चकेश्वरीका भव्य-सोम्य ओर कालिकाका विकराल~-वैडरूप देखकर चकरित हो गई चकेश्वरीने ठलकारके कदा कि--कालिकि, तू यदा क्यो आई 2 क्या अव तूने भुनिमदात्माओंको उपसगे करनेकी ठानी है अच्छा देख, मै अव तेरी कैसी दशा करती हं कारिका प्रभावक्षालिनी चक्रेश्वरीको देखते ही डर गई, ओर नानाप्रकारसे स्तुति करफे कटने लगी करि-भव भँ रेसा छख कमी करूंगी चकेश्वरीने इसपर कालिकाको वहुतसा उपदेश दिया ओर दसा छोडकर अर्दिसारूप प्रदृत्ति करनेकी अतिज्ञा कराई इसके पधात्‌ कालिका भुनिराजसे क्षमा माकर खोप हो गद राजा भौर कालिदासादिकने भी मुनिराजका प्रभाव देखकर क्षमा मांगी तथा नानाभ्रकारसे स्तुति की 1 जोर राजाने तो सुनिमहाराजसे श्रावकके त्रत ेकर जेनधर्मका प्रभाव ससारमे व्याप्त कर दिया ककरेशवरीदेवी उपसग निवारण

करके भदश द्यो गई

१२

यदं कथा श्रीमूरुसघान्नायी भद्रक श्रीजगद्धूपणके रिष्य॒भश्षरक आीविश्वभूषणङृत संस्छृतरीकाके चरित्रके आधारसे ङिखी गड हे

इससे सिद्ध होता है कि, मानतुंगसूरि धनंजय तथा महाराज भोजके सम- कालीन ये ओर उजयिनीके राजा भोजका समय ईसाकी ग्यारदवीं शताव्दिका पूवौरधं निश्चित दो चुका है इस दिसावसे मानतुंगसूरिका समय ईखी सन्‌ १००० के ऊपर सिद्ध होता है परन्तु एेतिदासिक द्टिसे अभीतक यद समय विश्वासके योग्य नदीं हे क्योकि एक तो मानतुंगके विपये दिगम्बर- सम्प्रदायके भन्थेमिं दी दो तीन पकार की कथा प्रचलित दै तथा एक कथा श्रेततम्बरसम्भदायके भरन्थोमे भी मिरुतीहै ओरये सव ही कथां एक दूसरेखे नरी मिरी है-जदे विद्धानोके साथ मानतुंगकी समकालीनता स्थिर करती है दूसरे प्रसिद्ध इतिदहासह्न गौरीदौकर हीराचन्द ओन्चाने अपने “सिरोहीका इतिहास नामक अन्मे छिखा है किं, भक्तामरस्तोच्रके कत्तौ मान- तुगसूरि महाराज श्रीदषैके समयमे हुए है जर भीदषेका राज्याभिषेक ईखी- सन्‌ ६०७ ( वि° सं° ६६४ ) हुआ हँ 1 अथोत्‌ ओन्नाजीके मतसे भो- जसे ४०० वर्ष पदिरे मानतुंगका समय निधित होता है तीसरे भग्तामरकी खरछृत टीकाके कत्ता श्रीभरमाचन्द्रसूरि छिखते हैँ कि--,““ मानतुंगसूरि परिङे बौद्ध धर्मेके उपासक थे पीछे जैनधर्मम उन्द विश्वास हो गया था 1 जिनदी, क्षा छे चुकनेपर उन्दने अपने गुरुकी आज्ञासे यद आदिनाथसतोत्र बनाया था अथौत्‌ प्रभार्चद्रके मतसे राजा भोजके वंघनोसि सुक्त रोनेके रिये इस सोत्रकी रचना नहीं हई थी 1 इस तरद मानतुंगसूरिका इतिहास ओर समय वहुत वडे अधकारमे द्ुपा हभ है ओर विना बड भारी परि्रसके उसका पता रुगना कठिन दै, तो भी हम भद्रक तिश्व॑भुषणकी उक्त कथाको इसरिये प्रकाशित कर देते है कि, वह वारुकोके चयि मनोरंजक शौर प्राभाविक होगी इसके सिवाय अन्य कथार्जकी अपेक्षा इसका प्रचार भी अधिक हे

श्वेताम्बरसम्प्रदायमे भी भक्तामरस्तोत्रका प्रचार अधिकतात्े है परन्तु उसमे इसके ४८ वे खानमे ४० ही शेक माने जाते है ! मानतुगसूरिको श्वेताम्बर भाई श्ेताम्बराचायं मानते दै 1 खना दे ओेताम्बरसम्भ्दायका को$ यन्थ मी मानंमाचा- ` यंका बनाया हृ है 1 ये सोनागिरकी गदीके अधिकारी ये

नसो वीतरागाय 1

भीन्मानल्गसूरिबिरचित आदिनाथस्तोच्र

भाषाटीका तथा पद्याचुवादसहित

== 0 दन

= रे

वसन्ततिरुकाटृत्तम्‌

भक्तामरपरणतमोखिमणिप्रभाणा-

मुद्योतकं दलितपापतमोवितानम्‌ सम्यक्प्रणम्य जिनपावयुगं युगादा-

वारस्बनं भवजटे पततां जनानाम्‌ ॥१॥ यः संस्तुतः सकखवाञ्ययतत्वबोधा-

दुदधतबुद्धिपटभिः खुरलोकनथेः स्तोतरैर्नगञ्चितयचित्तहरेरुदः

स्तोष्ये किलाहमपि तं पथमं जिनेन्द्रम्‌॥२॥ [ युम्भम्‌ ]

१८ मवनिधौ"" रसा भी पाठ दै सस्छृतमे कीं एकसे अधिक अनेक शछोकोका इका अन्वय होता दै जहा दो शछोर्कोका एकत्र अन्वय हो, उसे युग्म कहते है यहा भी युग्म है 1

` हरिगीतिका छद्‌ 1

जो सुरनके नत मुङ्कुटमनिकी, प्रभाको परकाशते युनि पापरूपी प्रर अतिशय, तिमिरंपुंज विनाश्ते अर्‌ जो परे भवजर दियो, अवरुम्न तिनि युगादिम जिनदेवके तिन चरनज्ुगको, नमन करके आदि्मे-\ मँ शक्तिहीन करहु थुति, अचरज वड़ो सुखकारिनी तिन भ्रथम जिनकी परमपावन, अरु भवोदधितास्नी ` जिनकी नरिजगजनमनहरन वर, विश्चद विरद सुहाई है हरिनेः सकैरुश्चुततत्त्व-बोध-परसूत-वुधिसो गाई है २॥

अन्वयार्थो--(मक्तामरम्रणतमौकिमणिश्रमाणास्‌) भक्तिमान्‌. देवोके शके हुए सुकुरोकी जो मणिँ है, उनकी परमको (उच्योतर्क) भकारित करने, (दङ्ितपापतमोवितानं ) पापरूपी अंधका- रके समूहको नष्ट करनेवाठे ओर (८ भवजले ) संसारसयुद्रमे पततां ) पडते इए ( जनानां ) मनुष्योको (युगादौ ) युगकीं अथीत्‌ चौयेकारकी आदिमे ( आरस्बनं ) सहारा देनेवाठे, (जिन- पाद्ये ) श्रीजिनदेवके चरणयुगर्लोको ( सम्य ) भीमांति ( प्रणम्य ) भणाम करकेः-॥ ( सकरुबाडयतखखमोधात्‌) सम्पूणेद्वादशांगरूप जिनवाणीका रहस जाननेसे ( उद्धतबुद्धि- पड्भिः ) उत्पन्न इई जो बुद्धि, उससे प्रवीण रसे ( सुरो ` कना्थः ) देवलोकके खासी इन्द्रोने ( जगत्रितयचित्तहरैः )

अंधकारके समूहको 1 इन्द्रम सम्पूण द्वादशागसे उत्पन्न इई चतुर

उुद्धिके द्वारा अथीत्‌ देवकि मुकुट आपके चर्णोकी प्रभासे भौर भी अधिक दीप्तिमान्‌ होते है

तीन जगतके चित्त हरण करनेवाटे ( उदरैः ) महान्‌ (स्तोत्रैः ) सोत्रोके दवारा ( यः संस्तुतः ) जिसकी स्तुति की, ( तं ) उस ( प्रथमं जिनेन्द्र) पथम तीथेकर श्रीक्रषमदेवका ( किल ) भाश्च है किं ( अष्टम्‌ अपि) मे मी ( स्तोष्ये ) सवन करता

भावाथः--जिसकी स्तुति द्वादश्चांग वाणीके ज्ञाता इन्दरोनि वदे विशार सोत्रोके द्वारा की है, उसी आदिनाथ मगवानका स्तोत्र करना प्रारंभ करता हं, यह वड़ा आश्चर्थ है

बुच्छा विनापि विब्ुधा्चितपादपीठ

स्तो समुयतमतिविंगतन्नरपोऽहम्‌ वरं विहाय जलसंस्थितमिन्दुविम्ब-

मन्यः इच्छति जनः सहसा यहीतुम्‌॥२॥ हे अमरपूजितपद तिहारी, शुंति करनके काज मे वबुधिषिना ही अति दीर है कै, भयउ उद्यत आज मे

जरम परयो प्रतिविम्ब शशको, देख सहसा चावसो तनिक शिंुनकों को सुजन जन, गहन चदि भावसो॥२॥

अन्वयार्थो--( विबुधाचितपाद पीठ ) देरवोने जिसके सिंहा- सनकी पूना की है, से हे जिनेन्द्र ! ( बुद्धया विना ) बुद्धिके

“कि शब्दकायह अभिप्राय श्रीप्रसाचन्द्रए्चा्येकी स््तटीकासे अदण किया गया है “विवुध्रा्चितपाद पीठम्‌” एेसा भी पाठ दं। सुति \ वाररकाको वस्तुपनेसे

9

विना ( अपि ही ( बिगतत्रपः ) कञ्यारहित जो ( अहम्‌ ) मे (सततं ) आपका सवन करनेको ( सथुद्यतमतिः) उचतमति हुजा रं अर्थात्‌ तत्पर हुजा हं, सो दीक दै 1 क्योक्कि ( वारं विहाय ) वारकके सिवाय ( अन्थः ) अन्य ( कः ) कोन (जनः ) मनुष्य दा है, जो ( जलसंखितम्‌ ) जल्मे दिखाई देने वाहे (इन्दुमिस्वे ) चन्दरमके प्रतिविम्बको (सहसा ) एकाएक (ग्रहीतुम्‌ ) पकड़नेके ल्यि इच्छति ) इच्छा करता है

माव्‌ाथः--ञसे मूखं वारक जकमें पड़ हुई चन्द्रमाकी छायाको पकडना चाहता है, उसी भकार भे भी आपका सोत्र करनेके यिय , तयार हुमा हं, जो कि अतिशय कठिन है

वक्तुं गुणान्‌ युणससुद्र राशाङ्ककान्तान्‌ कस्ते क्षमः सुरखरप्रतिमोऽपि बुच्छा \ कस्पान्तकाङपवनोद्धतनक्चक्रं को वा तरीतुमरुमम्बनिधि भुजाभ्याम्‌

युणनघ, चश्शसम समुज्ज्वर, कहन तुव गुनगनकधा खुरयुरुनके सस गुनी जन, हँ ससरथ सर्वथा जामे पर्यके पवनस, उछरत प्रवर जर्जंतु हे

तिदह जर्धिकर निज सुजनसों, तिर सके को बर्व॑तु है॥४॥

जन्वयाथा-( गुणसमुद्र ) हे गुणोके समुद्र ( ते) उम्दारे ( शशाङ्कान्ताच्‌ ) चन्द्रमाकीं कान्ति जसे उजञ्ज्वर ( गुणान्‌ )

इन्द्र के समान बुद्धिमान्‌ ! मगरमच्छ आदि जचर जीव

गु्णोके ( वक्तं ) कटनेको ( बुद्धया ) बद्धिसे ( सुरुसुप्रतिमः अपि) इन्द्रके समान भी (कः) कौन पुरुषरेसादहै, जो (क्षमः ) समर्थं हो क्योकि (कर्पान्तकाकपवनीद्धतनक्रचक्ष ) मर्यकालकी आधीसे उछकते है मगर मच्छोके समूह जिसमे, एेसे ( अम्बुनिर्थिं ) ससुद्रको ( शुजाभ्याम्‌ ) अजाते तरीतुम्‌ तेरनेको ( को वा ) कौन पुरुष अलम्‌ ) समर्थ हो सकता है कोद भी नदी भावाथैः--जैसे पर्यकारके भयानक दुखर समुद्रको कोई सुजाओसे नही तैर सकता है, उसी मकार भै मी आपके गुणका वणन करनेमे असमर्थं ह्‌ 9 सोऽहं तथापि तवभक्तिवशान्ुनीर कर्तु स्तवै विगतशक्तिरपि श्रशृत्तः। मील्यात्मवीयैमविचायं भृगो मृगेन्द्रं नाऽभ्येति किं निजरिरोःपरिपाख्ना्थम्‌॥ मुनिनाथ, मे उदयत भयउ जो, विंश्द पावन गानकों सो एक तुव पदभक्तिके वश, भरू निजवलन्ञनकों ज्यों प्रीतिवद्च निजबर विचारे,-षिन स्व॑वत्स जचाइवे अतिदीन हरिनी सिंहके, उपै सनमुख जाइवे।॥\५॥

अन्वया्थौ--( मनीज्च ) हे सनियोके ईश्वर मे सोत्र कर- नेमे असमर्थ ह्‌, ( तथापि ) तो मी ( तव मक्तिवशञात्‌ ) ठम्दारी

सतोन्न अथत्रा सुति ! भपने वन्ेके 1

मक्तिके वशसे विगतशक्तिः ) राक्तिरित ( अपि) भी ( सः ) वह उुद्धिदीन भे स्तवं कर ) आपका सवन करनेके स्यि प्रवृत्तः ) भवृत्त हं सोटीकदी है, क्योकि सृण; > हरिण ( प्रीया ) भ्ीतिके वश्से( आत्मवीर्यं ) अपने पराक्रमको ( अबिचार्थं ) विना विचरे दी ( निजशिद्योः ) अपने वचेकी ( प्रिपारनार्थम्‌ ) रक्षके अथं (करं ) क्या ( मृगेन्द्रं) सिहको अभ्येति ) नही प्त होता है ? जथौत्‌ उसके सम्पुख रुडनेके स्यि क्या नी दौडता है ?

भवार्थः- जसे हरिण जपने वेको सिहके पंजे फसा देख- कर्‌ उसकी प्रीतिके वशसे ययपि सिंहको जीत नदी सकता दे, तौ मी साम्हने रुडनेको दौडता है उसी प्रकार मुद्चमे शक्ति नही है, तौ मी भक्तिके वक्चसे आपका स्तोत्र करनेके ङयि तत्पर होता हं अर्थात्‌ इस स्तोत्रके करनेमे आपकी भक्ति कारण है, मेरी शक्ति वा प्रतिमा नही ५॥

अल्पश्रुतं श्चुतवतां परिहासधाम

खद्धक्तिरेव मुखरीङुरुते बखान्माम्‌ यत्कोकिखः किरु मधो मधुरं विरोति तच्चारुचूतकङिकानिकरेकेतुः

अल्पज्ञ अर ज्ञानीजननके, हासको सुनिवास सै तुव भक्ति ही मुहि करत चैचरु, इहि पुनीर॑-परयासमै मधुमासमें जौ मधुर गायन, करत कोटर मेमसोँ सो नव रसारनकी रुकित कङिकानिके वश्च नेमसों ।॥ ६।१ 1 =-=

अन्वयार्थो-( अल्पश्रुतं ) थोडा टै शाखक्ञान जिसको रेसे ओर श्चुतवतां ) शासे ज्ञाता पुरुषोके ( परिहासधाम्‌ सीके खान एसे माम्‌ ) स॒श्चको ( त्वद्क्तिः ) तम्दारी भक्ति ( एव ) दी ( बलात्‌ ) वर्पूवक (युखरीङुरूते ) वाचार करती है क्योकि ( कोकिङः ) कोयल ( फिल ) निश्वयसे ( मधौ ) यैसन्त ऋतम ( यत्‌ ) जो ( मधुरं विरौति ) मधुर शब्द करती है, ( तत्‌ चारुचूतककिकानिकरेकदेतुः ) सो उसमे सन्दर आग्रृक्षोमे मौरका म॑जरीका ) समूह दी एक कारण है

भावार्थः--कोयलकी यदि खयं बोरनेकी शक्ति होती, तो वद वसन्त ऋतुके सिवाय दूसरी ऋतुमिं भी बोरुती परन्तु वह; जव वसंतमे आकि भौर आते है, तव ही मीदी बाणी बोकती है इससे सिद्ध रै कि, उसके बोलनेमे एक मौर दी कारण है इसी- प्रकार सुद्षम खयं शक्ति नही है, परन्तु आपकी भक्ति सुञ्चे सोत्र करनेके लिय चंच करती दै इससे इस सोत्रकी रचनाम आपकी भक्ति दी एक कारण है

त्वत्संस्तवेन भवसन्ततिसन्निवद्धं पापं क्षणारक्षयसुपेति इारीरभाजाम्‌ आक्रान्तरोकमछिनीरखमश्चेषमाशु सूर्याशुभिन्नमिव शार्वरमन्धकारम्‌ ॥७॥

जो जगतजीवनके पुरातन, पाप भवभवके जुरे सो हह छ्य तुव बिरद मार्यै, एक छिन आतुरे

नैत वैशाख दो महीने वसन्त क्रतुके दै श्रीघर।

<

उयो जगतव्यापी शरमरसम तम, नीरुम निशिसमयको ततकार ही दिनकरकिरनसों, प्राप्च होवहि विख्यको। ७॥

अन्वया्थौ-( आक्रान्तरोकम्‌ ) जिसने रोकको ढक ङ्या है, ओर जो अछिनीसम्‌ ) म्रमरकं समान काला हैः एसे (शाभैरम्‌) रात्रिके ( अशेषम्‌ ) सम्पूणे (अन्धकारम्‌ ) जंषकारको ( आश्य >) शीघतासे सुथांश्चुभिन्नम्‌ ) जसे सूर्यकी किरणे नष्ट कर देती है, उसी प्रकार हे मगवन्‌ ! ( त्वस्संस्तेन तुम्दारे सलवनसे शरीरभाजाम्‌ ) जीवधारियोके ( मवसन्ततिसन्नि- चद्धं ) जन्मजरामरणरूप संसारपरम्परासे वेधा ( पार्पं ) पाप (क्षणात्‌ ) क्षणभरमें ( क्षयम्‌ ) नाशको ( उपंति ) प्राप्त होता

भावाथ जसे अंघकारको सूयं मिटा देता है, उसी भकार आपके सोत्रसे जीवोके पाप क्षय हो जति है

मतेति नाथ तव संस्तवनं मयेद- मारभ्यते तनुधियाऽपि तव भरभावात्‌ चेतो हरिष्यति सतां नखिनीदलेषु सुक्ताफलद्युतिसुपेति ननूदबिन्दुः <

जिनराज अस जिय जानिकै, यह आपकी बिरदावटी थोरी समञ्च मेरी तङ, प्रारंभ करत उतावटी

अदन्त नीला ( काल ) कीं कहीं नीङे रंगे कारका उपचार किया जाता हे “तत्‌ प्रसादाच" भी पाठ है » स्ो्रमासा

९.

हरि दै सुमन सो सजननके, प्रमु-प्रभूत-प्रभावसौं जठविन्दु जैसे जरुजदल परि, दिपत मुकताभावसों ॥८॥

अन्वयार्थो-( नाथ ) हे नाथ इति मत्वा ) इस पकार पापका नाच करनेवासा मनाकर ( तुधिया अपि मया ) थोड़ी सी बद्धितराखा द्वं, तो भी मेरे द्वारा (इदम्‌ ) यह ( तव ) तम्दारा ( ससत- वनं ) सोत्र ( आरभ्यते ) आरंभ करिया जाता है सो तब ) वम्हारे ( प्रभावात्‌ ) प्रमावसे ( सतां ) सजन पुरुषोके चेतः ) चित्तको ( हरिष्यति ) हरण करेगा जैसे कि नकिनीदङेषु ) कमलिनीके पर्तोपर उद्बिन्दुः ) पनीका विन्दु ( ननु ) निश्व- ग्रसे ( यक्ताफलदयुतिम्‌ ) उक्ताफरकी शोमाकरो ( उपैति ) भाष ह्येता है

भावाथः-जैसे कमखिनीके पत्तोपर साधारण जल्के बिन्दु भी उन पत्तोके प्रमावसे मोती सरीखे जान पड़ते दै, उसी प्रकार यह सोत्र यथपि अच्छा नहीं है, परन्तु मापके प्रभावसे सजनोक चित्तको अवदय हरेगा अथात्‌ उक्छृष्ट॒काव्योकी श्रेणी गिना जावेगा

आस्तां तव स्तवनमस्तसमस्तदोषं त्वत्संकथापि जगतां दुरितानि हन्ति दूरे सहस्रकिरणः ङरुते भरभेव पद्माकरेषु जरुजानि विकासभाञ्जि ९॥

आपके भरभावसे। दुर्जर्नोको तो अच्छेसे च्छा भी कान्य बुरा लगता है, इसञ्यि यहा सल्न वि्ेषण दिया है ,

१०

सब दोषरहित जिनेश्च तेरो, विरद तो दूरहि रहै 1

तुव कथा ही इहि जगतके सव, पापपुंजनको दहे सूरज रहत है दूर ही पै, तासुकी किरनावटी भ्रवरनमें परि करत है, प्रमुदित सकल कुमुदावरी॥९॥

अन्वयार्थो-( सहस्रकिरणः ) सयं तो ( द्रे ) दूर दी रहो, ( प्रमा एव ) उसकी भ्रमा दी ( पृञ्चाकरेषु ) ताकाबोमे जैसे ( जलजानि )कमरोको ( विकाशभाञ्जि ) प्रकारामान्‌ ( ङरूते ) केर देती है, उसी प्रकार हे जिनेन्द्र, अस्तसमस्तदोपं ) जस हो गये है, समस दोष जिसके अथत्‌ दोषरहित एसा तव ›) तम्दारा स्वनं द्रे आसतां ) सोत्र तो दूर दी रदे, (तवत्संकथा अपि ) तुग्ारी इस भव तथा परभवसम्बन्धी उत्तम कथा दी जगतां ) जगते जीर्वोके दुरितानि ) प्पोको (हन्ति ) नार करती

मावाथः--ूर्यके उदयसे पहले जो उसकी प्रमा फैकती है, उससे दी जब कमर पू उठते दै, तव सू्येके उदयसे कमर पठेगे, इसमे तो कहना दी क्या है £ इसी प्रकार आपकी कथा सुननेसे दी जव पाप नष्ट हो जाते है, तब आपके सतोत्रसे तो होवेगे दी इसमे कुछ सन्देह नही है ! सारांश यह कि, आपका यह सोत्र पापका नाश करनेवाा होगा

नाद्धं भुवनमूषणभूत नाथ मूतेयणे्युवि भवन्तमभिष्टुवन्तः

ताखवोकि वौचमे पदके “अत्यद्भुतं” भी पाठ है, जो “भवै. न्तम्‌" का विशेषण होता दे

११ तुल्या भवन्ति भवतो नचु तेन किं वा भूत्याश्रितं इह नात्मसमं करोति॥९०)

हे सुवनभूषनरूप प्रभु, इहिमें कलु अचरज रहा जो संत्यगुनगायक तिहरे, होहि तुव सम नर महा स्वाभनित जननको स्वामि जो, अपनी मभूत विभरूतिसो। नहिं करत आप समान ताकी, कहा बहु करतूतिसो।१०॥

अन्वया्थौ-( डैवनभूषनभूत ) हे जगत्के मूषणरूप सगवन्‌ थुविं ) संसारम ( भूतैः गुणैः ) सत्य तथा समीचीन गुणोकरके ( भवन्तम्‌ ) जापको ( अभिष्टुवन्तः ) सवन करने- वाले पुरुष भवतः ) आपके दी (तुल्या; ) समान ( भवन्ति) होते है सो इसमे (अति अद्धुतं ) अधिक भश्चयै नही है ( नयु ) क्योकि ( नाथ ) हे नाथ; (यः) जो कोई खामी ( इह ›) इस लोकम ( आशितं ) अपने आश्रित पुरुषको ( भूतया) विमूतिकरके ( आत्मसम ) जपने समान ( करोति ) नही करता है, ( तेन ) उस खामी करके ( फं वा ) क्या राम £

भावाथे- दे मगवन्‌, जिसपरकार उदारखामीका सेवकं कालान्तरे धनादिसे सहायता पा करके अपने खामीके समान

भक्तजन कोई ¢ जुवनभूषण > भौर “भूतनाथ पेते दो सम्बोधन करके ^“ दे भुवनके भूषण > ओर “हे जीवोके नाथ अर्थं करते दै

९२

धनवान्‌ ह्यो जातां है, उसी प्रकार मँ भी आपका सवन करके आपके समान तीशैकर नामकर्मकरा उपाजन कर सक्ता १०॥

हृष्टा भवन्तमनिमेषविरोकनीयं नान्यत्र तोषमुपयाति जनस्य चक्षुः पीत्वा पयः शशिकरद्युतिदुग्धसिन्धोः (4 4 हि 4 वि क्षारं जल जरनेधेरसतुं इच्छेत्‌॥११॥ अनिमेष नित्य विखोकनीय, जिने तुमद्दिं विरोकके पुनि ओर टर तोष पावहि, जननयन इहि लेकके।॥

दाशिप्रभाके सम नीर पीकर, क्षीरनिधिको भावनो को पियन चाहत सरितप्रतिको, क्षारजरु असुहावनो

अन्वयार्थो--हे भगवन्‌ अनिमेपविरोकनीयं ) अनिमेष सथोत्‌ टिमकाररहित नेर्नोसे सदा देखने योग्य (भवन्तम्‌) आपको इष्टा) देखकरके ( जनख ) मनुप्योकि ( चक्षुः ) नेत्र (अन्यत्र) दूसरोमे अथीत्‌ हरिहरादि देवो ८( तोषम्‌ ) संतोषको ( उपयाति ) नदी भाप होते है सो ठीक दी है, क्योकि ( श्ल करदयुतिदुग्धसिन्धोः ) चन्द्रमाकी किरणोके समान उज्ज्वरहे शोमा जिसकी, रसे क्षीर समुद्रके ( पयः ) जल्को ( पीत्वा ) पी करके ( कः ) ठेसा कोन पुरुष दै, जो ( जलनिधेः ) सथुद्रके

रिमकाररदित नेत्रोसे चन्द्रमाकी प्रमाके समान उज्ज्वर 1

समुदरका 1 यपि चश्ुः पद्‌ ओर उपयाति क्रिया दोनों एकवचन द, परन्तु जातिकी अपेक्षा होनेसे यहां बहुवचनमें अर्थं किय गया है

१३

( क्षारं जरं ) सारे पानीको ( रसितं ) पीनेकी ( इच्छेत्‌ ) इच्छा करता हे

भावार्भ--जेसे क्षीरसमुद्रके जर्को पीनेवाला फिर खारे पानी- के पीनेकी इच्छा नही करता है, उसी प्रकार जो मपके दर्चन कर- लेता है, उसे फिर दूसरे देवकि देखनेसे सतोष नही होता ११॥

यैः शान्तरागरुचिभिः परमाणुभिस्तवं निमौपितचियुवनेकरुलाममूत तावन्त एव खट तेऽप्यणवः परथिव्यां यत्ते समानमपरं हि रूपमस्ति १२॥ निभुवनशिरोभूषण, अनूपम, शान्तभावनसो भरे जिन रचिर श्यँचि परमाञुवनसों, आप वनिकै अवतरे॥ ते अयु हते जगम तिते ही, जानि मुहि एसी परे जाते अपूरब आप जैसो, रूप नहिं कर रुखि पररे॥१२॥

अन्वयार्थौ-( धिश्चबनैकलामभूत ) हे तीन रोकके एक रिरोमूषणमभूत ( यैः ) जिन ( शान्तरागरुचिभिः ) शान्त मारवोकी छायाखूप ( परमाणुभिः ) परमाणुमोसे ( स्वं ) ठम ( निमीपितः ) बनाये गये हो, ( खल ) निश्चय करके (ते )वे अणवः ) परमाणु ( अपि ) मी ( तावन्त एव ) उतने दी क,

खुन्दर! प्नित्र। क्योकि ( देव॒) “शिरुरो

न्यस्तमस्तकाभरणं कुकामसुच्यते |” सिरके आगे मस्तकके आभरणको रुलम कते दँ

१४

ये 1 ( यत्‌) क्योकि (ते समानम्‌ ) त॒म्दारे समान ( रूपप्‌ )रूप ( पृथिव्यां ) एथिवीमे ( अपरं ) दूसरा ( हि ) नही (असति) दे।

मावा्थः-दे भगवन्‌, आपे शरीरकी रचना जिन पुद्धक परमाणुभसे हई है, वे परमाणु संसारम उतने दी थे क्योकि यदि वे प्रमाणु अधिक होते, तो आप जैसा रूप जैररोका भी दिखराई देता परन्तु यथार्थमे आपके समान रूपवान्‌ प्रथिवीमे कों दूसरा नही है १२॥

वक्त्रं ते सुरनरोरगने्रहारि निश्ेषभि्जितजगक्ितयोपमानम्‌ बिम्बं कलङ्कमणिनं निराकरस्य यद्वासरे भवति पाण्डुपराराकस्पम्‌ ॥१३॥ कहं सुरउरगनर-नयन-आनेंद्‌+-करन तुव सुखचैद्‌ हे तिहंखोक उपमाद्न्द जि्हिके, होत सनमुख मंद हे अर कहां शशिको मिन निम्ब, करुकवारो दाससो जो होत दिनके होत दी, छषि-दीन श्वेत पराससो ॥१३॥

. अन्वयार्थो- दे नाथ, ( सुरनरोरगनेत्रहारि देव, मनुष्य, जर नागोकि नेत्रोको हरणकरनेवाला तथा निश्ेषनिर्जितजग- त्रितयोपमानम्‌ ) जीती दै तीन रोकके कमल, चन्द्रमा, दर्पण आदि सव दी उपमां जिसने पेसा, (क्‌ ) कहां तो ( ते ) तम्हारा (षक्र) खख ओर (क ) कहां ( निश्ाकरख चन्द्रमाका 2

टेसू अथोतर ढाकके पत्ते जैसा

१५

{ कङ्कमरिनं ) कंकसे मङ्नि रहनेवाङा ( विम्बं ) मंडल; (यत्‌ ) जो कि ( वासरे ) दिनमे (पाण्डुपलाश्चकल्पम्‌) पलाश्चके अथौत्‌ ढाकके पततेके समान सफेद ( भवति होता है

भावा्थः--आपके सदा प्रकाशमान निष्करंक सुखको चन्द्र- माकी उपमा नहीं दी जा सकती दै क्योकि चन्द्र करकी है ओर दिनको ढाकके पत्ते जेसा प्रभारीन हो जाता है १३

. सम्प्ूणमण्डररदाङ्ककखाकराप- शुभ्रा युणाख्िमुवनं तब रद्कयस्ति ये संथितालिजगदी-चरनाथमेकं कस्तान्निवारयति संचरतो यथेष्टम्‌ ॥१४॥

हे त्रिजगपति, पूरन निश्ापतिकी, कला ज्यो ऊरे ुनगन तिहरे विमरु अतिशय, सुवन तीनहूमे भरे आश्रय अपूरव एकजगके, नाथको जिनने लियो

चाहे जहां विचरे तिनि, है रोकिवे किंहको यो ९४॥

अन्वयाथौ-८ त्रिजगदीश्वर ) हे तीन जगतके दशर, (तम) वहारे ( सम्पुणेमण्डलशशञाङ्ककलाकलापडयभरा गुणाः पूर्ि- माके चन्द्रम॑ंडर्की कलो सरीखे उज्ञ्वर गुण त्रिभुवनं ) तीन सुबनको रहयन्ति ) उरुषन करते है अथौत्‌ तीनों लोके व्याप्त है क्योंकि ये ) जो गुण एक ) एके अथौत्‌ अद्वितीय ( नाथम्‌ ) तीन लोकके नाथको (सभरिताः) आश्रय करके रहै है,

9 उज्ज्वल

११

( तान्‌ उन्हे ( यथेष्टम्‌) खेच्छानुसार संचरतः ) सव॒ जगह विचरण करतेसे (कः ) कोन पुरुष ( निवारयति ) निवा- रण कर सकता है-रोक सकता है ° अथात्‌ कदे भी नहीं

भावार्थः-- जिन उत्तम गुणोने आपका आश्रय स्याह, वे गुण जहा तहां इच्छापूैक गमन करते है, उन्हँ कोई रोक नही सकता दै क्योकि वे आप जसे तीनरोकके नाथके आशित है जओर इसी कारण अथात्‌ उन गुणोके स्त्र विंचरनेसे तीनलोक उन्हीसे व्याप्त हो रहा है १४

चित्रं किमत्र यदि ते त्रिदशाङ्नाभि- नीतं मनागपि मनो विकारमायम्‌ कल्पान्तकारुमरुता चछखिताचरखेन किं मन्दरादिशिखरं चितं कदाचित्‌॥१५ अग्रज कहो इहिमे कहा, तुव अचर मनको मदरछूकीं जो सुधर सुरवनिता तनिक इ, सुपथरसो च्युत कर सकीं 1

जिदहिन चराये अचर एेसो, प्रख्यको मारुत सहा गिरिराज संदरशिखरहकरदै, सो चराय सक कहा ?॥ १५॥

अन्वयार्थो-हे प्रमो, ( यदि ) यदि (तरिदशचाङ्गनाभिः) देवांगनाजोकरके ते ) तुम्हारा (सनः ) मन ( मनार्‌ अपिं ) , किंचित्‌ भी ( विकारमाभेमर्‌ ) विकारमागेको (न नीतं) नहीं माप्त इञा, तो ( अत्र ) इसमे ( किम्‌ ) क्या ( चित्रं ) आश्व है `

पर्वैत पवन सुमेर पर्वतके िखरको '

१७

किं क्या ( कदाचित्‌ ) कमी( चकिताचलेन ) कम्पित कयि है पर्वत जिसने एेसे कल्पान्तकारुमरूता > प्र्यकारुके पवनसे ( सन्दराद्विक्षिखर ) खमेर पर्वतका रिखर चकितं ) चरायमान्‌ हो सकता है ? कभी नही

मावा्ः--भर्यकारकी हवासे सब पर्वत चलायमान्‌ हो जाते है, परन्त॒ सुमेरुपथेत किचित्‌ भी चलायमान्‌ नही होता दै इसी भकार यपि देवागनाओंने सम्पूणं ही ब्रह्मादिक देवोके चित्त चरायमान्‌ कर दिये, परन्तु आपका चित्त रंचमात्र मी विकार्युक्त नही १५

निद्धूमवर्तिरपवजिततेरप्ूरः छत्रं जग्चयमिदं पकटीकरोषि गम्यो जातु मरतां चङिताचलानां दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ जगटपरकाराः॥ १६॥ नहिं मेक वाती तलको, नहिं नेङु जाम धूम ह्‌ अरु करत है परगट मिरंतर, जो जगत ये तीन जापै पवनबर चरत नहि, चर करत जो गिरिर अहो! हे नाथ, तुम एेसे अपूरव, जगभ्रकाशक दीप हो १६॥

अन्वयार्थो--( नाथ ) हे नाथ, (त्व) ठम (निदङधमवत्तिः) 2 नह, धूम तथा वातीरदित, ( अपवजिततैरपूरः ) तेरके पूरितः

प्रलयकाककी हवा एेसी भयानक होती दहै कि, उससे वदे पर्वेत चल जाते है, एक समेरुपरवत ही उस समय अचर रदता है [न

१८

जौर जो चरिताचलानां ) प्वेतोके चायमान करने वारे ( मरुतां ) पवनके ( जातु गम्यः ) कदाचित्‌ मी गम्य नही है, एेसे (जगस्परकाशः ) जगतके प्रकाशित करनेवाठे (अपरः) अद्वितीय, विक्षण ( दीपः > दीपक ( असि) दो) क्योंकि आप इदं ) इस छतसं ) समसत ( जगत्रयम्‌ ) सपततत्त्व नव पदा्रूप तीन जगतको ( प्रकटीकरोषि ) प्रकट करते दें

मावार्थः-ससारमे जो दीपक दिखाई देते है, उनम धुभं जर वत्ती होती हे, परन्तु आपमे वह ( द्वेषरूपी धुआं ओर कामकी दशजवखारूप वत्ती ) नही है दीपकेोमे तेर ह्येता है, आप तेरु अथौत्‌ सह ( राग ) नदी है। दीपक जरासी हवाके ज्चोकेसे बुञ्च जाता है, आप प्रल्यकारकी हवासे भी चलित नही होते है ओर दीपक एक यरको मकारित करता है, आप तीन जगत्के सम्पूण पदाथोको प्रकारित करते हैँ ! इस प्रकार सप जगते भकार करनेवाठे एक अपू दीपक हो १६

नास्तं कदाचिदुपयासि राहुगम्यः स्पष्टीकरोषि सहसा युगपजनगन्ति नाम्भोधरोदरनिरुद्महाषभावः | सूयातिशायिमहिमासि सुनीन्र खोके १७ . छितितें छुपतं नदिं छिनिहु, छाया राहकी नदि परत हे! तिह जगवको जुगत सहज ही, जो प्रकाश्चित करत हे

धन्वीसे 1> अस्त टोतादहे।३ क्षणभरके ल्थिभी 1 ्एक दही समयमे

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धाराधरनके उदरमें परि, जिदहि प्रभाव धटत है यो निप, जग महिमा तिहारी, भाुहते महत ३।१७॥

अन्वयार्थौ--माप ( कदाचित्‌ ) तो कभी ( अस्तं ) अस्तको ( उपयासि ) माप्त होते हो, ( राहुगम्यः ) राहुके गम्य हो, अर्थात्‌ जापको राहु असता है जर (न) ( अम्भो- ध॒रोदरनिरुद्धमहाग्रभावः ) बादोके उद्रसे आपका महापताप रकता है ओर युगपत्‌ ) एक समयमे सहसा ) सहज ही ( जगन्ति ) तीनों जगत्‌को ( स्पष्टीकरोषि ) प्रगट करते हो इस ॒प्रकारसे युनीन्द्र ) हे स॒नीन्ध, लोके ) रोकमें आप ( स्ूयौतिश्ायिमदहिमा असि ) सूयैकी महिमाको मी उ्- धन करनेवाटी महिमाके धारण करनेवाठे हो

भावाथेः-- सूय संध्याको जस्त हो जाता हे, आप सदाकाल मरकारित रहते है सूर्यं एक ज्बूद्रीपको ही प्रकाशित करता है, आप तीन जगतके सम्पूण पदाथाको पकाशित करते है सूर्वंको राहुका ग्रहण क्गता दै, आपको किसी कारके दुष्कृत