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परडनि की:

शानमण्डछ ग्रन्थमाहाका २७ वा मन्ध

पश्चिमी यूरोप भथम भाग

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अनुवादक

श्री छबिनाथ पाण्डेय, बी. ए. एल-पएल, बी.

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विषय-सूची

१--रोम संम्राज्यके अन्तिम दिन, क्रिस्तान+ - भसंका जागमन शा सर

२--जम॑न जातियोंका प्रवेश, रोमसाज्ाश्यका भधःपतन ..... ३--पोपका णभ्युद्य गे कल

४--संन्‍्यासियोंकी संस्था तथा घमंका उपदेश - फ्रांक शाउ्यकी उत्पत्ति ... दे

६-- धार मेन ( मददान्‌ चात्स )

“शाल मेनके साम्राजइयका गब्रैंटवारा के <-“-क्षश्रिय राजतन्तध ( फ्यूडेकित्पत ) . #... ९-० फ्रांस देशका उत्कृर्ष

१००आरल देश क्र. २] ११-इदकी कौर जमेनीकी चुद / » #..४

१२-सप्तम भंगरी और चतुर्थ हेनरीका झगड़ा ई-होइेन्स्टाफेन बादशाह और पौप छोग ... १४-ऋलेडकी यात्रा के 5 १७-मध्यथुगकोी धमसंसस्‍्थाकोी उच्चत अधपस्था १६-नास्तिकता भौर महन्त ... १७-ग्राग तथा नगर-निवासी ... > १८-मध्ययुगर्मे शिक्षा और सभ्पताकी डकषति १९-शातवर्षीय युद्ध 98६ २०-पोप तथा राज्य-परिषद्‌ ... कर २३६-कलछहके समयके पोपष ... 52 २-इटलीके नगर और नवयुग

२३-सोकदवीं शताब्दीके भरस्भमें यूरोपकी दशा २४ -प्रोटेस्टेण्ट आन्दीकनके पहिछे जम॑नौकी दशा :

२५-मार्टिन छूथर तथा धर्म-संस्थाके प्रतिकूछ उसका आन्दोछन

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अध्याय २६-जमंनीर्म प्रोदेस्टेण्ट ऋाण्तिकी प्रगति ... रे७२ हर

अध्याय २७-आंग्छ देश तथा स्विदजरलेण्डमें प्रोटेस्टेण्ट विद्रोह... रेइ४.. |

अफ््याय २८-कैथकिक मतका- सुधार- द्वितीय फिलिप हक... बेड.

अध्याय २९-तास पर्षीय युद्ध कल कि है०9०

अध्याय ३०-इंग्लैण्डमें वेध शासनका प्रयत्न पे कऔैण८

अध्याय ११-चौदहवें ढूईके प्रासन-काछमें फ्रांसता भभ्युदूथ..... ३२४

अध्याय ३२-रूस तथा प्रशाकी पृद्धि ... 22 .«.. देदेज

अध्याय ३३-आंग्लदेशका पिस्तार ... « , हैछेवै ./

अध्याय ३४-चैज्ञानिक उन्नति कर हद ... शैप७ , पानचित्रोंकी तची

4, अरबोंकी विजय. कि कि ७. डे

२, शार्मेनके समयक! थूरोप नाक ल्‍ः .... झेफ ..

३, फ्रांसमें अंग्रेजोंका आधिपत्य ३४ ५५ «० पूछ -

५. प्यारहवें लईके अधीन फ्रांस... ,.. हर ३३४० 0 “6 हक

५, सश्रहर्वीं सदीके भारस्भका जर्मनी. ,,. ही लक की,

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पश्चिमी यूरोप

अध्याय

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रोम साम्राज्यके अन्तिम दिन, क्रिस्तानधमेका आगमन

पाँचवीं शताब्दीके यूरोपका नक्शा यदि देखा जाय तो जिस्र प्रकारसे आज इंगलिस्तान, फ्रांस, इटली, जमेनी आदि भिन्न-भिन्न देश देख पढ़ते हैं वैसे उस खमय नहीं मिलेंगे उस समय यूरोपके दो हिस्से थे डान्यूब और रौंइन नदियोंके उत्तर अशिष्ट जमन जातियाँ बसी थीं और दक्षिणमें रोमुक़े साम्राज्यका प्रचण्ड पताप फैला हुआ था बड़े-बड़े प्रयल करनेपर भी रोमके सैम्नाट्‌ राइन और -डान्यूबक्रे उत्तरवासी जमेन जातियोंकों जीत सके पर दक्षिणी और पश्चिमी यूरोप, पश्चिमी एशिया और उत्तरी अफ्रीक्षापर इनका अधिकार पूरी तरहपर था। जमेन जातियोंको जब रोम सम्राट जीत सके, ती राइन ओर ढान्यूब नदियोंके किनारे-किनारे अपने स्रात्नाज्यकी रक्षाके लिए उन्होंने दुग बनवाकर द्वारपाछोंकों नियत डिया ! रोमके साम्राज्यमें बहुतसी जातियोंके लोग--मिल्री, भरबी, यहूदी, यूनानी, जर्मन, गाल ( फ्रांस देशके प्राचीन निवास्री ), ब्रिटेन ( आंग्ल देशके प्राचीन निवासी ) सभी--थे और सब रोमका आधिपत्य मानते थे। इस बड़े सांम्न/ब्यके किसी भी कोनेपर कोई क्‍यों रहे, सब एक द्वी राजाकों कर देते थे, एक द्वो कानूनका पालन करते थे और एक ही सेनाबलसे सुरक्षित थे आप आश्वरय करेंगे कि पाँच शता- दिदयोतक ऐसे मिन्न-भिन्न जातिके लोग क्योंकर एक हीं राजाके आभध्रयमें रद सके ?

' कया कारण था कि यह स्राम्राज्य एकाएक अन्य उत्तरीय जातिथोंके आवेगसे गिर तो पड़ा, पर तो भी बहुत दिनोंतक अपने जीवनकी रक्षामें सम्रथे रह्दा ! किस

अह्ुडोंसे ये अनेक देशसमूद्‌ बद्ध थे !

सुनिये, उन कारणेमेंसे पहला कारण यह था कि .रोमका राज्य आप ही बड़ा . सुसज्जित था। राजा अपने चछुय्े प्रत्येक अंग भीर कार्यकी देखता था। इस कारण सम्राजका व्यूदन पुष्ठ रहता था। द्वितीय, राजा ईश्वरतुल्य समझा जाता था, और उसकी यथोचित पूजा और उपासना द्वोती थी। .तृतीय, एक द्वी प्रकारका कानूनः

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है पश्चिमी यूरोप

अथात्‌ रोमका कानून सब प्रदेशोंमें प्रचलित था। चतुर्थ, बढ़ी-बड़ी सड़कोंके कारण एक प्रदेशसे दूसरे प्रदेशमें आना-जाना बराबर लगा रहता था और एकद्दी प्रकारके सिक्के और नाप-तौल द्वोनेके कारण वाणिज्ष्य-ग्यवस्राय आादियें बड़ी सरलता द्ोती थी फिर रोमके विशेष निवासरीगण अन्य श्रदेशोंमें जाकर बसते थे और राजाकी ओरसे शिक्षाके प्रचारका ऐसा प्रबन्ध था कि रोमकी विशेषताएं चारों ओर“फेलती थीं और रोमकी समभ्यताका आदर सब स्थानोमें होता था।

१. इसे और भी स्पष्ट इस तरह देखिये। पहली बात राजा और राष्ट्रकी डीजिये। राजाके वचन ही कानून थे। जिस प्रकारका कानून वे बनाना चाहते थे वैसी द्वी आज्ञा देते थे भौर उस आज्ञाकी घोषणा चारों ओर की जाती थी यदि नगरोमें पंचायती संस्था होती थी तो भी राजा कर्मचारियों द्वारा संदा निरीक्षण किया करता था और केवल राज्यसम्बन्धी कार्योकी चिन्ता ही कर प्रजाके आामोद- प्रमोद भारिका भी प्रबन्ध किया करता था। दुश्टोंका दमन, न्यायका प्रचार, बाहरी और भीतरी शैत्रुओंके आक्रमणको, रोकना इस्यादि तो द्ोता द्वी था, पर राजा यह

भी देखता था कि अन्न आदि बेचनेवाले अपना कार्य ठीक प्रकारसे करते हैं या.

नहीं किसी समय यद्द भी यत्न किया गया था कि जन्मसे जातिका निश्चय हो जाय, जिससे कि पुत्र पिताका ही पेशा करे और समाजके कार्यमें वर्णबंकर आदि किसी प्रकारका विरोध खड़ा हो, परन्तु उस समयकी जनताने इस नियमकों अंगीकार नहीं किया। द्रिद्रोंके लिए खेल-तमाशे किये जाते थे और कभी-कभी बिना मूल्य द्वी भोजनादिका वितरण भी किया जाता था। राजा प्रजार॑जन और . चनकोी रक्षा दोनोंका ही यज्ञ किया करता था।

२. र/|जाका पूजन करना और उसको इेश्वरतुल्य मानना भी राजधर्मका दी एक अंश था। किसीका कुछ भी पन्थविशेष क्‍यों दो, पर राजाका पूजन सबका कतंव्य था। ईसामसीहके धर्म और रोभराष्ट्रते जो झगड़ा चला, उसका कारण एक विशेष प्रकारसे यद्द भी था कि इस्राके अनुयायीगण कहते थे कि राजा और ईश्वर भिन्न-भिन्न हैं। ईसा कद्द गये दें कि जो राजाका है, वह राजाकों दो और जो ईंश्वरका है उसे इश्वरकों दो, अथात्‌ ये दोनों व्यक्ति अलग-भलग हैं। पूजा, उपा- सना ईश्वरको है इस कारण राजा इसका अधिकारी नहीं है। इस विषयमें आगे चक्कर भौर कटद्दा जायगा

३, रोमराष्ट्रका संसारके लिए प्रधान महत्व उसका कानून है। जितने प्रदेशोंमें रोमका राष्ट्र था उतनेमें एक ही कानून था। देशमेद होते हुए भी न्यायका सिद्धान्त एक था ओर यहाँ पूर्वकालमें पति-पितादिकों अपने पत्नी-पुत्रादिपर पूरा अधिकार दहोता या रोमके कानूनने सबका अधिकार निश्चित किया और प्रत्येक प्राणीका

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रोम साम्राज्यके अन्तिम दिन, क्रिस्तानधर्मका भागममन

खत बतलाया रोमके न्यायने यद्द सिद्धान्त प्रचलित किया कि दोषी छूट जाय तो

अच्छा है, पर निर्दोषीकों दण्ड मिलना चाहिये किसी शदहरमें यदि चोरी दो जाय भौर चोर का पता लगे तो अच्छा दे कि किसीकी भी दण्ड दिया जाय, पर शहरवाकोंकों डराकर चोरी स्वीकार करानेके लिए दस मनुष्योंकों पकढकर उनको दोष बिना साबित किये हुए उन्हें दण्ड देना उचित नहीं दे रोमके कानूनने प्राणी- मात्रछो एक माज़़्कर एक न्याय व्यवद्धार-धम ), एक राजा भीर एक राष्ट्रके आधिपल्य-स्थापनका यथोचित यत्न किया था

४, राजा और प्रजाके लिए अच्छी सब़कोंका तथा एक नगर और प्रान्तसे दूसरे नगर और प्रान्तमें आने-जानेकी सुविधाओंका द्वोना बड़ा आवश्यक दे इसीसे राजाकों अपने राज्यके मिन्न-भिन्न अंग्ोंका समाचार मिल सकता दे। उससे कमेचारीगण एक ' स्थानसे दूसरे स्थानपर आजा सकते हैं। राजाज्ञाओंकी घोषणा झीघतासे हो सकती है फिर प्रजाको वाणिज्यादिम्रे आने-जानेके लिए बड़ी सुविधा होती है और इस प्रकार राष्ट्रके धन, कला, कौशल, आदिकी उन्नति द्वोती है जैसे* जैसे वाती ( समाचार ), मनुष्य और व्यावसायिक पदार्थोके गमनागमनकी सुविधा द्वोती जाती है, वैम्ते ही वेसे संस्ारके भिन्न-भिन्न देश निकटस्थ द्वोते जाते हैं रोमके राष्ट्रमें बढ़ी-बढ़ी सड़कें थीं। उस समय यही बहुत था। आज जद्याजोंके कारण, तार इत्यादिसे बढ़े-बढ़े राष्ट्र सैभाले जा सकते हैं फिर रोमने एक ही प्रकारका सिक्का चलाया जिससे यात्रियों, पथिद्यों और व्यवसायियोंकों धोखा और झंझट नहीं उठाना पड़ता था फिर रोमके प्रवासीगण दूर-दूर जाकर बसते थे और रोमकी सभ्यता अपने साथ ले जाते थे उनके बनाये हुए पुर, दुर्ग, नाटकघर, विलास- स्थानके खँँडदर अब भी दूर-दूर देशोमें मिलते दें जिनसे सूचित दोता दे कि रोमका प्रभाव कितनी दृर्तक फेल गया था

प्रव्येक बड़े नगरमे राजाकी भोरसे शिक्षकगण नियुक्त दोते थे जो रोमकी शिक्षा नगरवासियोंकी देते थे, और इस्र शिक्षाकी एकताके कारण राष्ट्रभरमें एकता द्वो चली थी और रुगातार चार शाताब्दियोतक यद्दी विश्वास था कि रोमका साम्रोज्य अटल भौर अचल है, और जो इसका विरोधी है, वह संसारका विरोधी और सभ्यताका शत्रु है।

यहाँ यह बात कद्दी जा सकती दे कि ऐपे सुश्नज्जित राज्यका, जद्दोंकी प्रजा दृस प्रकार राजभक्त थी, अन्तमें अधः्पतन क्यों हुआ ? जो कारण जाने जा सकते हैं उनसे पता लगता दे कि एक तो कर बहुत लगता था जिससे धनी लोग धीरे'धीरे द्रिद्र ही चले -फिर, दासत्वकी प्रथा, जिससे अधीन जातियोंमें आत्मगोरव और

राष्ट्रमिमान घटता गया, मूल जातिकी जनसंख्या कम द्ोतौ गयी और बाइरी

| पश्चिमी यूरोप जातियाँ आकर बसने लगीं, जिन्होंने काल बीतनेपर अपने भाई-बन्थुओंडी अधिक- अधिक बुलाकर राष्ट्रके अन्दर बसाना आरम्भ कर दिया आगे चलकर उन्होंमेंसे अधिकारी भी बन बैठे

राजा और राजकर्मचारियोंके भरण और पोषणके लिए बहुत घनकी आवश्यकता पढ़ती थी | इस कारण प्रजापर सेकड़ों प्रकारके कर लगाये जाते थे और सख्तीसे वसूल किये जाते थे | प्रत्येक नगरके कुछ धनिकोंपर कर एकन्र कर सरकारी कोपपें जमा करनेका भार दिया जाता था, और समयपर यदि नियत कर मिल सका तो उसको पूर्ति उन्हें अपने पाससे करनी पढ़तो थी इस भारसे लोग दबने' लगे, क्योंकि केवल बड़े-बड़े सह[जन हो इस बोझको सहन कर सकते थे मध्यम उत्तिहे लोग दरिद्र और निराश होने लगे और इस कारण साम्राज्यका जैमव घटने छगा और उसकी नींच कमजोर होने छूगी

शक्ति और घनके कम द्वोनेके साथ ही स्राथ कला-कौश>०, लिखना-पढ़ना भी कम हुआ। पॉँचवों शताब्दोसें कई शताब्दियोंतक ऐसे लेखक,न वक्ता, गुणी ही पैदा हुए जैसे कि सम्राट भागस्टसके समयको सुशोभित करते थे। अब सिसरो रह गये, टेसीटस और इन सुप्रसिद्ध छेखकोंकी भाषाओंकी समझनेवाले विद्ग|न्‌ ही रद गये | यूरोपकी मानसिक उन्नतिकी समाप्ति हुई और चोददवीं शत्ताब्दीतक यूरोप अन्धकारमय था। जब पेटाक, डेंटे आदिने जन्म लिया तब इस अन्धकार- का परदा उठा और पुनः जागृति हुई इसके पश्चात्‌ पुरातन श्रीक और लैटिन भाषाओंके लेखेंको लोग पढ़ने और समझने छगे। आधुनिक युगकौ यूरोपमें उत्पत्ति हुई

पर हाँ, इससे यह समझना चाहिये कि यूरोपने इन शताब्दियोंमें कुछ कर दिखाया था मान लिया कि कला-कौशल और लिखने-पढ़ने आदिको भवनति हुई, परल्तु एक विशेष प्रकारकी धार्मिक जागृति! हुई जिससे कि ईसामसीहका धर्म यूरोप- में फेला और उम्चने एक विशेष अ्रकारकी सभ्यताका सम्पादन किया रोमके पुरातन निवासी एक ईश्वरको भानकर बहुतसे देवताओोंकों मानते थे अब कुछ लोगोंका

विचार यह द्ोने लगा कि ईहवर एक ही दे सज्जनोंको बढ़े-बड़े नगरोंके पापोंसे

भणा भी होने लगी भोर यद्द इच्छा द्वोने लगी कि स्वच्छ और घामिक जीवन व्यतीत करना चाहिये ऐसे समय जब एक भोरसे पुराने धर्ममें लोगोंको शंका दोने छंगी ओर प्रचलित पापों लोग परावमुख दोने लगे उसी समय ईसामसीहके घर्मका प्रचार होने लगा। मलुष्योंके हृदयमें नयी आश|की जागृति हुई इंसामसोहने कहा कि पापके अन्धनसे मनुष्य मुक्त दो सकता है और मत्युके अनन्तर सुखका भागी

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रोम साम्राउ्यके अन्तिम दिन, क्रिस्तानधर्मका आगमन हर

भी दो श्रक्कता दै। जो इस धर्मकी शरण लेगा वह इृदलोक और परलोक दोनोंमें सुस्ती रहेगा।

कुछ दार्शनिर्कोका मत था कि पुरातन घर्ममें और इस घर्ममें कुछ अन्तर नहीं है परन्तु यह मत दाशनिर्कोतक द्वौ रह गया जनता इन दोनोंमें भन्तर द्वी अन्तर

: देखती थी। स्रन्तपालके पत्नोंसे प्रतीत दोता दे कि क्रिस्तानी भक्तमंडलीमें भारम्भसे ही

विचार हुआ कि एक ऐसी संस्थाकी आवश्यकता है जिससे शात्मरक्षा और घमका प्रचार हो | इसी कारण विदश्यप नामके कर्मचारीगण नियुक्त किय्रे गये। इनसे निम्न तर कर्मचारी भी थे जो “डीकन”!, “सब-डीकन?”, “ऐक्रोलाइट””, “एकजद्ा- रसिस्ट”के नामसे प्रसिद्ध थे। इस प्रकार 'क्लर्जी? (पुरोहितगण) और “'छेटी भ्रथोत्‌ साधारण जनसमूहमें अन्तर किया गया सं० ३६८ में प्रथम बार रोमके सम्राद्‌ “उल्रियस''ते क्रिस्तानी धर्म और रोमके प्राचीन धर्मको बराबर स्थान दिया था।

आगे घखलकर रोमके प्रथम क्रिस्तान सम्राट कांप्टेन्टाइन'ने क्रिस्तान धमेका महत्त्व

बढ़ाया इस बोचमें क्रिस्तान घर्मका बाहरी रूप, अथात्‌ “कैथोलिक चर्च!का वही आकार हो गया था जो आजतक वतंम्ञान दे रोममें एक विशुप था, जिसने भागे चऊकर पीपके नाससे यूरोपके राजनीतिक इतिद्ासमें अपनी शक्ति दिखलायी आरे चलकर पुरोहितोंकी मानमयोदा इतनी बढ़ी कि वे कई प्रकारके करोंसे, जो साधारण मजुष्योंकी देने पढ़ते थे, बरी किये गये धार्मिक धनी पुरुष बढ़ी-बढ़ी जायदादें भी इनको देने लगे | थोड़े ही दिनोंमें “केथोलिक चर्च”? बढ़ा धनी हो गया और इसकी आय यूरोपके कई राष्ट्रोोकी आयसे भी बढ़ गयी। इसके अनन्तर क्ठजींकों कई भ्रकारके मुकदमों छा फेश्नला करनेका अधिकार मिला और जब उनपर स्वयं भियोग लगाया जाता था ती भी मामछा उन्हींके न्यायालयोंमें जाता था, राजाके नहीं इस प्रकार एक ही राष्ट्रमें दो राष्ट्र हुए एक राजाका, दूसरा चर्चेका। जम॑न जातिथोंके आक्रमणसे राजाका राष्ट्र नष्ट हो गया परन्तु चर्चका आधिपत्य बना रहा और जेताओंकी भी इसने पराजित किया। राजकर्मचारों अपने-अपने स्थान'छोड़ भागने लगे, परन्तु विशप अपने कर्तंव्यपर दृढ़प्रतिज्ञ रहे उन्हींके कारण पुरातन सम्यता ओर सुराज्यके विचार प्रचलित रहे | जिस समय लिखना-पढ़ना बन्द हो रद्दा था उस्र समय लैटिन साषाको उन्होंने ही जीवित रखा, क्योंकि धार्मिक कार्यों लैटिन भाषाकी बड़ी आवश्यकता पड़ती थी और चब्रेके भिन्न-भिन्न कर्म चारियोंमें पत्रव्यवद्दार भी करना पड़ता था, इश्र कारण जो कुछ शिक्षा इस समय रद्द गयी, इन्दीींके पाप्त थी यद्यपि रोमसाम्राज्यमें एक कानून, एक राज्य था, तिसपर भी जमन जातियों- के आनेके पहिले ही साम्राज्यके देशोंमें भिन्नता- आने छगी थी इस बड़े साम्राज्यको सुरक्षित रखनेके लिए कान्स्टेन्टाइनने सं० ३८७ में यूरोप और एशियाकी स्रोमापर

श्र

4 पश्चिमी यूरोप

कुस्तुन्तुनिया नामक शदर बसाया भौर यह द्वितीय रोमके नामप्रे प्रप्तिद्ध हुआ रोम जौर कुस्तुन्तुनियामें जो भिन्न-भिन्न राजा राज्य करते थे, वे दोनों राष्ट्रकी

एकता मानते थे ओर एश दूसरेके बनाये कानूनका पालन करते थे सच बात तो.

यह दे कि मध्ययुगके अन्ततक मलुष्योंके हृदयमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि सभ्य संसारभरमें एक राष्ट्र छोड, दो राष्ट्र हो सकते हैं

जमन जातियोंका आवेग इस पूर्वीय राजधानीपर बहुत हुआ, परन्तु कुस्तुन्तु- मियाके सम्राट अपना आधिकार किसी किसी प्रकार जमाये ही रदे और जब सं० १५९० में .राष्ट्रका नाश हुआ तो कछुस्तुन्तुनिया जर्मनके हाथ में जाकर तुर्कियोंक्रे हाथमें गया इस पूर्बीय राष्ट्रकी भाषा तथा सभ्यता थुनानी थी और इस्र- पर पूर्वोय देशोंका बड़ा प्रभाव पड़ा था। इस कारण इसमें और परिचम यूरोपमें ( जिसपर लेटिनका प्रभाव था) बड़ा अन्तर हो गया था। यद्द भी स्मरण रखनेकी बात दे कि पूर्वमें विद्या और कलाका हांस इतना नहीं हुआ जितना कि परिचमर्में थे ... परश्चिमीय रोमराष्ट्रके हटनेके पश्चात्‌ भी पूर्वीय रोमराष्ट्र सर्वागपुष्ट रहा। कुस्तुन्तुनियाका विशारू नगर धनिक व्यापारियोंसे भरा रद्दा | बड़े-बढ़े भवनों, सुन्दर बगीचों और स्वच्छ सड़कोंको देखकर परिचम्री यात्री अचम्भित होते ये जब ऋसेड अर्थात्‌ क्रिसान धमे और इस्लामका भर्यंकर युद्ध हुआ तो परिचमने पूव॑से बहुत कुछ सीखा भोर पू्॑का प्रभाव परिचमके हृदयपर अटल झपसे स्थापित हुआ।

इस पुस्तकर्म पूर्वीय यूरोपका इतिहास विस्तारपूर्वक नहीं दिया जा सका इस विषयपर यदि बन पड़ा तो अलग पुस्तक लिखी जायगी यहाँ इस सम्बन्धमें केवल- इतना ही कहना है

अध्याय

जमेन जातियोंका प्रवेश, रोम साम्राज्यका अध)पतन

सं० ४३२ के पदले जिन जन लोगोनि रोम साम्राज्यमें प्रवेश किया उन लोगोंके हृदयमें स्वकीय राज्यस्थापनके विचार नहीं थे, परन्तु वे लोग़ अपने मनका दौसला मिटाने, देशाटन करने अथवा सभ्य जातियोंके संसर्ग के लिए आधे थे। रोमके द्वारपालगण भी इनके आक्रमणकों रोके रहते थे परन्तु मध्यएशियासे हूण (मंगोल)

जाति एकाएक यूरोपमें घावा करती पहुंची इसने डाम्यूब नदीके किनारे बसे

दुए जन लोगोंकों भगाया उन्होंने नदीके इस पार साम्राज्यकी शरण ली यह जर्मन जाति इतिद्ाासमें “गाथ”” नामसे ग्रसिद्ध है थोड़े ही दिनोंमें रोमराज कर्मचारियोंसे और इनसे झगड़ा हुआ भौर एड्रियानोपुछके युद्ध (सं० ४१५) में इन्ददोंने रोमसम्राट्‌ वालेन्चकों पराजित किया और मार डाला जमेन लोग साम्राज्य- की स्रीमाके पार तो ही गये थे | इस एड्रियानोपुलके युद्धसे उन्हें यह भी माल्म हुआ कि साम्राज्यकी स्नेना भजेय नहीं है एड़ियानोपुलके युद्धसे द्वी साम्राज्यके अधःपतनका दिन गिनना चाहिये इस युद्धके कुछ दिन बादतक गाथ लोग शान्ति- पूर्वक साम्राज्यमें रहते और रोमकी सेनामें नौकरो करते थे। कुछ दिनोंक्रे भनन्तर आलेरिक नामी एक जमेन सरदारने कमचारियोंके व्यवद्धारसे असन्तुष्ट होकर सेना एकत्र कर इटलौीकी तरफ धावा मारा सं० ४६६ में रोम इसके द्वाथ ऊूगा | रोमकी प्रचलित सभ्यताकां आलेरिकके हृदयपर बड़ा प्रभाव पड़ा। उसने किसी प्रकारसे उस विशाल नागरीको द्वानि नहीं पहुँचायी उसने अपने सैनिकोंको आज्ञा भी दी कि गि्जोर्में कोई छूट-पाठ मचायी जाय राष्ट्रका व्यूहन करनेके पहले द्वी आलेरिकका देहान्त द्वी गया उसके मरनेफे पश्चात्‌ गाथ जाति घूृभती-घूमती गाल तथा स्पेन देशों में गयी इनके कुछ ही पद्ले वाण्डाल जाति उत्तरसे आकर राइन नदीको पार कर गालमें घुस आयी और देशको नष्टम्र्ट करती हुई पेरिनीज पहाडोंकोी पार कर स्पेनमें पहुच गयी गाथ लोगोने स्पेनमें पहुँच रोम साम्राज्यस्े मैत्री कर वाण्डाल लोगोंसे ऊड़ाई करनी आरम्भ की। लड़ाईमें इनकी ऐसी जीत कि सन्नाद्ने असन्न द्ोकर दक्षिण गालमें इनको बसनेके लिए बढ़ा स्थान दिया जहॉँपर कह्नि इन्दोंने भपना राष्ट्रस्थापित किया इसके बाद वान्दाल लोग स्पेनप्ते चलकर उत्तरीय अफ्रीकामें आये और वहोपर भूमध्यसागरके किनारे-किनारे उन्होंने

१३० पश्चिमी यूरोप

अपना राज्य स्थापित किया इनके चले जानेपर स्पेनमें गाथ छोगोंका राज्य फैला और यूरिक नामके राजाने पराक्रमसे स्पेनपर अपना राज्य स्थापित किया सारांश यह कि पॉचवीं शताब्दोमें भिन्न-भिन्न प्रदेशोंकी भिन्न-भिन्न प्रशारकी बाहरी जातियों- ने रोमके साम्राज्यके भिन्न-भिन्न प्रदेश्षोमें श्रमण तथा अधिकार स्थापित करना

आरम्भ किया भौर साम्राज्य अपनी रक्षाके लिए असमर्थ हुआ जमेन जातियोंका

पूव॑से पश्चिम तथा उत्तरसे दक्षिणतक क्षिरार फैला। जमेन जातियाँ तो फैल ही रही थीं, इसी बीच हुण जाति भी जो पहले गांथ छोमोंको निकालकर पूर्वीय यूरोपमें बसी थो, अब पश्चिमीय यूरोपकी तरफ चली आठिका नामी सर्दौरके साथ- साथ इन्होंने गालपर धावा मारा | परन्तु सं० ५०८ में रोमन और जमेनने मिलकर शालीन्सकी लबाईमें इन्हें दराया | “इस हारके बाद भाटिला इटलीकी तरफ चला उस समयके पोप छीक्षोने उस्रके पास दूत भेजा कि “रोमपर मत चढ़ाई करो”? इसका प्रभाव उसके ऊपर पड़ा और वह रोममें नहीं आाया सालभरके भीतर ही भीतर वह मर गया और हूण लेोगोंने फिर सिर 3ठाया। इस सम्बन्धमें स्मरण रखनेकी यह बात है कि इटलीके उत्तरपूर्वीय शहरोंसे हृणोंके आक्रमणके कारण भागे हुए छोग ऐड्रियाटिक समुद्रकें तटपर बसे और उन्होंने वेनिस नामके विश्ञाल ओर सुन्दर शहरकी स्थापना की सं ५१४ पश्चिमीय रोम साम्राज्यके पतनका दिवस समझा जाता है। भोर मध्ययुगका आरम्भ इसी दिवससे माना जाता है। बात यह थी कि सं० ४५२ में थियोडोसियन नामी राजा रोम साम्राज्यके कार्यक्रा भार अपने ही लड़कोंमें बॉट गया था। पश्चिमीय राजाओंने राज्यकार्य ठीक नहीं किया भशिष्ट बाहरी जातियाँ भी उनके राज्यमें इधर-उधर घूम रही थीं और साम्रा्यकी जमेन सेना मनमाने ढंगसे राज्यको बिगाबती और बनाती थी सं० ५३३ में इन्होंने चाही कि इंटलीका एक तिहाई माल हमें मिल जाय | जब सम्राटने

इसे स्वीकार नहीं किया तो उनके सदौर ओडेसरने आखिरी पश्चिमीय सम्राटकों :

निकाल दिया-।

ऐसा कर श्रोडेसरने पूर्वीय सम्राट्छे पास राजदण्ड, छत्न आदि भेज दिया और उनसे आशा मागी कि “मुझे अपना प्रतिनिधि समझ राजकाये करनेकी भाज्ञा दीजिये” | इस घटनाका बढ़ा मद्दत्व है। रोम साम्राज्ययी घाक इतनी बैंध गयी थी कि किसी नये राजाकी इतनी हिम्मत होती थी कि केवल अपने पराक्रमसे दो रोम ऐसी-राणघानीमें कोई नया राष्ट्र स्थापित कर सके राज्यका स्थापन केवल बाहुबलसे नहीं होता यद्द आवश्यक है कि प्रजा राजाकों हृदयसे खीकार करे यह सम्भव नहीं था कि इतनी शताब्दियोंसे सुबद्ध परम्परागत रोम साम्राज्यका स्वामी एक अनजान असभ्य जातिका सेनापतिं दो जाय और आात्मामिमानी सभ्य रोमन

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जम॑न जातियोंका प्रवेश, रोस साम्राज्यका अधःपतम ११

छोग जो अपने राज्यकों अनन्त समझते थे, उनको खासी मान लें। भोडेसर बुद्धिमान था| वह इन बातोंकी जानता था वह यद्द जानता था कि नामके प्रतिनिधि बने रहनेसे वास्तविक्क राज्य हमारे ही हाथमें रहेगा और यदि ऐसा बहाना किया जायगा तो नव-स्थापित राज्य नष्ठ दो जायगा इन सबपर ध्यान देकर भोडेसरने पूर्वीय सम्राटके पास अपने दूत भेजे और कहला भेजा कि--“भाप तो ख्य ऐसे प्रतापी और तेजस्वी हैं कि साम्राज्यके दो विभाग करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। थऔर आप दी एकाकी इस विशाल साम्राज्यपर अपना अधिकार रख सकते हैं | पर यदि आप चाहें तो में प्रतनिधिखषृप होकर आपके राजकार्यकी पश्चिममें देख- रेख कर सकता हूँ ।” ऐसा ही हुआ, परन्तु भोडेसरका यह्द भाग्य था कि वह इटलीकी भूमिपर जरमनोंका आधिपत्य जमावे। थोड़े द्वी दिन पीछे पूर्वी गाथके सदौर थियोडे रिकने भोडेसरकी जीत लिया। थियोडेरिकने दस वर्षतक कुस्तुन्तुनियामें वास किया था और इस कारण रोम साम्राज्यके भीतरी हलसे परिचित था। जब बह अपने देशकी लोटता तब बद्दींते पूर्वीय साम्राज्यकी सौम|पर बार-घार आक्रमण कर पूर्वीय सम्राटोंकों तंग किया करता था इस कारण जब उसने पश्चिम साम्राज्यपर थावा करना प्रारम्भ किया तो पूर्वीय सम्राट बड़े प्रसन्ष हुए कि एक बखेड़ा हटा | कई वर्षतक थियोडेरिक और ओडेसरमें झगड़ा होता रहा और अम्तमें राधैना नगरमें इसने अपनी द्वार सानी सं० ५५० में थियोडेरिकने अपने ह्ार्थोंप्ते उसकी दृत्या की थियोडेरिक भी ओडेसरके सदश यह जानता था कि एकाएक भपने राष्ट्रको अपने हो नामग्रे स्थापित करना अम्रम्भव है। इस कारण उसने सिक्कोंपर पूर्दोय सम्राटकी मूर्ति बनायी और दर प्रकारसे यज्ष किया कि -सम्राट हमारे नये जमनराष्ट्रका समर्थन करें यद्यपि वह सम्रादका समर्थन चाइता था पर वह सम्राटकों किसी प्रकारसे हस्तक्षेप करने देना नहीं चाहता था। पुराने कानून और पुरानी संस्थाओंकी इसने स्थायी द्वो रखा | पुराने कमेचारीगण, पुरानी मान-मयौदा सब बेसी दी बनी रही और गाथ तथा रोमन दोनों एक ही न्यायाज्यमें भेजे जाने लगे चारों ओर शानित फैली और विद्याबृद्धिका य्ल किया गया और सुन्दर भवनोंसे उसने अपनी राजधानी रावेनाकों सुशोमित किया। सं० ०८३ में इसका देदह्ान्त हुआ। इसने राष्ट्रको सुसज्जित और छुरक्षित किया था, परन्तु उसमें एक बढ़ी न्यूनत। यह रह गयी थी कि गाथ जाति यद्यपि किसान घर्मकी अनुयायी अवश्य थी, किन्तु उस विशेष पन्थक्री नहीं थी जिसके कि रोमके पूर्वनिवासी थे इस कारण इन दोनों जातियोंमें परस्पर द्वेंष और घूणा बनो रह्दी। जब इटलीमें थियोडेरिक अपना राज्य फैशा रद्दा था उम्र समय फ्रांक नामको औढ़ और बली जाति उत्तरसे उतर गालमें भा गयी इस जातिने यूरोपके इतिहासमें बढ़|-बढड़ा कांये कर दिखाया

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१२ पश्चिमी यूरोप

है और इसीने पुरातन गाल देशको आधुनिक फ्रांसका नाम दिया है। पूर्वीय गाथ इटलीमें बस रददे थे। फ्रॉंक जाति गालपर राज्य जमा रद्दी थी और पश्चिमी गाथ तो पहलेसे दी आधुनिक स्पेनमें जमे थे और बाण्ढडाल जाति उत्तरीय आफ्ोहामें पहुँच गयी थी इन जातियोंके मिन्न-भिन्न राजाओंमें विवाह सम्बन्ध भारमभ्भ दो गया था भोर यूरोपके इतिदासमें प्रथम बार अलग-अलग राष्ट्र स्थापित हुए जो स्व॒तन्त्रतासे अपना काये करते थे

कुछ दिनोंतक तो ऐसा ज्ञात हुआ कि रोमन और अन्य जातियाँ एक दूसरेसे मिल जायेगी और साहित्य, कला-कीशल भआदिकी उन्नति पूर्ववत्‌ होती जायगी पर ऐसा हुआ | छठीं शताब्दीका वीथियस नामी लेखक जिसकी थियोडेरिकने दृत्या को थी, इस युगका अन्तिम विद्वान था। ३०० वर्षतक यूरोपमें ऐसा एक भी लेखक हुआ जो अपने समयका वितरण छोड़ जाता | पुरातन विद्यापीठ कार्थेज, रोम, सिकन्द्रिया, मिलान इत्यादि सभी नष्ट हो गये देवताओंके मन्दिरोमें रखी पुस्तके भी क्रिस्तानोने नष्ट कर दीं। क्रिस्तानोंका यद्द विचार था कि असभ्य मूर्ति पूजकोंक्े देवताओं तथा पुस्तकोंका साथ द्वी नाश द्दोना चाहिये पूर्वीय सम्रादने भी शिक्षकोंकी सद्दायता रोक दी भीर एथेन्सके विशाल विद्यालयकोीं बन्द कर दिया | पूर्वीय साम्राज्यकी राजगद्दीपर सं० ५८४ में जस्टिनियन नामक प्रसिद्ध राजा बैठा इसने विचार किया कि पुगने रोम साम्रज्य, इटली और अफ्रीकाके हिस्सोंकों फिर जीत लें। सं० ५९१ में उत्तरीय भफ्रीकाके वाण्हालोंके राज्यकों सेनोपति बेलीसरि- यसने जीता, परन्तु इटलीके गाथ लोगोंको जीतना कठिन हुआ। पर सं० ६१० में बेलीपेरियसने इनको भी इरायथा और इटलीसे निकाल दिया इंटलीके पूर्ववासीग्णोने पूर्वाय साम्राज्यकी सेनाका खागत किया पर अपनी करनीके कारण उन्हें पीछे पद्मात्ताप करना पढ़ा। गाथ राज्यका नाश हुआ थोड़े दिन पीछे जस्टिनियनकी शत्यु हुई और लम्बा जातिने साम्नाज्यपर घावा किया और उत्तरीय इटबीमें बसी | उसके बसनेका प्रदेश अवतक लम्बाहींके नामसे प्रस्निद्ध है। लम्बाई जाति इब्शियोंकी तरह छूटती-पाटती चारों ओर भ्रमण करती थी। वहाँके निवासी- गण अपना घर छोड़ समुद्रतटपर भागने जगे | पर वे छोंग सारी इटली णीत सके, क्योंकि दक्षिणमें अभी पूर्वीय अथवा यूनांन साम्राज्यका आधिपत्य बना था ।, भागे चलकर लम्बार्द जातिने अंपना दृब॒शीपन छोड़ दिया और क्रिस्तान धर्म स्वीकार कर आचीन निवासियोंकी तरह रहने लगी २०० वर्षेतक इनका राज्य रद्दा

अबतक जिन जमेन जातियोंका वर्णन क्रिया गया है उन सबने किसी स्थायी रूपमें अपना राज्य नहीं स्थापित किया | एकके पीछे एक क्षाती रहीं और ह्वारतो रहों अत्र फ्रांक जातिपर ध्यान देना उचित है, क्‍योंकि सब जातियोंसे श्रेष्ठ,

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जर्मन जातियोंका प्रवेश, रोम साम्राज्यका अध:पतन १३,

बुद्धिमती भीर बलवती जाति यद्दौ थी। प्रथम बार जब फ्रांक छोगोंका नाम सुनाई पड़ता दे तो ये राइन नदीके किनारे बसे हुए पाये जाते दें इन्होंने अपनी विजयके लिए एक विशेष ढंगका आविष्कार किया उन लोगोंने अपने घरसे अपना सम्बन्ध तोड़कर दूर-दूर धावा करना उचित नहीं समझा। इनकी इच्च्छा यद्द थी कि जह्दोँ वे बसे थे व्दोत्ति ही धरे-घीरे आगे बढ़ें इससे उन्हें यद्द लाभ हुआ कि अन्य जातियोंकी भाँति अपने धरसे दूर बसे शत्रुओंके बीचमें वे एकाएक फेँसते थे और अपने घरसे संबन्ध बनाये रखनेके कारण अपनी ही जातिके- और छोगोंसे बराबर सद्दायता पा सकते थे। पाँचवीं शताब्दीके अन्तमें इन छोगोंने आधुनिक बे ऐंजयमकी भूमिपर अधिकार जमाया सं० ५४१ में इनका राजा क्लोविस अपनी सेनाको रोमसाम्राज्यकी स्रीमाके पार ले गया ओर रोमन सेनापतिकोी पराजित किया फिर इसने गालपर अपना अधिकार जमाया और वहाँसे पूर्वकी ओर बढ़ा पूर्वमें अलेमानी नामकी जम॑न जाति बसी थी, उसको भी इसने -जीता। एक बातसे यह युद्ध बढ़े मद्त्वका है। संबत्‌ ५५३ में जब अडेमानियोंसे कलोविस युद्ध कर रद्द था, उसने अपनी सेनाको पीछे दटते देखा उसने उस समय प्रार्थना की कि “हे ईश्वर, यदि इस युद्धमें विजय पाउऊ तो मैं क्रिस्तान द्वी जाऊँगा?” विजयके बाद उसने अपने प्रणका पालन किया और क्रिस्तान धर्म स्वीकार किया। अन्य जर्मन जातियाँ भी क्रिस्तान थीं, किन्तु वे रोमके पन्थमें थीं। क्लोविसने रोसका पन्‍न्थ स्वीकार किया और रोमके पोपसे तथा इससे राजनीतिक मैत्री हुई जिसका यूरोपके इतिहासपर बहुत प्रभाव पश धीरे घीरे क्रिस्तान घर्मके नामसे इसने अपना आधिपत्य दक्षिणक्री ओर बढ़ाया भौर शीघ्र दी गाल देशका पूरा राजा बन बैठा।

क्लोविसने पेरिसकी अपनी राजघानी बनाया और संबत्‌ ५६८ में इसकी सत्य दही गयी। बादमें इसके चारों लड़कोने आपसमें राज्यका बैंटवारा किय।। १०० वर्षतक लगातार राजकुमारोंकी परस्पर लड़ाई ठनी रही, परन्तु राजाओंके इस अकार लड़ते रदनेपर भी फ्रान्स देशवासी उन्नति करते ही गये कारण इसका यह था कि परस्पर दैष्यों दोते हुए भी बाहर कोई इतना पराकमी राज्य था जो इनपर धावा करता

_'खातवीं शताब्दीमें फ्रांसीसी राजाअओंका अधिकार आधुनिक फ्रांस, बेल्जियम, ह।लैण्ड

और पश्चिमी जमनीतक फैला था। संवत्‌ ६१३ तक आधुनिक बवेरिया भी इन्होंके राज्यके अन्तर्गत दो गया कितने द्वी प्रान्त अब परिचमी यूरोपकी सभ्यता स्वीकार करने लगे जो रोम साम्राज्यका अधिकार नहीं मानते ये

क्ोविश्नके देद्दान्तके ५० वर्ष पीछे. इनके राज्यके तीन हिस्से हुए पर्चिम- में न्यूस्ट्रिया जिसका केन्द्र पेरिस था, इसमें भ्रायः ऐसे ही फ्रांद लोग बसते थे जो रोमकौ सम्पता खौकार किये हुए थे पूर्वमें अस्ट्रेसिया जिसके प्रधान नगर मेत्स

१४ | पश्चिमी यूरोप

और एक्सलाशैपछ थे, इस प्रास्तमें प्रायः जमेन द्वी बसते थे। इन्हीं दो

प्रान्तोत्ति आगे चलकर प्रैंच ओर जमन जाति उत्पन्न हुई दे। इन दोनेंके बीचमें पुराना बर॒पण्डौका राज्य था क्रोविसका वंश इतिद्वासमें मेरोविंजियन वंश कहा जाता है फ्रान्सीसो राज्यमें सदोरों तथा जमींदारोंके बढ़ते हुए प्रभावके कारण एक भयानक संकट खड़ा हुआ | जर्मन जातियोंके प्राचीन विवरणम्रे विदित होता है कि कुछ बंश ऐसे थे जिनके विशेष आदर-्सत्कार तथा अधिकार थे। दिशिजयके समय गुणी स्रेनानायक अपनी मान-मययोदा बढ़ा सकता था। जिन सर्दौरॉपर राजा अपने अधिकारके निमित्त भरोसा करता दे उन्तका मनोकामना तो ऊँची होती ही है, फिर जो कर्मचारी राजाके साथ ही रद्दते थे, उनकी मान-मर्यादाका तो कद्दना ही क्या अस्तु, इनमेंसे जो मेजर डोमस ( मदहलनवीस ) थी, वह प्रधान मन्त्री-सा था संबत्‌ ६९५ में मेरोविंजियन वंशके राजा देगोबटका देद्ान्त हुआ। तदनम्तर जो मेरोविंजियन राजगण राज्यसिंदांसनपर बैठे, वे राजकार्यस्र सम्बन्ध नहों रखते थे और इस कारण इन महलनवीसोंका ही राज्य दोने लगा अस्ट्रेसिया प्रदेशका महलूनवीस पिपिन शालमेनका श्रपितामह था और इसने अपना अधिकार न्यूसिट्रिया और बरगण्डीपर भी -जमा लिया। इस प्रकार उसने अपने बंशका ऐश्वयं खूब बढ़ाया |

संवत्‌ ७७१ में उसकी मत्युके उपरान्त उसके प्रसिद्ध बेटे चाह्स मार्टेलः (फुँगरा”) पर इस विशाल राज्यकों सुब्रज्गित करनेका भार बढ़ा ( शत्रुओंकीः भली-भाँति दुदंशा करनेके कारण इसको मुँगराकी उपाधि मिली थी )

इस स्थानपर भागेश्ञी और घठनाएँ लिखकर उचित दे कि दो-एक प्रश्नोंको इल किया जाय | एक तो यह कि रोमन साम्राज्यमें अशिष्टठ जमेनोंके कितने प्रदेश हुए ओर दूसरे रोमकी सभ्यताका इनपर क्रितना प्रभाव पड़ा प्रथम तो यद्द ठोक. तौरते निश्चय नहीं हो सकता कि कितने छोग आये पड्डियानोपुलक्की लड़ाईके बाद कहा जाता है कि लगभग राख पश्चिमी गाथ जातिके पुरुष तथा स््री-बच्चे सम्राज्यमें बसे सबसे बढ़ी संझ्या इन्द्रींकी थी, ओर समय कुछ कम ही छोग आते थैः और ये आकर रोम राज्यकी भूमिपर बसते थे। इनको कछा-कोशछ, साद्वित्य आदिसे

कुछ प्रीति नहीं थो। केवल लड़ना-मिद्तना भौर शारीरिक छुख़ भोगना ही इनको .

अभीश थ। इस कारण रोमकी दी हुई सम्यताका बहुत कुछ नाश हुआ पर यहद्द समझना चाहिये कि यह सभ्यता पूरी तौरसे नष्ट-श्रष्ट हो गयी, क्योंकि जब ज॑सैन जातियाँ स्थायी रूपसे बसीं, तब इन्हें भी कृषि करना, सड़क बनाना आदि हुनरोंकी भावश्यकता पड़ी, और इन्द्रोंने प्राचीन नियमका द्वी पालन किय। पुनः परस्पर विवाद आदि द्ोनेके कारण इनकी भाषा और रद्दन-सहनके ढंग सी रोमन लोगोंकेसे:

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