[5/७| 5 7 ४४ ॥६ 800/ (0)

॥5£: 800॥९ ///५७ [)रि5४(९,८०

(/५|/८२७/| | |3२/४रि

00 76646

/0ए०(७।|] ए50-_/१|॥)

संस्कृति का पाँचवाँ अध्याय

किशोरीदास वाजपेयी

हिमालय एजेंसी, कनरूला उ०फ्र०

(080 4:7५ एाएप्फ्रारढा"'र ॥.77 4 ०१५- 02॥ [० ने 9५ -) ।- -3 2८८८5॥०४७ '१०.. - -]) कि 0 जा ही 0 “प07. #[ >ै ३। 9 ) है) ही हे 8 . पृता€& | रा शा है अर दा चर ३0 ७) है ३४ जज! गुड 900०: $#6पव 9 7#टापायझटते ठग 67 7९676 ए९ 020८ [985 77377720 06८!0५७०.

( 4 ) हू चब्चुप्रवेशों यद्यत्र द्विजस्योत्पततः कचिन्‌ , तदाउम्लत्व॑ कषायत्वं दुरापास्तं हि ज्ञायताम

(२) नहि किखिल्निगूढं हि तत्व नामेह संस्कृतो, कप ओर पर॑ धृूमायितः केश्विद्‌ विषयः प्रकृति गतः | (३) निबन्धो लघुकायोड्य॑ महतोडपि विनेष्यति, महामूल्यान्महाकायान्‌ गजेन्द्रानड्ूू शो यथा

लेखक का निवेदन

भयंकर नर-संहार के बाद और राष्ट्र के दो ढुकड़ें हो जाने के बाद जब अपने हिम्से के भूभाग पर अपना राज हुआ. तो मन में आया कि अब स्वसंस्कृति को प्रतिष्ठा होनी चाहिए एक राष्ट्र की एक जाति होती है ओर उसको 'अपनी? एक संस्कृति होती है। संस्कृति को एक्रता हो जाति का निर्माण है। इंग्लैंड एक देश, या राष्ट्र है उस राष्ट्र की जाति को इंग्लिश” कहते हैं | 'इंग्लिश कल्चर! कहने से समकका जाता हँ-इंग्लिश जाति का (इंग्लिश नेशन का) ग्हन-सहन टीति-रिवाज, वेश-भूषा, खान- पान का ढंग आदि। इसी को हम “अंग्रेज-संस्क्ृति' कहते हैं | इस संस्कृति से क्रिसी खास मत-सम्प्रदाय का, या किसी खास दल का कोई खास सम्बन्ध नहीं है सभी मत-मजहब ओर सभी दलों की संस्कृति एक है वह. संस्कृति धारा-प्रवाह से चली रही है | उसमें तब से अब तक बहुत परितन हुए हैं परन्तु वह पहले भी एक थी ओर अब भी एक है इसी तरह जापान एक देश या राष्ट्र वहां बसने वाली जाति (नेशन) 'जापानी' ओर जापानी संस्क्रति का अपना' एक रूप जापान के बोद्ध, ईसाई या किसी भी सम्प्रदाय के लोग इस सांस्क्ृतिक एकता के कारण भिन्न नहीं जान पढ़ते। 'सूत्रे मश्शिगणा इब इस संस्कृति से सब संबद्ध हैं। यही स्थिति चीन आदि की है। वहां के बौद्ध (बुद्ध की जन्मभूमि) भारत को भाषा (प्राचीन पाली-प्राकृत, संस्कृत आदि) पढ़ते हैं, यदि जिज्ञासा में आगे बढ़े, तो। नहीं तो, अपनी चीनी भाषा में ही बुद्ध-शिक्षा

|

पढ़ते-सुनते हूँ जो लोग पाली-संम्क्रृत पढ़ भी लेते हैं, वे भी अपन बच्चों के जीवन में उसे ( संस्कृत या पालि का ) नहीं उतारते वे अपन वच्चां के नाम भी संम्क्त या पालि में रखे, यह बात नहीं हैं। नाम अपनी चीनी भापा में यही स्थिति वहां के मुसलमानों की है। आठ-दस करोड़ मुसलमान चीन में हें: परन्तु कहीं किसी का नाम अब्दुल मजीज' या रिफी अहमद जसा मिलेगा सब के नाम चीनी भापा में हैं | रहन-सहन, वेश-विन्यास और खान-पान भी एक यानी, वहां वोद्ध, कन्फयूशस, मुसलमान, या इसाई आदि का आप प्रथक्‌ पहचान नहीं सकते, जब तक वह स्वयं अपना “मत' प्रकट करें ज॑स कि अपने यहां वेदिक सनातनी, आयंसमार्जी, शेत्र, वष्णव आदि तथा अवेदिक जन, बौद्ध आदि पदचान में नहीं आते नाम-रूप से कोई भेद नहीं जान पड़ता | यह अभद सांम्कृतिक हे संस्क्रति ही “एक राष्ट्र' बनाती हे

“'मत' ओर संम्क्ृति में बड़ा अन्तर है संस्क्रति के समुद्र में जाने कितन मत-मजहब लहरों के समान प्रकट हाते ग्हते हैं ओर मिटते रहते हैं। “मत! का संबन्ध तो “मन? से है हम अपने मन में समभते हैं कि ईश्वर है. ता हमारा मत! इंश्वरवादी ओर हमारा मन ईश्वर की सत्ता नहीं मानता, तो हमारा मत” अनीश्वरबादी यह “मत या मन को बात संस्कृति से भिन्‍न है एक ही संम्कृति के ईश्वरवादी ओर अनीश्वरवादी को आप पहचान कर अलग - अलग नहीं कर सकते, जब तक वह अपने मन की बात प्रकट करे। परन्तु भिन्‍न संस्क्ृतियों के दो ईश्वरवादियों को आप भट पहचान कर अलग-अलग कर सकते हैं, यदि उनमें सांस्कृतिक एकता पाई हो | यही कारण है कि इस देश के ईश्वर-

[ दे |]

वादी हिन्दू ओर मुसलमान अलग-अलग दिखाई देते हैं। 'मत' ( इश्वर्वाद ) तो मन की चीज है। नाम-रूप से उसका काई सम्बन्ध नहीं। सा, सांस्क्रातक भद से दोनों में भद स्पष्ट है एक जगह भारतीय संस्कृत है, दसरी जगह अरबी-ईरानी मंनस्काॉन यह आर बात के भाग्त का अपनो भाग्ताय ) संम्क्ृृत में कुछ बातें, संसग से, अरब-ईरान आदि की भी मिली हां ओर अरबी-इं रानी संम्कृति भी भारत में कुछ भाग्तीयनता से प्रभावित हुई हा; परन्तु प्रथकू दानों चल ग्ही हें।

इस संम्क्रति-पाथक्‍्य का कारण क्या है ? इस पाथक्य से क्या राट का हित हुआ हे? क्या यहो मस्थिति रहने से आगे हित-सम्भावना है ? हम एक संम्कृति के क्यों नहीं हा जाते ? यह भद-भाव मिटा क्‍यों नहीं देते ? हिन्द ओर मुसलमान अलग क्यों दिखाई देते हैं ? यह केसे पहचान में आजाता है कि यह हिन्द हे ओर यह मुप्तमान ? यह भेद-भाव क्‍या राष्ट्र के लिए हिलतकर है ?

म्वगाज्य प्रतिप्ठित हान पर मेर मन में यह सव आया | में ने साचा, भारतीय सं/क्रत की चर्चा चलाने के लिए एक अखिल भारतीय बविद्व॒त्सस्मेलन बुलाया जाए। इस के लिए में ने काशी-नगरी प्रचारिणी सभा? से लिखा-पढ़ी की 'सभा' का एक ग्रचार-केन्द्र हरिद्वार (ज्वालापुर) में भी हे--“सत्यज्ञान- निकेतन' | स्वामी सत्यदेव परिन्राजक ने अपना यह आश्रम ('सत्यज्ञान-निकेतनः) सभा? को समर्पित कर दिया हे- सांस्क्र- तिक चेतना लाने के लिए, जिस में भाषा भी सम्मिलित है। मे ने संस्कृति का जो स्वरूप समभा है, स्वामी सत्यदेव का मत उस से भिन्‍न हैं | वे संग्कृति का मतलब वही समभते हैं, जा

[ ]]

कि ओर सब लोग स्वामी जी अपने इसी आश्रम ('सत्यज्ञान- निकेतन ) में रहते हैं। में ने उन से पूछे बिना ही 'सभा” से बात-चीत को सभा ने मेरा भ्रसम्ताव मान लिया और दो सौ पण बारमस्भमक सच काला, में जो मांग थे, भेज दिए | में ने सामाचार-पत्रों में सूचना छपाई ओर विद्वानों के पास निमंत्रग भजे | राजर्पि टंडन नथा डा० अमग्नाथ भा आदि ने मुझे समर्थन दिया काम आगे बढ़े कि इतने ही में सभा! से पत्र आया कि इस समय सांम्कृतिक-सम्मेलन करना ठीक नहीं हू ! सम्भव हू, 'सभा' के संचालकां को मेरी' संम्कृति का पता चल गया हा ओर उन्हों ने इस नापसन्द किया हो ! यह भी सम्भव है कि म्वामी सत्यदेव कुछ लिखा हा शायद ओर ही कुछ कारण हो; पर सभा ने अपना संगक्षण

हटा लिया सभा के हट जाने पर भी में वेसा सम्मेलन करता; परन्तु इसी बीच महात्मा गांधी हमार बीच से उठ गए! इस में एक व्यक्ति अपराधी था, दा-चार उस के सहायक थ, जिन को बाद में अदालती सजा मिली। परन्तु उस समय नेहरू जी को इतना क्रोध आया कि विवेक खो बेठे। देश भर से बीसों हजार लोगों को पकड़वा कर जेलां में बन्द करा दिया-- कोई मुकदमा. पेरवी ! जिस में कुछ विशेष हिन्दूपन देग्वा, या जिसके विचार कांग्रेस से भिन्न देखे, पकड़ कर जेल में डाल दिया ! स्थानीय कांग्रस-जनों की सलाह से यह पकड़- धकड़ हुई थी। मुझे भी पकड़ लिया गया और सीधे जेल भेज दिया गया ! मजा यह कि में ने सन १६१६ से लकर उस समय तक कांग्रेस के मंडे के नीचे राष्ट्रीय सेवा की थी, सभी आनन्‍्दो- लनों में खुल कर और डट कर भाग लिया था और इस के

[

लिए मुझे सव॒ तरह की सजाएँ मिली थीं! यह सब देखने- जानने वालों ने ही मुझे इस लिए जेल में डलवा दिया था कि मेंने उजड़ हुए पंजाबी भाईयों को बसाने में कुछ मदद की थी और इस में बाधा डालन वालों का मुकाबला किया था। यही मेरा अपराध था ! में कभी हिन्दूमहासभा का सदस्य हुआ था, 'गट़ीय स्वयं सवक संघ से काई सम्बन्ध था, ऐसी संस्थाओं के किसी जलसे-जलूस में ही तब तक सम्मिलित हुआ था! गब्बर, जेल चला गया

जेल में ही में ने समाचार-पत्रां में पढ़ा कि प्रयाग-मेले में गाजर्पि टंडन कोई सांस्कृतिक सम्मेलन कर रहे हैं। वह सम्मेलन वहां हुआ और उसका विवरण में ने पढ़ा जान पड़ा कि संम्कृति के संबन्ध में राजर्पि टंडन का मत भी मिन्न हे। महर्पि पं>० मदनमोहन मालवीय जो कुछ सनातनधम-सम्मेलन में कहा-क्िया करते थे, प्रायः वही सब राजपि टंडन के सांम्कृ- तिक सम्मेलन में हुआ। इस सांस्कृतिक संम्था को राजपि ने म्थायी संगठन का रूप दिया; पर आगे कुछ खास काम हुआ नहीं | अधिवेशन होते रहते हैं !

बेसा संगठन बनाने की शक्ति मुझ में नही हैं; विचार भर दे सकता हूं। में ने सुना- हिन्दुस्तानी विरादरी' नाम की संस्था कुछ लोगों ने बनाई है। कुछ आशा बैँवी कि इस संस्था के द्वारा शायद हिन्दू-मुसलमानों में सांस्कृतिक एकता लाने का उद्याग किया जाए | परन्तु बेकार ! वे ही 'ढाक के तीन पात' ! एक बिरादरी जिस दिन बन जाएगी, देश का सौभाग्य जाग उठेगा परन्तु यहां तो उल्टी दिशा लोग पकड़ते हैं। “हिन्दु स्‍्तानी विरादरी' में भी वे दो तत्त्व स्पष्ट अलग दिखाई देते हैं !

इधर मेरे साहित्यक मित्रों ने भी सांस्कृतिक विचार-घारा

[ ]

प्रकट की है | ऊँची-ऊँची परीक्षाओं में 'संग्कृति' भी एक विपय बन गया है परन्तु गाड़ी वहीं है --जरा भी आगे नहीं बढ़ी ! संम्कृति का म्वरूप ही म्पष्ठट नहीं हुआ ! यहां तक लिख देते हैं क्रि 'संस्कृति की स्पष्ट परिभाषा करना सम्भव नहीं है |! हद हा गई ! यदि ऐसा ही है, ता फिर ये पाथ क्‍्यां रचेजा रहे हैं ? संम्क्रति को म्पष्ट परिभाषा इस ग्रन्थ में मिलगी | इसी लिए यह उद्याग है। जा कुछ अन्य सांस्कृतिक ग्न्‍न्धों में ओर महा- ग्रन्थों में लिग्या गया है, उसका पिट्ट पेपण यहां होगा लोगों ने इतिहास, मत-मह॒जब ओर घम-सम्प्रदाय आदि के बयानों के जमघट को ओर उन के इतिहास कासंस्क्ृति-ग्रन्थ समझ लिया हैँ! यह गलत बात है।

भाग्तीय संस्कृति के चार युग वीत चुके, पाँचवाँ शुरू है। इन सांस्कृतिक युगों को हमारे मित्र श्री दिनकर' जी ने अध्याय” नाम दिया है। में ने भी उन्हीं का अनुसरण किया है इस पुम्तक में इस वतमान (पांचवें) अध्याय के बारे में ही विशेष रूप से कहा जाएगा | चार पिछले अशध्याय ता समाप्र हो कुके उनमें जो गलती हुई हे, उसे इस पाँचवें अध्याय में सुधार लेना चाहिए। इसी ओर इस पुस्तक का प्रयत्न है

चार अध्याय

संम्कृति के पिछले चार अध्याय साफ हैं -- पहला अध्याय, वदिक और द्रविद् मिलन; या आय-द्रविड़ संगम | दूसरा अध्याय--भारतीय संस्कृति में शक हूण आदि का मिलन | तीसरा अध्याय भारतीय संस्कृति से अरबी-ईरानी तुर्की संस्क्ृतियों का संघय और परस्पर एक दूसरी से इनका प्रभावित होना | चोथा अध्याय-भारत में अंग्रेजी राज्य और ईसाइयत का प्रचार | पाँचवाँ अध्याय अब शुरू है, स्वराज्य में--सांस्कृतिक पय्य-

[ ]

वेक्षण ओर एकता के लिए प्रयत्न !

हम बोड्ध संस्कृति को प्रथक नहीं मानते वह भारतीय संस्कृति है | हाँ, भारत के वांद्धां की भारतीय संस्क्ृति है; जापान के बोद्धां की जापानी सस्क्रत चीन के वौद्ध चीनी संस्कृति के हैं। यानी मजहब आर चीज हैं, संम्क्रत ओर चीज

इस पुस्तक में चार अध्यायां का सामान्य दिन्द्शन हैं गा ओर पांचवें का कत्तव्य-निरूपण | चार अध्याय ता पांचवें अध्याय की भूमिका या पृवपीठका भर हैं। परन्तु भूमिका या पृवपीठिका ही ता आधार हैं उसी के सहारे आगे की चौज है

मुझे पता है, इस पुम्तक से एक हलचल मचेगी | पुस्तक की सफलता भो इसी में है। सांस्कृतिक एकता के लिए कबीर, अकबर, नानक, गांवी आदि एक से एक बढ़े महात्मा ने जान की बाजी लगा कर उद्याग किया; पर सफलता किसी का मिली ! इस का कारण क्या है ? इसी की खोज इस पुम्तक में है। संस्क्रति की खाज |. 'डिस्कवरी आफ कल्चर!

कनखल (उ० 2प्र) | दस किशारीदास वा जपयी

प्न्त्ट्ट्टटट्ल्टटटऊ

समपंण

उन राष्ट्रीय तत्त्वों को, जो इस युग में भय और प्रलोभन से ऊंचे उठ कर अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं -- लेखक

हक:

संस्कृति का पाँचवाँ अध्याय

(१)

ससकृति का स्वरूफ मम

संस्कृति हे क्या चीज, इस पर पहले विचार करना है 'संस्का र! और 'संस्कृति' सगे भाई-बहन हैं: यानी एक ही धातु से, एकही उपसग से. एक ही प्रक्रिया से ये दोनों शब्द बने हैं; पर अथ में किन्चनन भेद हो गया हैे। अथ-भेद होता, तो शब्द-भेद ही क्‍यों होता ? 'अथ भेदान शब्द-भेद:” या 'शब्दभे- दात्‌ अथभेदः” 'दुगति) और “दुगमन' में अन्तर है

'संस्कार! शब्द के दो अथ मुख्य हैं -- १-- परिष्कार ओर २- संसर्गजन्य प्रभावविशेष 'भाषा-संस्कार' का अथ है भाषा का परिष्कार 'इस के संस्कार ही ऐसे हैं कि किसी की बात का असर नहीं पड़ता !” यहां 'संस्कार” का मतलब “परिष्कार' नहीं; प्रत्युत किसी के संसगंजन्य विचारों का या विकारों का प्रभावा- तिशय है। आप किसी बसत्र में चमेली के फूल या छिला हुआ लहसुन अलग-अलग लपेट कर रख दें। घंटा-दो घंटा रहने दें फिर फूल-लहसुन अलग कर दें। ये दोनों चीजें अलग होने पर भी कपड़े में चमेली की सुगन्‍न्ध और लहसुन की दुगन्ध बनी रहेगी | फूलों का या लहसुन का संस्कार कपड़े में

हो

गया। इस “संत्कार का वरिप्कार ने कहा जाए गा। कुछ इसी अर्थ को लकर “संस्कृति शब्द चला हैं | किसी जाति का जीवन बहुत लम्बा होता हे-- हजारों वर्षा का--पचास- पचास हज़ार ओर इससे भी अधिक का। एक जाति में जन- संख्या भी बहुत हाती है--लाग्बॉ-करोड़ों ! तो, इतन लोग पर स्‍्पर भिन्न-वृत्ति-प्रवृत्ति के हाते हुए भी कुछ बातां में एकस हं।ते हैं--उनकी कुछ बातें एक-सी होती हैं। एक घर में वहुतस व्यक्ति होते हैं, भिन्न-प्रक्ृति-प्रवृत्ति के | परन्तु वे सत्र गहन-ग्द्े खान-पान आदि में एक-स हाते हैं। जाति की भी यहीं स्थिति है | एक घर के व्यक्तियों की परस्पर जो स्थिति है, वही एक जाति के लाखों करोड़ों जनों की भी | एक जाति के सव घर ओर कुट्धम्ब अलग-अलग होने पर भी कुछ बातों में एक होते हैं तभी ताएक 'जाति होती हैं | इसे कुछ अच्छी तरह समझ लना चाहिए

घर का एक दायरा होता हैं, उसी तरह एक देश या राष्ट्रका भी। किसी घर में जा पंदा हा जाता है, बहू उस की सम्पत्ति-सम्रद्धि का मालिक या हिम्सदार कुदग्ती तौर पर बन जाता है। इसी तरह जिस देश में जिसका जन्म होता है, उस पर उसका म्वन्त्व स्वतः सिद्ध है, जन्म सिद्ध अधिकार है। तभी तो लोकमान्य तिलक ने कहा था--स्व॒गराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है! | घर पर जब विपत्ति आती हैं, ता सव के ऊपर पड़ती है देश पर आई हुई विपत्ति भी सबका भोगनी पड़ती हैं एक घर में पदा हुए लोग कुटम्बी कहलात हैं और एक देश या राष्ट्र में पेदा हुए लोगो का समप्टिनाम “जाति! हैँ जाति! का सम्बन्ध जन्म से ही हें। जिस धातु से “जन्म” बना हे उसी से “जाति! की भी निर्ष्पत्ति हैं। एक घर के लागों में भी परस्पर कुछ भद होता है, स्थिति में भी भद होता है। कोई

[ ११ ]

समाज में अत्यधिक सम्मान पा लता है, उँचे पद पर पहुंच जाता 6 ओर काई साधारण स्थिति में ही रह जाता है| कोई बहुन नीचे भी गिर जाता है | परन्तु सबका कुट्ुम्ब एक ही है ! उच्च व्थित के सदम्य से कुटुम्ब का सम्मान बढ़ता है और नीच से अपमान भोगना पड़ता है इसी तरह राष्ट्र के--जातिं के- किसी एक ही सदस्य से लव का सिर ऊँचा हो जाता है ओ।र एक ही से नीचा भी हा जाता है एक घर के व्यक्तियां के काम जसे अलग-अलग होने हैं, उसी तरह जाति के लोग भी अलग अलग काम करते ईं - अलग-अलग स्थिति भी उन की है।ती है | परन्तु जाति से सब एक हैं

उदाहरण लीजिए | हिन्द जाति है, जिसमें हजारों वग हैं, जिन का समावेश चार वर्णा में किया गया है। ब्राह्मण से लेकर भंगी तक, सब एक जाति के हैं --सब का जन्म हिन्दुस्तान में हुआ हैं। सच्र के संस्कार एकन्से हें--सबकी संस्कृति एक है ब्राह्मण से लकर भंगी तक, सभी वर्गों के हजारों म्त्री-पुरूप कहीं खड़े कर दीजिए और फिर किसी दसरी जगह के व्यक्ति का सामने ला कर खड़ा कर दीजिए, जो उन्हें पहल से जानता हो। फिर उस से कहिए कि इस समृह से ब्राह्मण, क्षत्रिय बश्य, लुहार, चमार, भंगी आदि वर्गा के व्यक्तियां का छॉट कर अलग कर दीजिए; तो वह सो जन्मों में भी वसा कर सके गा | क्‍यां ? इसलिए कि वे सब एक जाति के हैं-- सब हिन्दू हैं सब को संस्कृति एक है। अच्छा, रूप से सही, नाम-भेद से वह सब को प्रथक्‌ प्रथक्‌ व्गशः पहचान सकेगा ? ह॒गिज नहीं ब्राह्मण कहेगा- मेरा नाम केशव, बाप का नाम रामचन्द्र भंगी भी कहेगा--नाम मेरा केशव, बाप का नाम रामचन्द्र त्राक्षण की लड़की भी सावित्री, सशीला ओर भंगी की भी

[ १९ 7]

लड़की सावित्री सुशीला | तब केसे वर्ग-भेद होगा ? वे सब एक जाति के लोग काम अलग-अलग करते हैं; वस ! गरीब अमीर की स्थिति देखकर भी वर्ग-भेद पहचानना असम्भव है संस्कृति की एकता ने एक जाति बना दी है एक जाति में अनेक मत- मजहब होते हैं उस एकत्रित समूह में वेदिक सनातनी. आर्य- समाजी, वेष्णव, शेव सभी तरह के लोग होंगे ओर अवेदिक, जेन, बौद्ध आदि भी | कुछ 'ला-मजहब' ओर नाम्तिक भी होंगे। क्‍या कोई पहचान सकता है कि आयसमाजी कोन है ओर जेन कौन है ? आस्तिक और नाग्तिक (जाति में) सब एक हैं संस्कृति की एकता उन्हें प्रथक नहीं होने देती उन का बर्ग्शः या मतशः पाथक्य जातीय एकता का बाधक नहीं हो सकता; क्योंकि एक जाति की एक ही संस्कृति होती है और सांस्कृतिक एकता सब को एक किए रहती हे

किसी जाति की संस्क्रति बहुत लम्बे अरसे से चले रहे पुरखों के जीवन-प्रवाह के समुदित संस्कार ही हैं। वे संस्कार जाति-जीवन में इस तरह घुल-मिल जाते हैं कि उन्हें कोई अलग कर नहीं सकता | वे संम्कार विचार में, आचार में, भाषा में, वेश-विन्यास में, खान-पान में, सवत्र अपनी अमिट छाप रखते हैं,। यही संस्कृति हे एक संस्कृति से एक जाति की पहचान हो जाती है एक हिन्दू संसार के किसी भी भाग में चला जाए, विशेषज्ञ जन पहचान लें गे कि यह हिन्दू है। जो लोग हिन्दू जाति की संस्क्रति से परिचित नहीं, वे कुछ समभ पाएँ गे। परन्तु कोई विशेषज्ञ भी यह नहीं बता सकता कि यह जन ब्राह्मण है, या कायस्थ है, या भंगी है कारण, ब्राह्मण-भंगी आदि प्रथक जातियां नहीं, वर्ग हैं | इसी तरह बढ़ई-लुहार आदि जातियां नहीं वर्ग हैँ। लोग भूल से इन्हें प्रथक-प्रथरु जाति

[ १३ ]

कहते-समभते हैं। यदि ये प्रथक जातियाँ होतीं, तो इनकी संस्कृति प्रथक्‌ होती ओर संस्क्रति-पाथक्य से वे प्रथकू-प्रथक्‌ सरलता से पहचाने भी जा सकते ऐसा है नहीं एक जाति है, एक नेशन है | इस जाति (या नेशन) का अपना राष्ट्र हे-- हिन्दुस्तान, भारतवष

'हिन्दु' सही, हिन्दुस्तानी सही

ऊपर हमने बताया कि हिन्दू” एक जाति का नाम है, किसी मजहब या वर्ग का नहीं परन्तु तो भी, कुछ लोग हिन्दू” एक मजहब समभने लगे हैं। पूछो, इस मजहब को किस ने चलाया ? वेदों ने ? तब जनों का क्‍या कहा जाए गा ? कलकरत्ते के बाबू पद्मचन्द्र जन बहुत दिन तक हिन्दृमहासभा के मंत्री रहे | बोौद्ध भी वेद नहीं मानते; परन्तु बरमा के बोद्ध 'भिक्तु उत्तमा' हिन्दुमहासभा के अध्यक्ष थे। हिन्दुओं में ला-मजहब ओर नास्तिक भी हैं-- सदा रहे हैं | इन्हें कभी किसी ने गेर- हिन्दू” नहीं कहा ! तब 'हिन्दे! एक मजहूब केसे ? अधिक से अधिक कहा जाए गा कि--

“जो (हिन्दुस्तान सही) भारतवप से बाहर पेदा हुए ईश्वरीय दृत (पेगंबर) हजरत ईसा या हजरत मुहम्मद साहब के मत को नहीं मानते, वे सब हिन्दू हैं ।”

हम निषेधात्मक परिभाषा माने लेते हैं ओर हिन्दू” तथा हिन्दुस्तान” की जगह “भारत! तथा 'भारतीय' कहेंगे। भारत एक देश या राष्ट्र और 'भारतीय' एक जाति। “भारतीय! जाति की एक संस्क्रति-'भारतीय संस्कृृति' | अब इस संस्कृति के कोई भेद होंगे बौद्ध संस्कृति, जेन संस्कृति, वेष्णव संस्क्रति, नास्तिक संस्कृति जेसे काल्पनिक भेद उपहासास्पद हैं। 'लुहार-संस्कृति' ओर “बढ़ई-संस्क् त' भी मजाक है इसी तरह

| ]

'हिन्द संस्कृति! ओर 'मुम्निम संम्कृति' के भेद होंगे। एक भारतीय संभ्कृति' | बंगाल के (म्वर्गीय) राज्यपाल श्री हरेन्द्र कुमार मुकर्जी ईसाई | उन्हें या उनको ग्रहिणं। का देख कर क्या कोई पहचान सकता था कि ये ईसाई हैं ? असम्भव ! में ने उनके दर्शन कलकत्ते में एक सांस्क्रतिक समागह में किए ! सफेद चुन्नटदार थाती, कुर्ता ओर बस ! श्रीमतो मुकर्जी एक सादी साड़ी पहन थीं। परन्तु मुकर्जी साहब ईसाई पक्के जन्म भर एक मिशन में काम किया था ओर मृत्यु पर इसाई- पद्धति से अन्त्य क्रिया उनकी हुई थी | बंबई के भूतपृव्र राज्यपाल श्री महाराजसिंह भी ईसाई हें गाजकुमारी अम्ृतकार भी इसाई हैं | इन लोगां के नाम-रूप से कोई भी इन्हें हिन्दुओं से भिन्न नहीं कर सकता भारतीय जाति के हैं. मजहब से ईसाई हैं। कांग्रेस के प्रथम अध्यज्ञ श्री व्यामेशचन्द्र चक्रवर्ती भी ईसाई थे। यहाँ ( गुरुकुत कांगड़ी के जलसे पर ) एक बढ़े विद्वान ईसाई पादरी आय-समाज का ग्वण्डन करने आए थ-'पं जगन्नाथ गाव | उनक लड़क का नाम 'पं० क्पानाथ गाव!। “राव” मराठा ब्राह्मण हाते हैं। मे पं० जनन्नाथ रांव से घर का हाल पूछा ईसाई हा ज्ञान के बाद उन का विवाह जिस स्त्री से हुआ, वह जन्मना मुसलमान थी ओर ईसाई हो जाने पर भी उकका पूवनाम (हमीदा ) बदला नहीं गया था | पं० जगन्नाथ गाव ईसाई मजहब के बढ़े कट्टर प्रचारक थे। हरिद्वार में भी एक मिशनरी केन्द्र हं। यहीं वे बस गए थे। उनका लड़का 'क्रपानाथ राव' स्कूल में मेरा शिष्य रह चुका है, अब सना में अच्छे पद पर है पं० जगन्नाथ राव की लड़को का नाम मदला' था। में ने पं० जगन्नाथ गाव से पूछा --'आप इईंसाई हो जान के बाद भी (राव! हैँ ? बाज-मजहब बदला , या पुरख भी बदल दिए ?? उत्तर वहुत ठीक था। ज्वालापुर-गुरुकुल

[ १४ |

महाविद्यालय के आचाये पं८ नरदेब शाम्त्री भी राव हैं। इनका अपना असली नाम “नरसिंह गात्र है। लाहाग मे इनक विद्यागुर आय-विद्वान ने 'नग्देव' नाम कर दिया था। में ने पं० जगन्नाथ गाबस कहा - तो फिर राव जा ता आप के हा वर्ग के हैं ।' (महाविद्यालय में पं> नग्देव शाम्त्री को सब लोग 'राव जी! ही कहते हैं)। मर प्रश्त के उत्तर में पं> जगन्नाथ गाव ने कहा-- “हाँ हम दोनों राव तो हैं: पग्य वेदों के माया-जाल में पढ़ हैं; में बाहर निकल कर प्रकाश में गया हैं !” में ने पं5 जगन्नाथ गाव से विदेशी मिशनरियों के बारे में भी बात-चीत की थी। में ने कहा “ये, लोग तो अराष्ट्रीयता फेलाते हैं आप का इन से क्या मेत्न ? उन्होंने कहा-- तागा का जातायता (नशनालटा) जरूर भिन्न है; पर हम ता इसाइयत के प्रचार में साथ हैं। जातीयता में हम अलग हें। जातायता म॑ हम आप के साथ हैं। मजहब में अलग हूं

संक्षेप यह कि भारत एक राष्ट, भारतीय जाति! यानी भाग्तीयता' जाति आर इस जातीयता का अभभश्यक्त करने वाली एक अपनी? संस्कृति है

बाहर के लोग

जिस घर में जिसका जन्म होता है. वह उस पर म्वा- मित्व रखता हैं ओर अपने कुल की मयांदा का ध्यान रखता हू, अपन पुरखा कं संस्कार लकर चलता है| परन्तु एसा भा देखा जाता हैँ कि किसी दूसरे घर में पंदा हुए लड़के को लाग 'गाद' ले लेते हैं ओर वह इस नये घर में आकर इसका मालिक बन जाता है। परन्तु गोंद आए हुए लड़के का इस नये घर का “अपना घर समभना होता हैं | इसी घर के पुरखों को वह अपनाता है. ओर इसी के आचार-विचार ग्रहण करता हैं।

[ १६ |

परन्तु इस के मन में कदाचित्‌ यह भी रह सकता हे--रहना स्वाभाविक है--कि में इस घर में गया हूं, पर मेरा असली अपना घर तो वह है ! यानी ममता उधर भी रहती है, रह सकती है | परन्तु इस (गोद आए हुए) लड़के ओर लड़कों के लड़के आगे उस की ममता एकदम छोड़ देते हैं, जहां से उनका वह पिता या पितामह गोद आया था वे सनी-सुनाई बातों से इतना जानते भर हैं कि हमारे पितामह अमुक जगह से गोद आए थे | और आगे चल कर वह म्मृति भी प्रायः नहीं गहती

इसी तरह एक जाति किसी दसरी जाति के घर में -- उस के राष्ट्र में-पहुँच जाती है वहां यदि पहुँच युद्ध आदि के द्वारा विजेता के रूप में हैं, ता कुछ दिन तक गुप्र-प्रकट संघप रहता है ओर फिर मेल हो जाता है | धीरे-धीरे यह नई आई हुई जाति नई जगह को अपना लेती ह--उसी में घुल-मिल जाती है आर वह अनकता पुनः एकता में परिणत हा जाती है | एसी म्थिति में 'प्राधान्यन व्यपदेशा भवन्ति'- बहत्व के आधार पर नाम-रूप ग्रहण होता है जो धारा पहले से प्रति प्रित है. जो आधिक्य से भी है, उस का नाम-रूप रहता है। दसरी उसी में विलीन हो जाती है ऐसा नहीं होता कि इस संगम” के बाद “गंगा! ओर “यमुना? नाम रहे, वरन 'मिश्रित' नाम की कोई नई ही नदी बन जाए ! यह भी नहीं कहा जाता कि प्रयाग में गंगा और यमुना दोनों समाप्त हो गई और एक तीसरी ही नदी बन गई ओर इस “मिली-जुली? नई नदी का नाम 'इलाहाबादी' नदी रख दिया जाए ! गंगा में प्रारम्भ से लकर समुद्र पयन्त हजारों नद-मग्ने मिले हैं। और बीसों नदियां मिली हैं | दस-पाँच तो बड़ी-बड़ी नदियाँ मिली हैं | परन्तु सब की वह मिली-जुली धारा रही आखिर “गंगा! ही

[ १७ ]]

इसी तग्ह भाग्तीय जाति में--इंडियन नेशन' में-- हर से आ-आ कर शक, हण आदि जाने कितनी जन- धाराएँ मिलीं और खप गई आज कौन कहता है कि हमारे पुरखे शक या हण थे ? सब भारतीय रंग में रँग गए। किसी को शककों या हगां का वंशज कह दो, तो वह गाली समझता है! में ने एक बार शब्द-व्युस्पकत्ति के लिहाज से “सक्सेना तथा 'भटनागर' जनों को शकों आदि से कह दिया, तो लोगों ने बहुत बुरा माना ! बुरा मानने की बात भी थी। भारतीयता रंग में शगाबोग कोई जन-बग अपने को किसी पर-राष्ट्र से अनुस्यूत केसे कह सकता हैं ? दूसगा कोई वसा कहे. तो वह बुरा क्‍्यां माने गा? मतलब यह कि शक-हूण आदि की चर्चा केवल इतिहास में है; यद्रपि उनके बढ़े बड़े समुदाय यहाँ रहे और इस देश पर शासन किया फिर घुल-मिल गए | किसी ने उन विज्ञातीय जनों की 'भारतीय जाति' में मित्ञान के लिए कोई उद्योग नहीं किया | काई 'शुद्धि-सभा' नहीं बनाई गई इतिहास में एसा कोई जरा भी संकेत नहीं हैं वे सब स्वतः भारतीय बन गए। अपने बच्चों के नाम भारतीय भाषा में रखने लगे. यहां का रहन-सहन ओर आचार-विचार ग्रहण कर लिया और बस ! मत-मजहब चाहे जो मानते रहो | एक जाति में सेकड़ों मत-मजहब <ह सकते हैं कोई ईश्वर को मानता है, कोई नहीं मानता; दोनों ही भारतीय! हैं, यदि भारतीयता उनमें है जब तक कोई विदेशी रँग-ढेँग में डूबा रहे गा, तब तक वह भारतीय जाति! या “इंडियन नेशन” का ने समझा जाएगा हो नहीं सकता, कोई हजार कहता

समभता रहे !

शक ओर हूण आदि ता “भारतीय” बन कर हम में

मिल-खप गए; पर आगे आने वाले कई जातियों के लोग मिल सके--न मिले ! मजहब की आड़ लेकर एक प्रथक संस्कृति का निर्माण कर लिया गया। जब दो संस्कृतियां हैं, तो दो जातियां बन ही गई ! 'संस्क्रति' और “जातीयता” प्रायः एक ही चीज हैं| “हिन्दूपन” ओर 'हिन्दू-संम्क्रति' एक चीज समभिए “हिन्द' तो एक जाति, जिस में हजारों मत-मजहब ओर वग, या दल हैं | परन्तु इस्लाम” एक मजहव है, जाति नहीं। इस मजहब के आधार पर भारत में एक नई संस्कृति का निर्माण किया गया, जिसे सब लोग 'मुम्लिम संस्कृति! कहते हैं। एक जातीय संस्कृति, या राष्ट्रीय संम्कृति और दूसरी मजही संस्क्रति तुक-संस्कृति, अरब-संस्क्रति, ईरानी संम्कृति, चीनी संम्कृति आदि की तरह ही हिन्दू संस्कृति! है, राष्ट्रपरक, कि मत-परक। हिन्दू संस्कृति! ओर भारतीय संस्कृति! पय्याय-शब्द हैं | दूसरे लोग जब “हिन्दू! एक मजहब सममभने लगे, तब भारतीय संस्क्रति' शब्द चला | परन्तु मुस्लिम संस्कृति' के साथ-साथ हिन्दू संस्कृति! शब्द भी चलता ही रहा, चल ही रहा हैं और आगे चलेगा भी शब्द कहाँ तक छोड़े जाएँ गे। 'हिन्द' भी भारतीय जनों को विदेशी जनों ने ही कहना शुरू किया था | इस शब्द का 'सिन्धु से संम्बन्ध हैं; किसी मजहब से नहीं। इस लिए हमने-- भारतीयों ने--इसे ही ग्रहण कर लिया | सिन्धु (सिन्ध नदी) से लेकर सिन्धु (पूरबी-दक्षिणी समुद्र) पय्यन्त, समग्र भू-भाग, आगे चल कर 'हिन्द' कहलाने लगा। “हन्द' एक राष्ट्र ओर डस की जाति 'हिन्दू” जेसे नहर! से नेहरू' जब हिन्दू शब्द को लोग मजहब में दाखिल करने लगे, तो 'हिन्दी' शब्द चला परन्तु इस 'हिन्दी जाति! का निर्माण, या उस जाति का नया नाम होने पर भी वह प्रथक्‌ ही रही ! जब दो संस्कृतियों,

[ १६ |] तो दो जातियाँ, तब दो राष्ट्र ! आगे चल कर इस भिन्न संस्क्ृति- मुस्लिम तहजीब--के आधार पर एक राष्ट्र के दो टुकड़े करिए गए ! बीच से नहीं, कहीं-- कहीं से | जहाँ जहाँ 'मुम्लिम संस्कृति या इस्लाम की प्रधानता थी, सब का काट-जाड़ कर एक नया राष्ट्र बना--पाकिस्तान

परन्तु बचे हुए भारत में अब भी वह दूसरी संस्कृति है, उस संस्कृति के अभिमानी यहाँ कितन ही कराइ हैं ! ये लोग अब भी माँग करते हैं कि इस दश की भाषा इसी देश की लिपि (नागरी) में ही नहीं, फारसाी लिपि में भी लिखी जानी चाहिए ओर इस भाषा में संस्कृत के नहीं, अरबी-फारसी-तुर्की आदि के शब्द रहने चाहिए | भन्‍न-संस्क्ृति के अनुरूप ये लोग सभी बातों में भिन्नता बनाए हुए हैँ अभी परसों (ता० १७-८-५६) की बात हें--अखबारों में छपी दे कि मुहरम के दिन एक बहुत बड़ी मुम्लिस भीड़ ने एक मन्दिर के सामने पाकिस्तान जिन्दा- बाद' के नारे लगा-लगा कर आसमान गुजा दिया ! हेदराबाद आदि में पाकिस्तानी झंडा फहराने की कई घटनाएँ सामन चुकी हैं | भला इस्लाम से ओर “पाकिस्तान जिन्दाबाद' से क्‍या सम्बन्ध ? कभी कोई अफगान या इरानी मुसलमान भी “'पाकि- म्तान जिन्दाबाद' और “अफगान मुदाबाद' के नारे लगाता है ? कभी चीन के मुसलमानों ने भी, वहाँ के बौद्धों या ईसाइयों से रगड़ कर, 'पाक्िम्तान जिन्दाबाद! या “अरब जिन्दाबाद' के नारे लगाए हैं ? असम्भव ! उन लागां में राष्ट्रीया है, जातीयता है ओर मजहब उस (६ राष्ट्रीयवा या जातीयता ) पर हावी नहीं हो सकता राष्ट्रीया ही आगे बढेगी। चीन बोद्ध देश है; बुद्ध की मान्यता वहाँ सर्वोपरि है। परन्तु इस का मतलब यह नहीं कि बुद्ध की जन्मभूमि (भारत) के वे

[रे .]

मानसिक गुलाम हों। वे सव चीनी पहले हैं; वोद्ध आदि बाद में पुराणों से तो यह भी पता चलता है कि बौद्ध चीन ने बुद्ध के इस देश (भारत) पर सेनिकर आक्रसण भी एक बार किया था | ओर यहां से पराजित होकर गया था और प्रतिज्ञा की थी कि “इस तरह राजनेतिक दृट्टि से आगे चीन कभी भी इधर मुँह करे गा ।” मतलब इतने से कि मजहब से ऊँचा दर्जा गउट्रीयता या जातीयता का ६। जाति ही नहीं, तो मजहब कह्दाँ रहे गा ?

जो बात भारत में है, वही पाकिस्तान में है पश्चिमी पाकिम्तान 'नापाक लागों को, तहस नहस करके, भगा खदेड़ दिया गया हैं और इस तग्ह यह भाग तो पाक हो गया हैं पूरी तरह ! परन्तु पूरबी पाकिस्तान में अभी भी बहुत से भार- तय बने हुए हैं। ऐसा जान पड़ता है कि बंगला भापा और बँगला लिपि का यह महत्त्व हे। इम्लामिक संम्कृति वाल भी अपने काम में बंगला भापा ओर वँगला लिपि का प्रयोग करते हैं। यों दोनो जगह एक भापा ओर एक लिपि हैं। इसी एकता के कारण करोड़-डेढ्-करोड़ भारतीय अभी वहाँ हैं; यद्यपि धीरे- धीरे निकाले जा रहे हैं। यानी, पाकिस्तान के भा एक भाग में अभी तक भारतीय संस्कृति है इन दो संम्क्ृतियों का परिणाम वही हो सकता है. जो होता आया है ! हो सकता है कि कभी म्व॒तन्त्र राष्ट्र पाकिस्तान में भी राष्ट्रीया का उदय हो और 'फजलुल हक' जैसे अरबी नामों की जगह बंगला भापा के शब्दों में बंगाली मुसलमान अपने बच्चों के नाम रखने लगें और अरबी-ईरानी रहन-सहन आदि की जगह बंगाली रहन-सहन आदि अपना लें। हो सकता है, सिन्ध और पंजाब के मुसलमान भी अरब की

भाषा में नहीं अपनी (सिन्धी-पंजाबी) भाषा में अपने वच्चों के नाम रखकर सिनन्‍्धी ओर पंजाबी रहन-सहन अपना लें। तब तो एक राष्ट्र एक संम्क्ृति ठीक | सम्भव है. भारत के मुसलमानों से पहले पाकिम्तानी मुसलमानों में राष्ट्रीवा का जागरण हो ओर वे “अल्लाबख्श' की जगह 'ईश्वरदत्ता नाम से अधिक प्यार करें | मनहब तो मना नहीं करता | हजरत मुहम्मद साहब ने, या दूसरे किसी पगंबर ने तो कहीं किसी हुक्म में ऐसा कहा नहीं कि मुसलमान जहां पंदा हुआ हा. वहाँ को भाषा में उस का नाम रहे ओर वां के रीति-रिवाज बह माने ! पाकि- म्तान के मुसलमान स्वतन्त्रता का अनुभव करते हैं; इस लिए उन में राष्ट्रीयवा का जागरण अधिक सम्भव है! तक-ेता कमाल पाशा के हाथ में जब प्रभुसत्ता आई. तो उसने अपने नाम का एक अंरा बदल लिया था | 'पाशा' की जगद्द “अतातुक कर दिया था; इस लिए कि 'पराशा! अरब भाषा का शब्द हैं; अतातुक' तुर्की भाषा का हैं। इस जार से राष्ट्रीयता को पकड़ने का फल यह हुआ कि तुकराष्ट्र ऐसा शक्तिशाली हो गया कि संसार उधर देखने लगा। कमाल अतातुक ने इस्लाम नहीं छोड़ा, उसकी ओर प्रतिष्ठा की; परन्तु राष्ट्रीयवा का जय-घोष किया इस्लाम का सतलब यह तो नहीं कि किसी दूसरे देश के मानसिक गुलाम बन जाओ !

परन्तु भारत में ओर पाकिस्तान में अभी बहुत संख्या उन लोगों की है. जो मजहूब को राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय संस्क्रति से भी ऊपर मानते-समभते हैं ! हम यह भी मान लेते हैं, मजहब को सबसे ऊपर सममिए; परन्तु मजहब के नाम पर दूसरे देशों की मानसिक दासता तो मजहब नहीं है! दोनों चीजें अलग-अलग हैं

संस्कृति का यह पाँचवाँ युग या पाँचवां अध्याय भारत में चल गहा हैं, जिस में पाकिस्तान भी सम्मिलित है। राजन- तिक या शासनिक इष्टि से राष्ट के दा भाग हो गए हें--संस्कृति- भेद के नाम पर | परन्तु वरतुतः दानां शार्गों को संस्कृति एक है, जिसे आगे चल कर लोग समझे गे | इस पाँचवें सांस्कृतिक युग का यह सब से बढ़ा महत्त्वपृणं काम हैं कि हम लोग संस्कृति का सही रूप समझ कर मिशथ्यामिमान होड़ दें। इससे "एक जाति! का निर्माण होगा -णएक जाति का महत्त्व समझ में आए गा--ओर राष्ट्र एक सूत्र में बैच कर तेजस्बी होगा

[

संस्कृति के प्रादशिक तत्त्व

किसी बहुत बड़े राष्ट्र के अद्ग-उपाड़ प्रदेश-मण्डल आदि-) इतने-इतने बढ़े हाते हैं कि संसार के छाटे-छाटे स्बतन्त्र राष्ट्र को अपनी गोद में बेठा सकते हैं ऐसे बड़े राष्ट्रों में एक भारत: बष भी है। ऐसी स्थिति में जोवन का ग्हन-सहन ओर बोली- भाषा आदि में अन्तर आना स्वाभाविक ही है यही अन्तर अवान्तर संम्कृतिभेद करता हे। यदि अमरीका या रूस में अपने भारत के कुछ बंगाली. कुछ पंजाबी, कुछ मराठे ओर कुछ तामिल जन इक्ट्टे कहीं दिग्बाई दें, तो कोई भी कह देगा- ये हिन्दुस्तानी हैं?। परन्तु काई भी विदेशी यह भेद कर सके गा कि इन में कोन बंगाली हे, कोन गुजराती कोई ऐसी चीज जरूर है, जो बंगाली और गुजराती आदि में समान रूप से है यही सामान्य वस्तु जाति-तत्त्व है | वह “हिन्दुस्तानी- पन! हैं, हिन्दुग्तान की जातीयता या संस्कृति हे कि लोग पहचान लते हैं। वहाँ हिन्दुस्तानी मुसलमान में भी कोई अन्तर दिखे गा। उस में भी हिन्दुस्तानीपन है; भले ही अन्तर कुछ हो यह

तो हुई राष्ट्र की चीज

परन्तु प्रत्येक प्रदेश अपनी विशेष स्थिति रखता है उस स्थिति के अनुसार उस का सामाजिक जीवन ढलता-चलता है उस विशेषता के कारण हम पहचान लेते हैं कि यह बंगाली है, पंजाबी है. या गुजराती है। परन्तु मत-मजहब या सम्प्र- दाय आदि से काई नहीं कह सकता कि यह वेदिक हू, या अवबे- दिक; ईश्वरवांदी हैं, या अनीश्वरवादी। प्रादेशिक संम्क्ृति सत्र में एक सिले गी |

इन विभिन्न प्रादेशिक तत्त्वां का एक सूत्र में गूँथने वाली चीज हे --राष्ट्रीयवा, जात,यवा, भारतीयता या भारतीय संस्कृ- ति। भारतीय सभी (प्रादेशिक) भाषाओं को एक सूत्र में लाने वाली है हमारी संस्क्रत भाषा पूत्र, पश्चिम ओर उत्तर भारत कै विभिन्‍न प्रदेशों में जा जन-भाषाएँ हैं, किसी किसी प्राकृ- तनअपभ्रंश के परिवर्तित रूप हैं। सभी प्राकृतन्‍अपश्रंशों की उपजीव्य संस्कृत भाषा रही हु ऑर आज़ की सभी प्रादेशिक भाषाओं की उपजीव्य भी संस्कृत हो है। दक्षिण भारत की भाषाओं का उद्गम प्रथक्‌ है; ऐसा भाषातत्त्वविद कहते हूँ जान भी यही पड़ता हे परन्तु आज की सभी दक्षिण प्रदेशीय भाषाओं पर संस्कृत का उतना ही प्रभाव है, जितना अन्य प्रदेशीय भाषाओं पर। यां संस्कृति की उपजीव्यता ने भारत की सभी भाषाओं में एक-सूत्रता कायम कर रखी है।

सभी प्रदेशों के पहनावे में कुछ कुछ अन्तर मिलेगा; पर तो भी कोई ऐसी चीज है कि सब एक जना-माने जाते हैं स्त्रियों में घोती साड़ी के रंग-रूप प्रति प्रदेश भिन्‍न हैं; पहनने का ढेँग भी भिन्‍न है; परन्तु तो भी सब भारतीय हैं। सिन्दृर की बिन्दी तो सभी प्रदेशों की सोमाग्यवती स्त्रियाँ मस्तक पर

[ २४ |]

लगाती ही हैं | कोई भी भारतीय स्री अरबी पहनावे में मिले गी ! भारतीय शब्द का यहाँ ताक्ष्विक अथ लोजिए |

सबसे बड़ा ओर सुदृढ़ एकता-सूत्र है पुरखों का एक होना सभी प्रेदेशों के भारतीय अपने को याज्ञवल्क्र्य, वशिष्ठ, राम, क्रष्ण आदि का वंशज मानते हैं। एक पुरखे हैं, तब ऊपरी अनेक-रूपता अलग केसे करेगी ?

कुछ जातीय प्रतीक होते हैं, जी सब का एक किए रहते हैं। उदाहरणाथ गो के प्रति जा भावना-विशेप है, वह भी जबदस्त तत्त्व है, एक जातीयता निमाण में | किसी भी प्रदेश का भारतीय” ऐसा होगा, जिस की दूसरी भावना हो जो अभारतीय तत्त्व हैं, उनकी बात अलग है |

वेदिक काल से अब तक हमारी संस्कृत में बहुत कुछ परिष्कार-परिवत हुए हैं, बहुत मोड़ आये हैं; परन्तु धारा वही है। यह नहीं कहा जा सकता कि हमारा जो रहन-सहन आज है, वही वेदिक युग के हमारे पूवजों का था। उनकी भापा में और हमारी आज की भाषाओं में कितना अन्तर है ? परन्तु तो भी, हमें उस परम्परा का अभिमान हैं ओर हम उन पुरखों के नाम लेकर गव का अनुभव करते हैं |

एक जाति या राष्ट्र में जो एक सूत्र होता है, सबको बाँव रखने वाला, वही संस्कृति हं; यह कहा जा चुका है। जाति या समाज में कुछ ऐसे भी तत्त्व होते हैं, जा कुड अलग ही चलते हैं। यदि किसी देश में मजहबी कट्टग्ता हुई, तो ऐसे तत्त्व एकदम नष्ट कर दिए जाते हैं--नष्ट कर दिए गए हैं, या देश से निकाल दिये गए हैं। परन्तु यदि राष्ट्र में उदारता हुई, तो वे तत्त्व भी पड़े रहते हैं। वेदिक युग से ही भारत में गो को अधिक महत्त्व मिला ऋषियों ने कहा कि तुम्हारा शिव (कल्याण) बेल

[ २४ |

पर है |गो को वेदों में अध्न्या! कहा गया है। यानी उसी समय से गोहिंसा जघन्य अपराध घोषित है। यह जाति-तत्त्व है परन्तु इसके विपरीत, कुछ ऐसे भी कथानक हैं, जिनसे प्रकट हैं कि उस युग में भो ऐसे कुड् लोग थे, जो गो को “अध्न्या' नहीं स्वीकार करते थे। परन्तु इन 'कुछ' लोगों से 'जाति नहीं बनती है। आज भी वेसे' कुछ' लोग हैं, हमारी हिन्दू जाति में, जो गो को “अध्न्या' स्वीकार नहीं करते ओर गो-भक्ति का मजाक डउड़ाते हैं। परन्तु तेंतीस करोड़ की जन-संख्या में ऐसे लोगों की संख्या तेंतीस से भी कम होगी; तेंतीस से आधे भी निकलेंगे | परन्तु तो भी, एक-दो ऐसे प्रभावशाली लोग इन 'कुछ' लोगों में हैं, जिनकी विशेषता है ओर इतिहास में जिनका नाम रहेगा ऐसी स्थिति में, इनके गोविपयक विचार यदि लिपिबद्ध कर दिये जाएँ, तो दो-चार सी वष बाद लोग इस श्रम में पड़ सकते हैं कि भारतवष में दो-चार सो वप पहले गौ का महत्त्व ऐसा था ! इसी तरह हमारे पृबजों में भी कुछ वेसे खास व्यक्ति हो गए हैं तो भी, वे ओर ये 'कुछ”ः लोग किसी दूसरी जाति के हो जाएँगे; क्‍योंकि जाति” का संबन्ध जन्म से है | सबके पुरखे एक हैं। जब तक एक पुरखे हैं, उन्हें मानते हैं, तब तक विजातीय नहीं एक जगह इधर-उधर हो जाने पर भी अन्य बातों में एक हैं। ओर, बहुमत की ओर लोग खिंचते ही हैं जो कल तक गौ के अध्न्या' होने का मजाक उड़ाते थे, वे ही आज विधि-कानून बना रहे हैं कि “गो अध्न्या है। इसका हनन करने वाला अपराधी है और उसे सजा दी जाएगी ।” यानी जातीयता नष्ट नहीं हो सकती, नष्ट नहीं की जा सकती, उसमें कुछ हेर-फेर जरूर होता है; सो भी स्वतः, धीरे-धीरे संस्कार धीरे-धीरे बनते हैं, धीरे-धीरे बदलते हैं ओर धीरे ही धीरे नष्ट भी होते

| अर

हैं। पहले के संस्कार हटने में ओर दूसरे जमने में काफी देर लग जाती है इसी लिए किसी जाति का कोई बड़ा समुदाय जब अन्यत्र स्थायी रूप से जा बसता है, तो वहाँ की संस्कृति लन में देर लगती है संस्कार मन की चीज है। यदि सन उधर हो और ऊपर-ऊपर काई चीज ले ली जाए, तो वह चली जाएगी। टिकेगी नहीं। विजातीयता से संघर्ष

विजातीयता स॑ संघप हाता है | ऊपर हमने बतलाया कि एक जाति की एक संस्क्रति होती है ओर एक राष्ट्र की एक 'जाति? होती हू यदि कोई अन्यजातीय जनसमुदाय किसी अन्य राष्ट्र में जा वसता हैं, तो वह धीरे-चीरे वहीं घुल-मल जाता हैं। परन्तु, यदि अपनी संम्क्रति ओर जातीयता उसे अत्यधिक प्रिय है, तो फिर उससे विच्छेद सम्भव नहीं। अफ्रीका तथा लंका आदि में सामूहिक रूप से भारतीय जन बसे हुए हैं ।- -पुश्तां से बसे हुए हैं परन्तु वे 'भारतीय' बने हुए हैं। उन्होंने अपना हिन्दस्तानीपन नहीं छोड़ा है इसके लिए उन्हें कष्ट सहने पड़े -- सहने पड़ रहे हैं। वे वहाँ तंग किए जाते हैं, निकाल जा रहे हैं। अफ्रीका में पिछले पचास वर्षा से यही संघप चल रहा हे मजहब या सम्प्रदाय का सवाल नहीं, राष्ट्रीय का सवाल है अफ्रीका या लंका के लोग यह समझ रहे हैं कि जरूरत पढ़ने पर लोग हिन्दुस्तान का पक्त लेंगे. यहाँ का नहीं | इसी लिए संघप है | परन्तु अफ्रीका में बसे अंग्रेज लोग भारतवासियों को खदेड़ना चाहते हैं, यह देखने की बात है ! जोर-जुल्म !