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कला ओर आधुनिक प्रवृत्तियाँ

हिन्दी-समिति-ग्रन्थमा ला- १७

कला और गाधुनिक प्रनातियाँ

लेखक रामचन्द्र शुक्ल

प्रकाशन शाखा, सूचना विभाग उत्तरप्रदेश

प्रथम संस्करण १६९५८

मूल्य साढ़ तीन रुपये

मुद्रक श्री कृष्णचन्द्र बेरी विद्यामन्दिर प्रेस (प्राइवेट ) लि०, मानमन्दिर, वाराणसी

प्रकाशकी

भारत की राजभाषा के रूप में हिन्दी की प्रतिष्ठा के पश्चात्‌ यद्यपि इस देश के प्रत्येक जन पर उसकी समृद्धि का दायित्व है, किन्तु इससे हिन्दी भाषा-भाषी क्षेत्रों के विशेष उत्त रदायित्व में किसी प्रकार की कमी नहीं आती हमें संविधान में निर्धारित अवधि के भीतर हिन्दी को केवल सभी राजकार्यों में व्यवह्ृत करना है, वरन्‌ उसे उच्चतम शिक्षा के माध्यम के लिए भी परिपुष्ट बनाना है इसके लिए श्रपेक्षा है कि हिन्दी में वाहुमय के सभी अवयवों पर प्रामाणिक ग्रन्थ हों और यदि कोई व्यक्ति केवल हिन्दी के माध्यम से ज्ञानाजन करना चाह तो उसका मार्ग अवरुद्ध रह जाय ;

इपो भावन। से प्रेरित होकर उत्तर प्रदेश शासन ने हिन्दी समिति के तत्त्वावधान में हिदी वाझुमय के सभी अज्भों पर ३०० ग्रन्थों के प्रणयन एवं प्रकाशन के लिए पंचवर्षीय योजना परिचालित की हे यह प्रसन्नता का विषय है कि देश के बहुश्रुत विद्वानों का सहयोग इस सत्प्रयास में समिति को प्राप्त हुआ है जिसके परिणाम-स्वरूप थोड़े समय में हो विभिन्न विषयों पर सोलह ग्रन्थ प्रकाशित किये जा चुके हैँ देश की हिन्दी-भाषी जनता एवं पत्र-पत्रिकाओं से हमें इस दिशा में पर्याप्त प्रोत्साहन मिला है जिससे हमें अपने इस उपक्रम की सफलता पर विश्वास होने लगा है

प्रस्तुत ग्रन्थ हिन्दी-समिति-ग्रन्थ-माला का १७ वाँ पुष्प है। हिन्दी में चित्रकला पर ग्रंथों की बहुलता नहीं है और जो ग्रंन्थ प्रकाशित भी हुए हैं उनमें प्राचीन भारतीय चित्र- कला के संबंध में ही विच्चर किया गया है। भारत में चित्रकला में जो आधुनिकतम प्रयोग चल रहे हैं उनकी पृष्ठभूमि में कैसी भावना, कौन-सा उद्देश्य है इसका उद्घाटन अभी तक नहीं के बराबर हुआ है इस पुस्तक के लेखक स्वयं ब्राधुनिक चित्रकला के

[ ] कलाकार हें, ग्रत: उसकी प्रवत्तियों से उनका सहज परिचय है ऐसी स्थिति में यह पुस्तक हिन्दी-भापी जनता के लिए विशेष कर इस विषय के जिज्ञासभ्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी इसो विश्वास से हम इसे हिन्दी के सहृदय पाठकों के सम्मुख उपस्थित करते हैं भगवतीशरण सिंह सचिव, हिन्दी समिति

विषय-सू ची

विषय

कला-स रिता

कलाकार की कला

एक ब्ररशन

एक तूफान

आधुनिक समाज में कला और कलाकार आरधईनक चित्रकार की मनोवृत्ति आधुनिक कला का विषय

कला का कार्य

मानसिक विकास

कला-बर्म

कला और समाज

जीवन और कला

कला और सोन्दय्य

कलाकार का व्यक्तित्व चित्रकला

कला और हस्तकौद्यल

चित्रकला और रूपकारी चित्रकला की तीन मुख्य प्रवृत्तियाँ सरलता की प्रवृत्ति

कला का सामाजिक रूप प्रतीकात्मक प्रवृत्ति

वर्णनात्मक प्रवृत्ति

आदशवादी प्रवृत्ति

दाशनिक प्रवृत्ति

यथार्थवादी प्रवृत्ति

आभासात्मक प्रवृत्ति

२३ र्छ ३३ ३७ ३६ ४७9 ध्रे ध्८ ६० 8४ १०१ १०८ १०६ ११३ ११६ १२४ १२८ १३२ १३७

विषय

वज्ञानिक प्रवृत्ति ग्रभिव्यंजनात्मक प्रवृत्ति स्वप्निल प्रवृत्ति काल्पनिक प्रवृत्ति धनत्वनिर्माण की प्रवृत्ति प्राधुनिक सूक्म चित्रकला अन्तर-राष्ट्रीय प्रवृत्ति आध्यात्मिक प्रवृत्ति अन्तिम बात

१४१ १४७ १५० १५३ १५६ १६० १६८ १७४

१८०

ज्वालाओं के बीच चिश्रकार-रामचन्द्र शक्ल

कला-सरिता

सरिता जल की वह धारा है, जो पहाड़ों की चोटियों पर संचित जल का संबल ले, कल- ऋल करती, पत्थरों को काटती, जंगलों में घूमती, मैदानों में रेंगती उतरती है, और निरन्तर अपना टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता बनाती चलती चली जाती है, जबतक कि सागर का विशाल दामन उसे अपने में छिपा नहीं लेता सरिता विशाल हिमगिरियों के शिखरों पर जन्म लेकर अनन्त गहराई की ओर चल पड़ती है, जैसे उसको जन्म-जन्मान्तर से इसी गहराई की खोज हो एक बार ऊँचाई से निकलकर दुबारा ऊँचाई पर चढ़ना उसके लिए नामुमकिन है वह पग-पग पर गहराई खोजती चलती है और जहाँ पा जाती है, झपट पड़ती है उसी ओर, जैसे यही गहराई उसके जीवन का लक्ष्य हो इसी की खोज में वह बहती चली जाती है

कौन कहता है सरिता में जीवन नहीं ? मनुष्य भ्रपती सम्पूर्ण शक्तियों के सहारे सुख की खोज में सरिता की भाँति बढ़ता जाता है, जिसे वह जीवन तथा अपनी संस्कृति की प्रगति कहता है सरिता गहराई खोजती है श्र शायद उसे ही वह सुख समझती है। मनुष्य और सरिता इसी तरह प्रगति करते जाते हैं; एक खोज, वही जीवन है-दोनों में है। सरिता सागर में पहुँचकर विलीन हो जाती है--अपने लक्ष्य को पा जाती है--श्रथाह गहराई को मनुष्य की जीवन-यात्रा का भी अन्त है--गहराई, गहन अन्धकार वह भी महान्‌ अन्बवकरर में लीन हो जाता है इसकी गहराई का कोई अन्त नहीं, सागर तो फिर भी नापा जा सकता है

सरिता की प्रत्येक गति गहराई खोजती है यही सत्य है जीव भी यही खोजता है सरिता को क्‍या अपना अस्तित्व मिटा देने में दुःख नहीं होता ? यह तो वही कह सकती है। मनुष्य भी श्रन्धकार में विलीन होने से भयभीत होता है। पर सत्य है कि वह फिर भी निरन्तर उसी ओर बढ़ता जाता है, उसी की खोज में जीवन एक खोज है

मनुष्य जो कुछ भी करता है, इसी खोज के लिए | इसी खोज में सरिता पाषाणों को काटकर, पृथ्वी में दरार बनाती तब तक चली जाती है, जब तक श्रन्तिम गहराई नहीं पा

कला श्र प्राधुनिक प्रवत्तियाँ

जाती मनुष्य भी भश्रपनी कलाझं के आधार पर इसी खोज में रत होता है। मनुष्य की कला इसी खोज का एक माध्यम है कला अन्त नहीं है-अन्त तो है गहराई--कला एक सहारा है, एक तरीका है वहाँ तक पहुँचने का कला कला के लिए नहीं है कला लक्ष्य नहीं है। कला साधन है, उस खोज का

कला की महानता इसमें नहीं कि वह क्या-क्या बनाती है-उसे तो खोज करनी है - श्रपने लक्ष्य की नये रास्ते बनाने हैं, वहाँ तक पहुँचने के - वैसे ही जैसे सरिता बनाती है रास्ते, सागर तक पहुँचने के

सरिता कभी मुड़कर नहीं देखती कि उसने पीछे क्‍या क्‍या बनाया है वह तो बहती जाती है अपने लक्ष्य की खोज में मनुष्य की कला का रूप कया है, इससे कलाकार को सरोकार नहीं - वह तो भ्रपनी कला के द्वारा कुछ खोजता है - वही जो सरिता खोजती है किसने कितनी गहराई प्राप्त कर ली, यही उसकी प्रगति की सफलता का प्रमाण है

कला भाव-प्रकाशन है, इससे कलाकारों को कोई सरोकार नहीं कला भले ही भाव- प्रकाशन करे, परन्तु कलाकार के लिए इसका वया महत्त्व ? महत्त्व तो हैं खोज के परिणामों का - गहराई का - अन्तिम लक्ष्य का

कला भाव-प्रकाशन नहीं - खोज का रूप है। कला लक्ष्य नहीं, लक्ष्य की प्राप्ति का तरीका है

कला मनुष्य की जीवन-यात्रा की सरिता है, जो उसके सम्मुख प्रगति के रास्ते खोजती चलती है

कला एक खोज है

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वि यक कता अकाल “लक निधन तल की - हु _ है पक जबन शनक गा 0 की पद अय्ीत 5 2डर हू हे अत अर

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कलाकार की कला

समुद्र के कितारे तथा नदियों के तट पर सीयें और घोंघे पाये जाते हैं ये सीप और बोंघ अनेकों रूप, रंग तथा आकार के होते हैं और देखने में बहुत सुन्दर होते हैं। बहुत से लोन इनमें से अच्छे-श्रच्छे नमूने लाकर अपने घरों में सजावट के लिए रखते है और बहुत से लोग शौकिया तौर पर विभिन्न प्रकार के सीप तथा घोंघों का संग्रह करते हैं

सीप तथा घोंघे पानी में रहनेवाले एक प्रकार के जन्तुओों के बाहरी शरीर का ढाँचा होता है, जो पत्थर तथा हड्डी की तरह मजबत होता है इसी के अन्दर वे जीव, जब तक जीवित रहते हैं, रहा करते हैं। मरने के बाद यह सीप-घोंघोंबाला उनका शरीर पनी के साथ बहाव से नदी तट पर जाता है। उसके अन्दर के जीव सूखकर, मिट्टी होकर, साफ हो जाते हैं

सीपों तथा घोंघों को जब हम समुद्र के किनारे तथा नदी तट पर पाते हैँ तो इनके अन्दर के जीव नहीं दिखाई पड़ते और हम उन्हें उनके अ्रन्दर देखने के कारण उन सीप तथा घोंधों को ही वह जीव समझते हैं

परन्तु ऐसा नहीं है ये सीप तथा घोंघे उन जीवों के बाहरी शरीर या रूप के भ्रवशष मात्र हैं, जिनके अन्दर रहकर उन्होंने जीवन-निर्वाह किया है।

इसी प्रकार कलाकार तथा उसकी कला है कलाकार उस जीव के समान है जो सीप या घोंघे में था और उसकी कला उस घोंघे तथा सीप के समान है भ्रर्थात्‌ जिस प्रकार घोंधा या सीप पानी के जन्तुओं का बाहरी रूप है, उसी प्रकार कलाकार की कला चित्रकार के चित्र उस कलाकार के अवशेष हैँ, जिनके श्रनुरूप उसने अपना जीवन निर्वाह किया है जिस प्रकार सीप तथा घोंधे का जीव मरकर अपना अवशेष छोड़ जाता है, उसी प्रकार कलाकार के चित्र कलाकार के लिए उसके चित्र कोई तात्पयं नहीं रखते वह तो उसके जीवन का एक बाहरी रूप है। जिस प्रकार सीप का जीव मरने के बाद अपना बाहरी शरीर सीप या घोंधा छोड़कर चला जाता है, और हम उसे उठाकर अ्रपनी

| कला श्रौर भ्राधुनिक प्रवत्तियां

बैठक में सजाते हैं या उसका ग्रन्य उपयोग करते हैं, उसी प्रकार कलाकार पपने चित्रों को छोड़ता जाता है। यह उसका काम नहीं कि वह लोगों को बताये कि उसके चित्रों का क्या उपयोग है। चित्रकार ही जानता है इसे, जानने का प्रयत्न ही करता है। यह तो समाज का काम है कि उन चित्रों का क्या उपयोग है समझे और उसका उपयोग करे

उन चित्रों को देखकर या उनका ग्रध्ययन कर हम जान सकते हैं कि श्रमुक चित्रकार ने किस प्रकार का जीवन-निर्वाह किया कलाकार समाज का नेता होता है, पथप्रदर्शक होता है, इसलिए उसके जीवन के तरीकों को समझकर हम भी अपना जीवन उन्हीं ग्राधारों पर व्यतीत कर सकते हैं और श्रानन्द की प्राप्ति कर सकते हैं। जिस प्रकार धामिक तथा बौदिक नेताश्रों की लिखी हुई पुस्तकें, उनका दर्शन, उनकी वाणियाँ, उनके ग्रादर्श, उनकी सम्मतियाँ, उनके उपदेश जानकर हम जीवन को सफल बनाते हैं, उसी प्रकार कलाकारों के चित्रों को देखकर तथा उनका अध्ययन कर

एक प्रश्न

चित्र सभी देखते हैं और यह जानते हैं कि चित्र किसे कहते हैं चित्र की परिभाषा जानने की एक बच्चे को भी आवश्यकता नहीं पड़ती वह जन्म से वर्ष भर के अन्दर ही चित्र क्या है, जान लेता है आरम्भ में थोडा भ्रम अवश्य होता है बच्चा अपनी मा को देखता है, दूध पीता है, उसकी गोदी से लिपटा रहता है पिता को पहचानता है, और धीरे-धीरे भाई-बहनों को पहचानने का प्रयत्न करता है। मा को तो खूब पहचानने लगता है आप बच्चे के सामने उसकी मा का एक बड़ा फोटो रख दें, वह उसकी ओर निहारेगा फोटो यदि रंगीन हो तो वह जल्दी आक्ृष्ट होगा कल्पना कीजिए, यदि उसकी माँ का ऐसा रंगीन फोटो उसके सम्मुख रखा जाय जिसमें मा का वक्षस्थल उघरा हो शौर साफ-साफ दृष्टिगोचर हो, तो क्‍या होगा ? मेने ऐसे समय बालक को हाथ बढ़ाते देखा है। वह भ्रम में पड़ता है, चित्र को ग्रपनी मा समझता है और श्राशा करता है कि वह भी मा की तरह उसे दूध पिलाये

यह तो वर्ष भर के बालक की बात हुई वह चित्र को चित्र नहीं समझता बल्कि कोई वस्तु समझता है, जिसे वह छुना चाहता है, पकड़ना चाहता है, लेना चाहता है उसके सामने शीशा रख दीजिए, वह अपनी शक्ल देखकर उसे ही पकड़ना चाहता है शीशे को बार-बार अपनी नन्‍हीं उँगलियों से नोचता है। पाता कुछ नहीं, केवल अनुभव मैंने कई बार अपने कमरे में रखे बड़े शीशे पर गौरैया को झगड़ते देखा है गौरेया भ्रपनी सूरत शीशे में देख- कर घबड़ाती थी कि यहाँ दूसरी गौरेया कहाँ से श्रा गयी वह शीशे पर बार-बार अपनी चोंच मारती थी, लड़ती थी, और उसे ऐसा करते मैने लगातार हफ्ते भर देखा है गौरैया भी बालक की भाँति शीशे में अपने प्रतिबिम्ब को सच समझती है, और उससे लड़ने का प्रयत्न करती है, झुंझलाती है, कभी शीशे के पीछे जाकर देखती है, कभी आगे आकर, कभी श्रावाज देकर उसे भी भ्रम हो जाता है-चित्र को, प्रतिबिम्ब को वस्तु समझती है वर्ष भर का बालक और चिड़िया बराबर हैं। बिलकुल एक-सी प्रकृति

क्या यह प्रकृति आगे चलकर बदलती है ? खास कर मनुष्य में ? क्‍या वह चित्र को वस्तु समझना छोड़ देता है ? क्‍या प्रतिबिम्ब को वह सच नहीं मानता ?

कला श्रौर श्राधुनिक प्रवृत्तियाँ

मेरा ख्याल है, बड़ा मुश्किल है आप स्वयं विचार करें, आप में श्र बालक में क्‍या अन्तर है ?

सदियाँ बीत गयीं, युग बीत गये मनुष्य का रूप, रंग, चाल-चलन, आचार-विचार सब कुछ बदल गया बुद्धि का विपुल विकास हुआ मनुष्य परमाणु शक्ति के बल पर शीघ्र ही चन्द्रलोक में पहुँंचनेवाला है, परन्तु आज भी चित्र को वस्तु समझने का भ्रम बना है अपनी जगह है यूरोप के विश्व-विख्यात कलाकार खझूवेन्स ने ऐसे चित्रों का निर्माण किया जिनमें शरीर के अंग, जीवित लहू-युक्त मांस-पेशियों-से प्रतीत होते हैं और उन्हें छुकर देखने की भ्रनायास इच्छा होती है भारतवर्ष में ऐसी कला तो दृष्टिगोचर नहीं हो सकी, पर राजा रवि वर्मा ने इस ओर प्रयास किया था और भी इस प्रकार के चित्रकार थे, और हैं, यद्यपि उतनी सफलता उन्हें प्राप्त नहीं हुई हमारे समाज में भी अधिकतर व्यक्ति चित्र का यही आदर्श आज भी मानते हैं और कलाकार से ऐसी ही आशा करते हैं कया में कहूँ कि बालक, गौरया और मनुष्य की प्रकृति चित्र के प्रति आज भी एक-सी है ? हम चाहते हैं कि चित्र ऐसा हो जो वस्तु का श्रम उत्पन्न कर सके चित्र में किसी वस्तु का ऐसा चित्रण हो जो हमें भ्रम में डाल दे और चित्र में बनी वस्तु हम वही वस्तु समझ सकें

आधुनिक कला ने हमारी इस प्रकृति के बिलकुल विपरीत कदम उठाया है-हमारा अम ही हमसे छीना जा रहा है कैसे हम श्राधुनिक कला का आदर कर सकते हैं ?

भारतवर्ष में यद्यपि और बातों में मति-भ्रम हुआ है, परन्तु भारतीय प्राचीन चित्रकला का इतिहास प्रमाण है कि इस भ्रम में पड़ने का यहाँ कभी प्रयत्न नहीं हुआ

आज यूरोप तथा अन्य पाश्चात्य देशों में भी आधुनिक कला ने इस भ्रम के विरुद्ध मोर्चा बना लिया है चित्रकला स्वाभाविकता से कहीं दूर पहुँच गयी है

चित्र चित्र है, वस्तु वस्तु है दोनों एक नहीं हैं हाँ, वस्तु का भी चित्रण हो सकता है, होता आ्राया। है, हो रहा है और भविष्य में भी होगा अब प्रश्न यह है कि क्‍या वस्तु का ही चित्रण करना कला है ऐसा समझा जाता था और झ्राज भी लोग ऐसा ही समझते हैं चित्र शब्द का सम्बोधन करते ही प्रश्न उठता है, किस वस्तु का चित्र ? किसी जीव, पदार्थ या वस्तु का चित्र ? यह समझना एक परम्परा-सी हो गयी है। यही परि- भाषा बन गयी है-चित्र किसी वस्तु का होता है भ्रर्थात्‌ चित्र रेखा, रंग, रूप के माध्यम से किसी वस्तु का चित्रण होता है चित्र वस्तु का चित्रण होकर और वया हो सकता है ? वस्तु-चित्रण ही कला है, ऐसा भ्रधिकतर लोगों का ख्याल है !

एक श्रश्त

इससे झ्रागे जब हम बढ़ते हैं तो सम्य समाज में धारणा यह होती है कि कला का कार्य केवल वस्तु-चित्रण ही नहीं है, बल्कि कला के माध्यम से हम अपनी भावनाओं तथा विचारों की भी अभिव्यक्ति कर सकते हैं। चित्र ऐसा हो जो देखनेवाले के मन पर प्रभाव डाले, विचारों में परिवर्तन करे, नये विचार दे या कहिए कोई नव सन्देश यवत करे-चित्र को बोलना चाहिए बात जेँंच गयी, जम गयी और सम्य शिक्षित समाज ने इसी को-चिन्न की कला समझा वस्तु से थोड़ा ऊपर उठकर भावना, विचार या सन्देश को प्रधानता मिली पर यह सब वस्तु-चित्रण के द्वारा होना चाहिए, इसमें सन्देह था, आस्था बन गयी यद्यपि वस्तु से अ्रधिक प्रधानता ग्रभिव्यक्ति को प्राप्त हुई साथ-साथ भाव यह भी बना रहा कि चित्र सुन्दर होना चाहिए। श्रर्थात्‌ वस्तु का चित्रण हो, भावना, विचार तथा सन्देश व्यक्त हो, भौर सुन्दरता हो कला श्रागे बढ़ी अ्रजन्ता, मुगल, राजपूत-सभी भारतीय प्राचीन कला-शैलियों में इस भाव का समावेश था आधुनिक कलाकारों ने पुनः इन भावों को दुढ़ किया समाज ने इसे समझने का प्रयत्न किया

फिर आधुनिक कला नें वस्तु-चित्रण के स्थान पर यह क्‍या किया ? ऐसे चित्र बनते हैं जिनमें यह मालूम ही नहीं पड़ता कि चित्र किस वस्तु का है, क्‍या भावना, विचार या सन्देश व्यक्त होता है। इन आधुनिक सूक्ष्म चित्रों को देखकर केवल जटिलता का बोध होता है। चित्रकारों का पागलपन या विक्ृति नज़र आ्राती है। यूरोप, अमेरिका, इंगलैण्ड - सभी देशों के कलाकार पागल हो गये है, विकृत हो गये है, कि वहाँ मुश्किल से अब कोई ऐसा नया चित्र दिखाई पड़ता है जिसमें किसी वरतु का चित्रण हो, क्या भावना या सन्देश है इसका पता लगे सुन्दरता तो नज़र ही नहीं श्राती इन चित्रकारों को पागल समझनेवाले वहाँ काफी हैं, पर इसकी सचाई भारतवासियों को सात समुद्र पार से ही मालूम हो गयी है। हम विज्ञान में यूरोप से भले पीछे हों, पर सचाई तो हम ही दूसरों को सिखा सकते हैं हमें इस पर गवे है इसका हमें दावा है अफसोस तो इस बात का है कि हमारे कलाकार स्वयं पागल हुए जा रहे हैं, इन पाश्चात्य कलाकारों को देखकर क्या हमारे कलाकारों की बुद्धि भ्रष्ट हो गयी है ? क्‍या श्राजादी प्राप्त करने के बाद यही कार्य बाकी रह गम है ? पिछले वर्षों दिल्‍ली में 'ललित कला भ्रकादमी' को प्रदर्शनियों में सूक्ष्म कला की बाढ़-सी गयी रोके रुकी यहाँ तक कि प्रदर्शनी के सूचीपत्रों में दिये चित्रों तथा मान्यता प्राप्त चित्रों में केवल सूक्ष्म चित्र ही दिखाई पड़े क्या यह चिन्ता का कारण नहीं ? हमारे विद्वान्‌ कला-रसिक, कला-इतिहासज्ञ, कला- पारखी इसे क्‍यों नहीं रोक पाते ?

इसीलिए कि क्रान्ति रोके से नहीं रुकती, तूफान थामे नहीं थमता तो कया होगा ?

कला प्रोर भाधुनिक प्रवत्तियाँ

कह क्या ? “वही होता है जो मंजरे खुदा होता है।” या तो तूफान का सामना कीजिए या इस तूफान की ताकत का बुद्धि से मानवता के लिए प्रयोग कीजिए दूसरा रास्ता नहीं

इस तूफान का तात्य क्या है ? यह क्यों है ? कहां से भ्राया ? कहाँ हमें ले जायगा ! क्या यह घातक है ? यही है भ्राज की कला के सम्मुख एक प्रश्न !

एक तूफान

१६४७ ई० में भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की जो एक महान क्रान्ति का फल है। भारत विदेशियों की सत्ता से मुक्त हुआ स्वतंत्रता की इस क्रान्ति का मुकाबिला श्रंग्रेज कर सके उन्हें भारत छोड़ना पड़ा स्वतंत्रता की लहर प्रत्येक भारतीय की नस-नस में दौड़ने लगी, चाहे वह गरीब हो या श्रमीर, छोटा हो या बड़ा, पढ़ा-लिखा हो या जाहिल कलाकार, साहित्यकार, विचारक - सभी ने स्वतंत्रता की गंगा में स्नान किया | हमने अपने विचार, सामाजिक जीवन तथा कार्य, सभी में स्वतंत्रता का अनुभव करना शारम्भ किया जिस प्रकार तूफान के खत्म हो जाने के पश्चात्‌ वह सष्षटि के प्रत्येक पदार्थ पर अपनी छाप छोड़ जाता है, उसी प्रकार स्वतंत्रता का तूफान अपनी स्वतंत्रता की भावना यहाँ के प्रत्येक व्यक्ति के मस्तिप्क पर अंकित कर गया हो सकता है कि सामाजिक तथा आशिक दृष्टिकोण से समाज का खाका इसका अ्रधिक लाभ उठा सका हो, परन्तु समाज के मूल कर्णधार साहित्यिकों, कलाकारों और विचारकों के भीतर यह स्वतंत्रता का तूफान एक गहरी छाप छोड़कर ही गया विचारों की स्वतंत्रता इसमें सबसे प्रधान है

कलाकार तो ऐसे प्रभावों को बहुत ही शी ध्रता से ग्रहण करता है और उसी का फल है आधुनिक भारतीय चित्रकला में स्वतंत्र चित्रण का एक तूफान इस तूफान से पहले भारतीय चित्रकला बंगाल शैली के सहारे जीवित होने का साहस कर रही थी एकाएक कला के क्षेत्र में एक नया तूफान उमड़ पड़ा, स्वतंत्र चित्रण का। तूफान दिन पर दिन जोर पकड़ता जा रहा था। अभी उसकी तीक्रता बढ़ती ही जा रही है। भारतीय चित्र- कला पर यह तूफान क्या असर छोड़कर जायगा, यह झ्राज निश्चित नहीं कहा जा सकता, परन्तु आज भी हम तूफान का जो रंग देख रहे है उसका संक्षिप्त वर्णन तो कर ही सकते हैं और उसी आधार पर उसका विश्लेषण भी किया जा सकता है

आधुनिक समाज में कला और कलाकार

प्रथम बार भारतीय कलाकारों को राज्य की ओर से सम्मान प्राप्त होना प्रारम्भ हुआ है, जिसकी चर्चा हमने समाचार-पत्रों में पढ़ी है। इन सम्मानित लब्धप्रतिष्ठ प्रथम कलाकारों में श्री नन्दलाल बोस, श्री शिवास्क चावड़ा, श्री यामिनी राय, श्री के० के० हेब्बर, श्री रामकिकर, श्री एन० एस० हसेन, श्री आइ० एन० चन्रवर्ती, श्री के० मी० एस० पनीकर और श्री के० शंकर पिल्लई हैं मेरा ख्याल है, हममें से बहुत कम लोग है जो नन्‍न्दलाल बोस के अतिरिक्त किसी और कलाकार का नाम जानते हैं या उनकी कला से परिचित हैं यह बहुत ही दुःख की बात है कि हम राजनीति तथा साहित्य के क्षेत्र में पिद्दी से नेता तथा कवि या साहित्यकार का नाम भी जानते हैं, पर अपने देश के अग्रगण्य कलाकारों से जरा भी परिचित नहीं

तात्पयं यह है कि अभी हमारा देश कला के क्षेत्र में सोया हुआ है कला-विहीन जीवन मृत्यु के समान है; ऐसी अवस्था का कारण हम और आप हैं हमने अ्रभी तक इस ओर ध्यान दिया ही नहीं है। हमने श्रपने जीवन में कला को कोई स्थान नहीं दिया और इसके लिए हमें दूसरों का मुह ताकनः पड़ता है में आज के आधुनिक हिन्दी साहित्तयिकों, आलोचकों तथा विद्वानों को चेतावनी देता हूँ कि अगर इस ओर उन्होंने ध्यान नहीं दिया

तो वह दिन दूर नहीं जब देश पुन: सुप्तावस्था को प्राप्त होने लगेगा

इस सबका कारण यह है कि अभ्रभी तक हमने यह भली-भाँति अनुभव ही नहीं किया है कि कलाओं का हमारे जीवन में क्‍या महत्त्व है। हमारे साहित्यिक समझते हैं कि यदि किसी कवि या लेखक की आलोचना कर सकें या कोई गप्प या कथा लिख सकें या वर्तमान आशिक तथा राजनीतिक टिप्पणी लिख सकें तो उनका हिन्दी के प्रति कत्तंव्य पूरा हो जाता है, पर साहित्य इतना ही नहीं है साहित्य में जीवन के सभी पक्ष होने चाहिए साहित्य और कला में बहुत गहरा सम्बन्ध है

साहित्य का कार्य स्वयं कला का काये है या कला है, परन्तु साहित्य का मुख्य कार्य है कलाझ्रों को प्रेरणा देना साहित्य का विषय कला होता है। यदि हम साहित्य की

प्राधुनिक समाज में कला श्रोर कलाकार ११

उत्पत्ति पर ध्यान दें तो देखेंगे कि जीवन में कला का कार्य सबसे पहले आता है जीवन को बनाये रखना, सुन्दरतापूर्वक जीवन निर्वाह करना, स्वयं कला का कार्य है और आदि- काल से है इसी के अन्तर्गत और सभी कलाओं का प्रादुर्भाव हुआ इसके पश्चात्‌ जब भाषा-कला की उत्पत्ति हुई तो इसके माध्यम से अन्य कलाओं या मनुष्य के कार्यों का ब्यौरा साहित्य के रूप में इकट्ठा होने लगा और आ्राज भी होता जा रहा है कोई साहित्य तभी महान होता है जब वह मनुष्य के जीवन के प्रत्येक का्य पर या कहिए प्रत्येक कला पर साहित्य का निर्माण कर लेता है साहित्य किसी जाति या देश को ऊपर उठाता है, क्योंकि वह वहाँ के प्राणियों में प्रेरणा भरकर आगे कार्य करने की क्षमता प्रदान करता है और यही साहित्य का सबसे महान कार्य है ज्यों-ज्यों विभिन्न प्रकार का साहित्य तैयार होता जाता है, देश उन्नति के शिखर पर चढ़ता जाता है पूर्ण साहित्यकार वही है जो मनृप्य को भली-भाँति समझता है और उसको कला का कार्य करने के लिए प्रेरित करता है, क्योंकि कला या निर्माण के काये पर ही देश या जाति का भविष्य निर्भर करता है इस दृष्टि से आधूनिक हिन्दी साहित्य की क्‍या प्रगति है, हम आँक सकते हैं, और शायद इसीलिए मेकाले ने कहा था कि सारे एशिया का साहित्य अंग्रेजी साहित्य की एक अल- मारी के बराबर भी नहीं, हिन्दी का क्या कहना यदि हम चाहते हैं कि दुबारा ऐसा शब्द कोई अपने मुह से यहाँ के साहित्य के बारे में निकाले तो हमें जल्दी से जर दी होश में भरा जाना चाहिए और भारतीय विभिन्न कलाओों पर उच्चतम साहित्य का निर्माण करना चाहिए श्राज कला का विद्यार्थी या कला-रसिक प्रेरणा लेने के लिए जब हिन्दी साहित्य को ओर निहारता है तो उसे निराश होना पड़ता है मेरा ख्याल है कि हिन्दी-प्रेमी इसे एक चुनौती के रूप में लेना स्वीकार करेंगे

यीं हिन्दी भाषा में भी साहित्यकार कला पर कभी-कभी शौकिया तौर पर लिखने का प्रयत्न करते हैं और यह ग्रच्छे लक्षण हैं, पर दिक्कत तब होती है जब वे केवल सुनी भाषा बोलते हैं, जिससे यह तुरन्त ज्ञात हो जाता है कि कला में रस उन्हें श्रभी नहीं मिल पाया है, भ्रौर बस सब मज़ा किरकिरा हो जाता है। अ्रच्छा साहित्यकार मनुष्य तभी बन पाता है जब वह जीवन में रस लेता है, जीवन में आनेवाली प्रत्येक वस्तु तथा घटना उसके हृदय में घर कर चुकी हो, उस पर उसने विचार तथा मनन किया हो। साहित्य का निर्माण केवल शब्दों से नहीं होता, बल्कि आत्मानुभूति पर निर्भर करता है किसी कलाकार के बारे में यह कह देना कि वह महान्‌ है, अद्भुत है--इतने से ही उसकी कला का परिचय नहीं मिल सकता जब तक वह अपनी अनुभूति प्रकट नहीं करता, उसका वर्णन बेकार हो जाता है और मालूम पड़ता है कि ये शब्द इसने कहीं से चुराये हैं

आज की आधुनिक चित्रकला एक अनोखा रूप धारण कर रही है और दिन-दिन उसका

१२ कला भझोर झाधुनिक प्रवृत्तियाँ

प्रचार भी अधिक बढ़ता जा रहा है, परन्तु फिर भी हम उसका आनन्द नहीं ले पाते इस प्रकार के अनेकों श्राधुनिक चित्रकार कार्य कर रहे है, पर तो हम उनका नाम जानते हैं श्रौर उनकी कला से ही परिचित हैं शुरू में मैंने उन आठ कलाकारों का नाम लिया है जिनको राज्य की ओर से प्रथम पदक मिले थे उनमें अधिकांशत: आ्राधुनिक विचार के कलाकार हैं, पर हम में से शायद कोई भी उनकी कला से परिचित नहीं ऐसा पदक कलाकार नन्दलाल बोस को भी मिला है, जिनके नाम से तो प्राय: हम सभी परिचित हैं, चाहे कला से हों नन्दलाल बोस वयोवृद्ध चोटी के कलाकार हैं, उनकी सेवाओं पर भारत को गवं है, पर क्या अन्य सातों सम्मानित कलाकारों को जानना और उनकी कला से परिचित होना हमारा ककत्तंव्य नहीं है ? इनमें से कुछ तो बिलकुल आधूनिक हैं नन्दलाल बाबू का नाम तो धीरे-धीरे सभी ने सुन लिया है, पर इन कलाकारों की कला को भी सम्मान मिलना चाहिए। साहित्य या कला किसी एक की निधि नहीं होती उस पर सबका अधिकार है श्रौर सभी को कला का कार्य करने के लिए प्रेरणा की आवश्यकता है एक शोर जब साहित्य का यह कत्तंव्य है कि वह समाज को यह बताये कि पहले क्‍या हो चुका है, तो उससे भ्रधिक महत्त्व की बात यह है कि भावी कलाकारों को प्रेरणा दे जिनके ऊपर हमारा भविष्य निर्भर करता है

लोगों का ख्याल है कि कला में आनन्द पाना सावेजनिक नहीं है और इसमें आनन्द उसी को मिल सकता है जो स्वयं कलाकार है या जिसने थोड़ा-बहुत कला का अध्ययन किया है। कला में प्रवीणता या उसमें रस पाना एक ईश्वरीय वरदान है, यह कथन और भी सत्य प्रतीत होता है जब हम देखते हैं कि ग्राधुनिक समाज में कला को क्या स्थान प्राप्त है कलाकार जीवन भर रचना का कार्य करता है, पर भ्रक्सर वह समाज में अपना स्थान नहीं बना पाता, समाज उसके परिश्रम का मूल्य ही देता है कला की साधना करना कला- कार के लिए जीवन से लड़ना है कितने ही कलाकार अपने लह से रचना करके मिट गये, परसमाज उन्हें जानता तक नहीं, उनकी कला का रस लेना तो दूर रहा। ऐसा समाज यह भी कहता है कि कला एक साधना है जिसके लिए मर मिटना कलाकार का कर्त्तव्य है बिना बलिदान के कला प्राप्त नहीं हो पाती इतना ही नहीं, लोगों का विश्वास है कि कलाकार उच्च रचना तभी कर सकता है जब दुनिया भर का दुःख वह भोग ले और तड़पन की ज्वाला में भुजते हुए जब उसके मुह से आह निकलने लगे, तभी वह सफल रचना कर सकता है। शायद ऐसा समाज इस आ्राह. .. में सबसे श्रधिक रस पाता है पाठक क्षमा करेंगे यदि में कहूँ कि रोम का शासक विख्यात नीरो सबसे महान्‌ व्यक्ति था और उसे कला की सबसे ऊँची परख थी, इसीलिए वह मनुष्य को खुखार भूखे शेरों के कटघरों में डालकर उस व्यक्ति के मुंह से निकली हुई श्राह का रसास्वादन सुनहले

ग्राधुनिक समाज में कला श्रौर कलाकार १३

त्ख्त पर बैठकर शराब की चुस्कियाँ लेता हुआ करता था झौर तारीफ यह कि वह उसका आनन्द लेन के लिए श्रपन समाज के श्रन्य व्यक्तियों को भी निमंत्रित करता था। हजारों की तादाद में लोग इकट्ठा होकर इस झाह का रसास्वादन करते थे

जरा कल्पना कीजिए कि आप कलाकार होते और नीरो के राज्य में जीवन-निर्वाह करते होते ! एक दिन शेर के कटघरे में यदि आप डाल दिये जाते और शेर ने आपकी छाती में भ्रपना न॒कीला पंजा चभाया होता, उस समय नीरो आपको कवित। पाठ करने की आज्ञा देता तो आपकी क्‍या दशा होती ? नीरो तो एक व्यवित था, कभी-कभी सारा समाज नीरो बन जाता है

यह सत्य है कि भावों के उद्बेग में ही कला की उत्पत्ति होती है, परन्तु भाव से कलाकार पैदा नहीं होते, कलाकार भाव पैदा करते हैं। एक भूखे से पूछिए कि कला कहाँ है तो कटेगा रोटी में, एक अंधे से पूछिए तो कहेगा अंधेरे में, राजा कहेया महलों में और रंक कहेगा झोपड़ी में, राजनीतिज्ञ कहेगा राजनीति में, धामिक कहेगा धर्म में श्रर्थात्‌ प्रत्येक व्यक्ति की जैसी मनोवृत्ति होगी उसी रूप में वह अपने वातावरण को समझेगा, जिस प्रकार लाल यश्मा लगा लेने पर सारी दुनिया लाल दीखती है यह चश्मा कला का गला घोंटता है, सत्य पर परदा डाल देता है सच्चा कलाकार वही है जो इस चद्मे को उतार फेंकता है और पैनी आँखों से सत्य की ओर देखता है कलाकार भाव का गुलाम नहीं होता, भाव कलाकार का गजाम होता है वह रचना जो चश्मे के ग्राधार पर हुई है, कभी सफल तथा सच या सुन्दर नहीं कही जा सकती सच्ची कला की रचना तब होती है जब कलाकार कमल की भाँति कीचड़ में रहकर भी कीचड़ से ऊपर होता है और ऊपर रहकर भी अपनी जड़ उसी कीचड़ में रखता है, उससे भी अपनी खुराक लेता है। अर्थात्‌ सच्चा कलाकार वह है जो नीचे रहकर भी ऊपर को जान ले और ऊपर होकर भी नीचे को पहचानता हो वह समदर्शी होता है वह भावों का गुलाम नहीं होता, भावों को वह उत्पन्न करता है

किसी विख्यात कथाकार से जब पूछा गया कि प्रेम सम्बन्धी कथा-साहित्य का निर्माण सबसे अच्छा किस समय होता है तो उसने कहा कि जब कथाकार ने प्रेम करना छोड़ दिया हो जिस समय व्यक्ति स्वयं किसी के प्रेम में बंधा रहता है, उस समय यदि बह प्रेम पर कुछ लिखे तो वह प्रेम में श्रन्धा भी हो सकता है जब वह प्रेम कर चुकता है और उससे काफी अनुभव प्राप्त कर लेता है, और स्वयं हृदय तथा मस्तिष्क से किये हुए भ्रनुभव पर पुनः: मनन करता है, तब उसे सच्ची अनुभूति प्राप्त होती है और तब उसकी रचना स्वस्थ तथा सुन्दर होती है, क्योंकि भ्रब वह प्रेम का गुलाम नहीं है कथाकार प्रेम में अन्धा होकर नहीं लिख रह है, बल्कि प्रेम से ऊपर होकर प्रेम पर शुद्ध रूप से विचार कर रहा

श्ड कला शोर आ्राधुनिक प्रवत्तियाँ

है इसी प्रकार क्षणिक भाववेद में आकर बिना भली-भाँति मनन किये उत्कृष्ट रचना नहीं हो सकती और श्रगर ऐसे समय रचना होती है तो वह स्वस्थ नहीं होती इस प्रकार यह समझना कि सच्ची कला की रचना उसी समय हो सकती है जब कलाकार भूखा हो, दरिद्र हो और दुनिया की मुसीबतों से जर्जरित हो गया हो, नितान्त मूर्खता है ऐसी भावना उन्हीं लोगों की होती है जो कलाकार से उसी प्रकार की आह सुनने को उत्सुक होते हैं जैसे नीरो मनुष्य को शेर के कटघरे में डालकर सुनता था

सच्ची और उत्कृष्ट कला की रचना उसी समय हो सकती है जब कलाकार के मन, मस्तिप्क और शरीर में सुडौलता रहती है यदि एक कलाकार जिसको हजार कोशिश करने पर भी दोनों समय का खाना नहीं जुटता, कविता की रचना करना चाहें तो उसके मन में सुडोलता कभी नहीं रह सकती या तो वह भूख-तड़पन से पीड़ित रचना करेगा और समाज के अन्य व्यक्तियों के प्रति आग उगलेगा या जिस प्रकार भूखा कुत्ता किसी को कुछ खाते देखकर जीभ तथा पूछ हिलाता है और लार टपकाता रहता है, दया का पात्र बनेगा, दूसरों को कुछ देना तो दूर रहा

सच्ची कला की रचना उसी समय हो सकती है जब कलाकार सुखी और सम्पन्न हो, हृष्ट पुष्ट हो, सुडौल विचारवाला हो, समाज से घृणा करता हो, किसी के प्रति द्वेष रखता हो, जीवन का मूल्य समझता हो इसका यह तात्पर्य नहीं कि आज तक जितने उत्कृष्ट कलाकार हुए हैं उनको यह सब प्राप्त था मेरा तो यह कहना है कि भ्रगर उनको यह सब भी प्राप्त होत। तो और भी ऊँची कला का निर्माण हुआ होता और आज उनकी देन से हमारा समाज और भी ऊचे तथा सुडौल धरातल पर होता कलाकार एक घड़े के समान है जैसा जिसका घड़ा होता है, संसार से वह उतना ही उसमें भर पाता है अगर घड़ा टेढ़ा-मेढ़ा है, फूटा हुआ है तो उसमें क्या रह सकेगा, यह साफ है सुडौल, मजबूत तथा सुन्दर घड़ा ही अपने ग्रन्दर कोई बड़ी तथा सुन्दर वस्तु रखने की कल्पना कर सकता है

इस प्रकार उत्कृष्ट रचना के लिए यह आवश्यक है कि कलाकार हर प्रकार से सुडौल हो, विशाल व्यक्तित्ववाला हो उसे किसी प्रकार की लालसा हो अर्थात्‌ बनारसी भाषा में “मस्त रहनेवाला” हो इसी मस्ती में उससे कुछ उत्तम रचना की आशा की जा सकती है कलाकार चिन्ता से रहित हो, ऐसे त्यागी के समान हो जिसे कुछ पाने की लालसा हो अपितु समाज को कुछ देने की क्षमता हो वह अपने लिए चिन्तित हो बल्कि समाज की शुभकामना करता हो समाज का व्यक्ति होते हुए भी समाज के दायरे से ऊपर उठकर समाज का निरीक्षण कर सकने की क्षमता रखता हो अपने को अकेला समझे बल्कि घट-घट में व्याप्त होने की क्षमता रखता हो ग्रपनी भावनाओं में बहनेवाला

झाधुनिक समाज में कला और कलाकार १५

हो बल्कि दूसरों के भावों में प्रवेश करने की क्षमता उसमें हो अपना दर्द लिये समाज को दर्दीला बनाये बल्कि समाज के दर्द से व्यथित होनेवाला हो अ्रपनी खुशी में मस्त हो बल्कि समाज की खुशी में हिस्सा लेनेवाला हो समाज के साधारण व्यक्ति के समान मुसीबतों में रोनेवाला हो बल्कि समाज का पथ-प्रदशन करने की क्षमता रखता हो

संसार में जीव जो कुछ करता है, सुख पाने की लालसा से करता है सुख की वृद्धि के लिए ही समाज भी बनता है जब व्यक्ति अ्रकेले सुख प्राप्त करने में ग्रसमर्थ होता है तब उसे समाज की शरण लेनी पड़ती है समाज से उसे बल मिलता है समाज की शक्ति उसे श्रधिक सुख की प्राथ्ति कराने में सहायक होती है मनुष्य बाल्यकाल से लेकर वृद्धा- वस्था तक समाज पर आश्रित रहता है वह जो कुछ सीखता है, अनुभव करता है या प्राप्त करता है, उसका झाधार समाज ही होता है व्यक्ति समाज का एक अंग है जो समाज के द्वारा पोपित होता है व्यक्ति का जो स्वरूप बनता है वह उसका अपना रूप नहीं है और श्रगर है तो बहुत थोड़ा-सा, श्रधिकतर समाज का ही दिया हुआ रूप होता है समाज यदि जननी है तो व्यक्ति उसका बालक जिस प्रकार बालक माता-पिता के गुणों को संजित कर विकसित होता है, उसी प्रकार व्यक्ति समाज के गुणों को संचित कर भविष्य के अनुरूप बनता है। मेढ़क का बच्चा मेढ़कों-सा ही व्यवहार सीखता है और मेढ़कों के ही समाज में रहना चाहता है वह उनसे कभी अलग हो ही नहीं सकता इसी प्रकार व्यक्ति अपने जीवन में सब कुछ समाज से ही सीखता है श्नौर उसी जैसा व्यवहार करता है उसके किसी व्यवहार को हम अ्रसामाजिक व्यवहार नहीं कह सकते, क्योंकि वह समाज का ही बनाया हुआ है और उसके उचित या अनुचित कार्यो का उत्तरदायित्व भी उसी समाज पर है जिसका वह एक अंग है

जब व्यक्ति समाज का ही बनाया हुआ है, समाज पर ही आश्चित रहता है तब यह कहा जा सकता है कि उसे अपनी सारी शक्ति समाज के हित तथा प्रगति के लिए प्रयोग करनी चाहिए यही उचित है और न्याय-संगत भी जब हम किसी से लेते हैं, तो उतना ही उसे देना भी चाहिए अगर यह ठीक है तो व्यक्ति समाज को वही दे सकता है जो उसने पाया है कलुषित समाज में पैदा हुआ तथा पला-पोसा व्यक्ति समाज को कालिमा ही देगा, यह स्वाभाविक है मेढ़क मेढ़कों से पंदा होकर तथा तालाब के वाता- वरण में रहकर वही कार्य करेगा जो श्रन्य मेढ़क करते हैं, और जो तालाब के वातावरण में हो सकता है मेढ़क घड़ियाल बन सकता है, तालाब के वातावरण में स्वच्छ कमल उसका आचरण सदैव मेढ़कों का-सा ही होगा परन्तु मेढ़क श्र मनुष्य में ग्रन्तर माना गया है| अन्तर है मस्तिष्क का | मस्तिष्क की शक्ति अपार है, कल्पना से भी अधिक परन्तु मनुष्य का मस्तिष्क भी मनुष्य का ही मस्तिष्क है, उसी दायरे में है,

१६ कला शोर श्राधुनिक प्रवत्तियां

उससे परे नहीं है मनुष्य वही कर सकता है जो मनुष्य की क्षमता के अ्रन्दर है, जिस प्रकार मेढ़क तालाब में रहकर वही कर सकता है जो मेढ़कों की क्षमता के भीतर है श्रब प्रश्न यह है कि मनुष्य की क्षमता क्या है श्रौर कितनी है। कभी-कभी तो मनुष्य की क्षमता को भी अपार माना गया है यह क्षमता कहाँ से आती है समझ में अहीं आ्राता जो भी हो, साधारण दृष्टि से मनुष्य की क्षमता वही हो सकती है जो उसे प्राप्त है और मनुष्य को अपनी उस शक्ति का उपयोग समाज में ही करना है, समाज से जो लिया है उसे समाज को ही देना है

इस विचार से “कला कला के लिए है” यह न्याय संगत नहीं मालूम पड़ता कला मनुष्य का काये है, एक शक्ति है मेढ़कों का कूदना, फ़ुदकना, टर्र-टर करना भी एक प्रकार की कला है श्र जिस प्रकार उनकी कला का उपयोग उनके लिए तथा उनके समाज के श्रन्य मेढ़कों के लिए ही है, उसी प्रकार मनुष्य की कला का उपयोग भी उसके लिए तथा केवल मनुष्य के समाज के लए ही है मेढ़कों ने फ़ुदकना तथा टरं-टर्ं करना मेढ़कों से ही सीखा है। उनकी इस कला का गुरु उनके माता-पिता तथा उन मेढ़कों का समाज ही है उसी प्रकार मनुष्य भी कलाओों को अपने समाज से ही सीखता है, कला का कार्य करने की प्रेरणा भी उसे अपने सामाजिक जीवन की अनुभूतियों से ही प्राप्त होती है। उसकी कला का रूप उसकी अनुभूतियाँ होती हैं, फिर “कला कला के लिए है” यह कंसे कहा जा सकता है ? लेकिन 'कला कला के लिए है” यह विचार बड़ा प्राचीन है श्नौर इसमें विश्वास करने वाले आज भी बहुत से हैं। आधुनिक पिकासोवाद, सूक्ष्मवाद, क्यूबिज्म, सूरियलिज्म, इत्यादि सभी “कला कला के लिए है” से प्रभावित कहे जा सकते हैं, क्योंकि इन सभी प्रकार की दैलियों में सामाजिक-चित्रण बहुत ही कम मिलता है, और मिलता भी है तो जोर भ्रन्य वस्तुश्रों पर दिया होता है, खास कर रूप तथा रंग पर ऐसे चित्र में विषय गौण-सा रहता है। इन चित्रों का आनन्द साधारण समाज नहीं ले पाता, परन्तु कलाकार इनसे बहुत श्रानन्द पाता है ऐसे कलाकारों से लोग शिकायत करते हैँ कि उनके चित्र जनता की समझ में नहीं आते उस पर आधुनिक कलाकार चुप रहता है श्रौर इसकी चिन्ता नहीं करता कि उसके चित्र समाज को पसन्द हैं या नहीं ऐसी स्थिति में ही लोग कला को कला के लिए समझने लगते हैं, तब कलाकार समाज का ख्याल करता हुआ्ना नहीं दिखाई पड़ता यह स्थिति देखकर ही! फ्रांसीसी विचारक लकांतदलिस्ल 7,८€८0०07(6 06 /8]6 ने कहा है---

“कलाकार उसी समय इस विचार की ओर झुकता है कि “कला कला के लिए है,” जब वह अपने को अ्रपने सम।ज से जुदा पाता है।” अर्थात्‌ जब समाज कलाकार की कृतियों का मूल्य समझने में ग्रसफल होता है और कला का आ्रादर करना त्याग देता है, तब कला-

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कार निराश होकर कला का काये करना नहीं छोड़ देता, बल्कि कला का कार्य फिर भी करता जाता है श्रौर उसका आनन्द अ्रब स्वयं लेता है। उसे समाज से प्रशंसा की आशा नहीं रहती ऐसे समय जब उससे कोई कुछ पूछता है तो वह यह कहकर कि वह समाज के लिए कला की रचना करता है; कहता है कि वह अपनी रचना कला के लिए करता है, भ्रर्थात्‌ उसे उसमें मजा आता है इसलिए करता है वह ऐस। दूसरों को दिखाने के लिए नहीं करता ठीक भी है उसका ऐसा कहना, क्योंकि भ्रगर वह कहे कि वह अपनी रचना समाज के लिए करता है तो लोग कहेंगे कि समाज तो उसकी रचना को समझ ही नहीं पाता, उसका कोई आनन्द ही ले पाता है, तब कैसे वह कहता है कि वह अपनी रचना समाज के लिए करता है ? इसीलिए कलाकार यही कहना उचित और हितकर समझता है कि कला कला के लिए है ।'

एक बार किसी गाँव का एक धनी व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ पहली बार शहर घमने आ्राया बाजार में एक दूकान पर बड़ी भीड़ लगी थी और तरह तरह के स्त्री-पुरषों की तस्वीरें टंगी थीं दोनों वहीं रुक गये और यह जानने का प्रयत्न करने लगे कि आखिर माजरा कया है एक अन्य देहाती को दुकान से बाहर निकलते हुए देखकर अपनी भाषा में उससे पूछा- का गुरू, काहे भीड़ लागल बा ?” बाहर निकलते हुए देहाती ने अपनी तथा अपनी स्त्री का फोटो दिखाकर कहा--- गुरू देखा, केसन निम्मन बनौलेस हौ |” हमारे देहाती की स्त्री इन चित्रों को देखकर अपना फोटो खिचवाने के लिए मचल पड़ी दोनों दुकान में गये और फोटो खिंचवाया | फोटो जब हाथ में भ्राया तो सज्जन अपनी स्त्री का चित्र देखकर बड़े प्रसन्न हुए, पर जब स्त्री ने अपने पतिदेव का चित्र देखा तो उसे बड़ा अ्रचम्भा हुआ पतिदेव की एक आँख का चित्र में नाम-निशान था स्त्री ने पति के कान में कुछ कहा पति ने मारे नाराजगी के चित्र दुकान पर पटक दिया और कहा “मखौल करत हौवा महराज ?” वह डंडा सम्हाल ही रहा था कि दुकानवाले ने हाथ-पैर जोड़कर उन्हें किसी तरह बिदा किया समाज के