कर्तारसिंह दुग्गल

चोली-दामन

राजपाल एण्ड सनन्‍्ज कश्मीरी गेद दिल्ली

प्रथम सस्करण

[्य। ०: ्ल््ननललज लि पन्ना फीपाहु8 700 शीएा। हज (किए, 77 «| |] बुर्गीसाड * 7 वंसपल लाइपरी' ज्याता (658 5०, चिभाग .62/ 8 का "ते, यक: 6 (2 .१8:8..

मूल्य साढ़े तीन रुपये

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नवीन मैस, दिल्ली

श्री कर्वारसिंद हुश्गढा पंजाबी के पुक प्रमुख सोहित्यकार हैं डउतकी रचनाश्रों का स्थान पंजाबी साहित्य में बहुत झँवा है। श्ॉकल- इण्डिया रेडियो से उनकी रचवाएँ प्रायः अस!रित होती रद्दती हैं द्विग्दी! पाठकों के सम्मुख यह उनकी प्रथम पुस्तक भआ रही है। आशा है हिन्दी जगत में भी श्री दुग्गलाजी की हस पुस्तक को प्रम्नुचित झादुर प्राप्त होगा।

“+मरक्लाशकः

सती पोणेह्ारनों के नाम--

थे. सोहंगी,शाद सोचंता।:-्रज चारो श्रोर संत्नाण क्‍यों. छाया हुश् हैं

जिन खेतों मैं किसान साँभ-सबेरे हंल चलाते; रखेंवार्ली करें; थाने शोर दोर-इंगर चराते, हँसते-खेंलते, माहियें की! ताने उड़ाते दिखाई .दिया कंरते में; आज उसकी समंभ में गहीं झा रहा था कि वे क्‍यों मौन हैं !:रुएंडंसुएड बबूले के पेड़ १९ एंक चिड़िया श्रंकेली बैंशी थी; खानकांह के खंगडेहूरों में से 'इंवा सीटियाँ बजाती बह रही थी। सोहरो शांह की दूध जैसी सफेद :दीढ़ी बिंख९*बिखंर. जाती झौंए बह एंड़ियाँ" उठा-उअंकरे, आँखें फाड़

१०

बह चुपके से मेंहदी की एुद्धिया उसके बड़े कसरे मे रख आएगा बितने दिलों से वह मेंह॒दी-मैंहदी पुकार रहा था। कल जब सोहणे शाह कवहरी से लौटा तो मार्ग में उसने आध सेर मैंहरी खरीद ली | “बुदब्रस्श सुसरे के ब्राल सफेद हो गए. हैं ।” तोपलाना बाज़ार के दुकानदार ने जेब सोहणें शाह की ओर अर्थपूर्ण श्रॉलों से देखा, तो सोहरे शाह ने उत्ते बताया--“न जाने कहाँ धूप मे बैठा ब्राल सफेद करता रहा है ।!” जब तक वह शअ्रपनी घोड़ी पर सवार होकर चल पड़ा, इधर- उधर की बातें करता रहा गाँव में दाखिल होकर उसने देखा---बूढ़ी बेरी तले कोई बेर नहीं गिरा रहा है, घुत नहीं रह्या है, खा नहीं रहा है। वैसे हर घड़ी लड़के और लड़कियों की गोलियों बेरी से विमटी रहती थीं। फंजल चौढ़ीदर के दालान मैं, चितकत्ररी कुतिया लोदरो शाह को देखकर झाज पहली बार भौंकी, वहीँ, बैटी-बैठी, वल जाती रही जैसे घरती में गडी हुई हो ! बाई ओर दूर वौगजे' पूर की खानकाह थीऔर आज उस पर चॉद-तारे बाला नया हरा भाएडी ' लहंगा रहा था--फँचा और लम्भा जैसे आकाश से बातें कर रहा हो चननी महदरी अपनी मट्ठी को लीप-पोत रही थी | “अ्म्माँ, आज इस गाँव के लोग कहाँ गए !? “चौधरी, मस्निद में कोई मौलवी श्राया हुआ है ।” और चत्नो,महरी ।मैं अगला वाक्‍्य--थे नामुराद नित-नय्रा एक गुल्ल खिला देते हैं,” श्रपने फैले मुँह ही में बुड़ब॒ुड़ाते हुए कहा लेकिन सोहणे शाह को निश्चय था कि छुदाबख्श अवश्य हवेली दी में होगा, उसने कमी ये धर्म और मस्जिद नहीं अपनाए; थे | बढी बात है जब सोहणे शाह ड्योड़ी में हरख्िछ इञ. तो साइसे कराए झे छुदा- चख्श बैठा था और उसकी चारपरई-से-चारपाई जोड़े एक चोगे वाला फ़न्नीर हे से कुछ कुसफुसा रहा था |, हिंगें शाह को देखकर दोनों आऔंक पड़े और “बिस्मिल्ला-भिस्मिलला! अगर मे. से, हक दालान में झा गए.

सोहणे शाह. मे सोचा--यह अपरिचित पीर नौगज़े-पीर -की समाधि” पर जियारत करने आया होगा | जाने कितनी देर तक वे बाहर दालान मैं बेठे हुए समाधि के चमत्कार की चर्चा करते रहे «. सोहरणोे शाह की अपनी इकलौती बेटी राजकर्ी के मेँ पूर॒ जब दाद हो गया था और पीछा दोड़ने ही में आता था तो. उस समांधि पर दीये जला-जलाकर उसका पिश्ड छूंग था। छदातरख्श कहता--“यदि भाभी, को भी यहाँ ले आते और मेरा कहा मान छेते''““ सोहशे शाह और खुदाबझ्श की श्रभी तक यह धारणा थी कि सोहरें शाह 'की पत्नी इतनी. जल्दी मर जाती ) सब्रका विचार था कि साए? का इलाज डाक्टरों और हकीमों के पास नहीं होता | सोहणे शाह अभी तके उस बात को बार-बार

सन्तान हुई, तो दीनों के घर एक-एक बेटी हुई। अभी अल्लादिता-की: को: परलोक सिधारे तीन मास-नहीं हुए: ये कि.सोहरो शाह की पंत्ली

घुदाब्रएश ने फिर पीरं जी को बताया कि. सोहणे शाह हूं पीर.की समाधि पर भण्डारा कराता है; जहाँ इलाके के सब्र लोग

श्र

जिसे वह तत्काल दबा लेता

उठने से पहले पीर ने सोहणें शाह से अखबार का कोई समाचार

पूछा | सोहरोे शाह कचहरी से लौटता हुआ अखबार अवश्य पढ़कर आया करता था| अभी तक तो उसे चारों ओर एक अशान्ति-सी पीली हुई दिखाई दे रही थी नवाखलोी में मुसलमानों ने हिन्दुओं को मारा था और, बिहार में बदला लिया जा रहा था | सोहरे शाह बार-बार अफसीत ते हाथ मलता और वार-बार पीर जी से पूछुता, “दुनिया को यह क्‍या

हो रहा है १!

सोहरणे शाह हैयन था कि एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी पर कैसे हाथ

डठा सकता है ! और उसकी आँखों के सामने राजकर्णी और सतमराई इँसती-खेलती हुईं, गाती हुईं, एकताथ उठत्ती-बैठती हुई", एक साथ सोती- जागती हुई' जाती अल्लादिता की हवेली मे बँधे हुए उसे अपने ढोर-डंग़र याद आए, और अपने घर में पड़े हुए अल्लादिते के गेहूँ के बोरे मी | बह सोचता, कितनी-किंतनी रात गए; तक वे हर रोज 'ारपाई से पवारपाई जोड़े हुए तारों फी छाया में इधर-उधर की बातें करते रहते थे | रात को;सदि एक खॉँसता, तो दूसरा जाग पड़ता, और फिर वे इधर-उधर की बातें छेड़ देते | सोहणे शाह को यदि कभी कचहरी में देऋ हो जाती, तो अंल्लादिता गॉव के बाहर बड़े पुल पर बैठकर उसंकी' राह देखा करता उधर से गुजरने वालों से अपने मित्र के सम्बन्ध में पूछता रहंता। लोग साइकलों पर से उतर-उत्तरकर और बकड़ों को रोक-रोककर अल्लादित्ता को सलाम भी फरते श्रौर यह भी बताते क्रि उन्होंने उसके मिन्न को कहाँ देखा था। कभी-कभी कोई अलनेला अल्लादित्ता से गिल्‍्लगी भी करता “चोधरी ! सोहणे शाइ के जिन! तुम्हारा सन नहीं लगता बय ! वह कोई व्चा तो नहीं कि रास्ता भ्रूल जाएगा ! क्यों बावला हो रहा है

चौधरी (22

पीर वैसे-का-बैठा चुप्वाप उठकर चला गया | खुदाबझ्श ओर सोइणें शाह «कितनी देर तक दालान मे बेढे बातें करते रहे | खुदाब्श के

१8

पड़ोस में छुह्दार रहते थे--ठक्‌-ठक्‌, ठन-ठन््‌ और टिक्‌_टिक्‌ की आवाज आती रहीं, श्राती रहीं--

* (एजुदाबख्श, तेरा पड़ोस बड़ा खराब है [?

“वहीं शाहजी, श्राजकल इन सुसरों के पास काम ही बहुत है |?

और फिर अभी. ये बातें कर ही रहे ये कि पिछली और से दौवार फॉदकर फ़तू छुद्दार दौडता हुआ आया--“देखना चौधरी, क्या यह ठीक है !? एक तया सान-घढ़ाया नेजा वह छुटातरूुश को दिखाने के लिए लाया, लेकिन सोहरोे शाह को देखकर जैसे वह जहाँ खड़ा था, वहीं जमकर रह गया।

खुटात्रर्श ने उसकी घत्रराहट को ठालने की बेकार कोशिश की। सोहरे शाह की समर्भा में नहीं रहा था कि आज ये लोग उससे क्यों विदक रहे हैं

श्र फिर छुदावर्श ने सोहणे शाह को लाख विश्वास दिलाया कि श्रगली नेजाब्राजी फी तैयारी के लिए. वह एक खास नेजा बनवा रहा था,

न्तु सोहणे शाह को उसकी बातों पर विश्वास नही आया और य॑हं उसी

प्रडी वहाँ से चल पड़ा का

रास्ते-भर खुदबरूश ऐसे नास्तिक की पीर के साथ कानाफूँसी, फिर उसे देखकर दोनों का चौंक पड़ता, फिर फतू लुहार कौ घबरा जाना, सोहणे शाह के|मन मेँ इन बातों से खलत्रली मचती रही |

बड़ी सड़क को पार करते समय सीहणे शाह ने एक और पीर को देखा--सिर सफाचट, हरा खोग़ा पहने हुए, नंगे पाँव, वह ढल्कौ और अ्रद्धियाले! की ओर जा रदह्य था।

“पीरजी, सलाम श्रर्ज करता हूँ |? सोहणे शाह ने स्वभाव के अ्रमुसीरं! कहा, लेकिन पीर ने सोहरें शाह की ओर आँख उठाकर देखा तक 'भहीं |

सोहणे शाह हैरान था--

फफ़्रो के गाँव के पास से जब वह गुजर रहा था तो छसमे- एक ञ्ौरं मीर क्रो देखा--भरपूर नौजैवान, तालों के पह्ढे रखे हुए! |

“श््

“पीर जी, सलाम अर्ज़ करता हूँ,” सोहणें शाह ने -शपने मिन्नं: अल्लादिते के धर्म का फिर सम्मान किया यह पीर भी चुपचाप उसके पैसे से शुक्र गया श्

सोहइरणें शाह सोचता कि यह कैसे नए-नाए. पीर बरसाती कीड़ों की तरह

: चारों ओर से निकल आए: हैं| किसी को इतना भी पता नहीं : क्िधंह

डस सारे इलाके का चौधरी है उसकी घरती सबसे अधिक है. और उसके

' साहूकारे की ईमानदारी की चर्चा प्रत्येक की जिह्बा पर थी।

सोहणे शाह्र को आज की शाम अवकाश था| उसका जी थाहा कि वह फफरों के गाँव में से होकर जाए, अपने गुमाश्तों की सुध-बुध लेता

“जाए एक गली में से वह शुक्र गया, दूसरी गली में से शुक्षर गया, जब

सोहणे शाह तीसरी गली में से मुड़ रहा था, तो उसने देखा--सैदल ' छुद्ार के दालान मैं पाँच भष्टियाँ तप रही हैं परिवार के सब छोटे-बढ़े .. काम में जुटे हुए हैं सोहणे शाह और आगे बढ़ा, और उसने देखा कि दालान नेज़ों, चेलचों और बछों से मरा पड़ा था |

हर

“४ «क्या कोई जंग शुरू हो गई है ! इन नेज्ञों का और इस सब-कुछ

: का क्या करोगे ?” सोहरें शाह ने सैदन से पूछा

. “यह छावनी का ऑडर है,” .सद्दैन ने तड़ाफ से घड़ा-घड़ाया उत्तर, दिया शेष-संभी उसका मुँह ताकने लगे | . | सोहरे शाह की समझ में कुछ नहीं रहा था। चावनी वालों ने इतने नेज़ों, इतने बेलचों और इतने बच्चों का क्या करना था! और फिर उसे फ़्तू छुह्दर के घर की भांगदोड़ याद आई, वहाँ कैसा कोलाइल मचा हुआ था--उसके पास. भी शायद फ़ौजी-आउ्डर होगा, फिर सोदणे शाह से सोचा--शायद कोई ठेकेदार आकर उन सबको ठेके दे गया है और वह

' सिर मारता हुआ सैदन के दालान में से निकल आया |

और अभी वह उनके घर के दालान में से निकल ही रहा था कि सैदन

छुहार का काम मेँ.व्यस्त एक लड़का खिलखिलाकर हँस पड़ा, फिर एकाएक

किसी ने उसके में पर हाथ रख दिया हो, सहसा जैसे किसी ने उसकी

श्र

हँसी जकड़ दी हो। सोहणे शाद्द ने सोचा कि लड़के को यों दूँसता हुआ्रां हक सैदन ने उसे मिड़का होगा, उसके किसी बड़े भाई ने संकेत किया हांगा।

नदी पार करके सोहरणे शाह जब दूसरे किनारे पर पहुँचा, तो उसने देखा--सामने एक टीले पुँर तीन-पार गुण्डे तुर्रां छोड़े हुए लम्बी-लम्बी बोहों से कभी एक और कमी दूसरी ओर इशारा कर रहे हैं. और बातें भी किये जाते हैं | एक के हाथ में एक लम्ग्रा-चौड़ा काग़ज़ है, जिसमे से वे कुछ पढ़ने का प्रयत्न कर रहे हैं

कोई नया पटवारी होगा, शायद कोई अपनी ज्ञमीनों की पड़ताल करवा रहा होगा--सोहणे शाह ने सोचा | शाम हो रही थी

सोहणे शाह की समझ में नहीं आता था कि आज उसका दिल क्‍यों बेठता जा रहा था, उसे बुरे-बुरे विचार क्यों रहे थे--धर पहुँचकर वह बवारपाई पर गिर पड़ा, उसने कुछ खाया, कुछ पिया

्‌

घर में राजकर्णी थी और पड़ोस से सतभराई की आवाज झा रही थी। चौधरी अल्लादिता पिछले तीन दिनों से बाहर किसी काम से गया हुआ था

रात घोर अधेरी थी।

नौकर-चाकर अपने-अपने काम से छुट्टी पा चुके थे। चौके में महरियाँ खाना बनाकर खाने वालों की प्रतीक्षा में जम्दह्गाइयाँ ले रही थीं

सोहणे शाह पलंग पर पढ़ा हुआ श्रपने अन्तर की किसी छाया के नीचे घुट जा रहा था। विचिन्-्से दृश्य उसकी आँखों के सामने घूमने लगते थे--

उसने धुना था कि नवाखली में मुसलमान पड़ोसियों ने हिस्दुओं के मोहल्लॉ-के-मोहल्लें जलाकर भस्म कर दिए थे। बच्चों, बूढ़ों और थुवकों को काटा गया, नोचा गया , दुकड़े-ठुकड़े कर दिया गया था | मुसलमान कहते थे कि दिव्य उसका पाकिस्तान नहीं बनने दे रहे थे |

१७9

* और ब्रिहार के हिन्दुओं को शिकायत थी--मुसल्मान उनके हिन्दुस्तान की आजूदी की राह में काँटे बिछ्ाते थे और उन्होंने अपने पड़ोसियों की फसलें बर्बाद कर दीं, उनकी स्त्रियाँ छीन लीं, उनके पुरुषों के सामने उनका अपमान किया | गोलियाँ चलाते ओर गँडासों से काटते हुए. बे थक गए, गोलियाँ सम्तास हो गई लेकिन मुसलमान समाप्त हुए,।

सोहरो शाह अपनी विधारधारा में बह रहा था कि उसे अपने घर के पिछवाड़े की ओर मुसलमानों के मोहल्लों में द्ोटे-छोटे अच्चे 'पाकिस्तान जिन्दाबाद? के नारे लगाते हुए सुनाई दिए | प्रतिदिन साथंकाल वें बच्चे यों ही किया करते थे--णक छेड़ी के साथ एक हरे रंग का चीथड़ा बाँध कर गलियों में दौड़ते रहते और “पाकिस्तान जिन्दाबाद! के नारे लगाते रहते | इनमें अवसर हिन्दू और सिक्ख बच्चे भी आकर शामिल हो जाते और मिलकर नारे लगाते, खेलते और गाते रहते |

“जिम्दाबाद-जिन्दाबाद! कहती हुईं, खिलखिलाकर हँसती हुईं,

राजफर्णी और सतभराई गली में से आ्रा रही थीं। सोहणे शाह उन्हें देख रहा था अब्चे 'राजो? सत्तो? 'ऋदन-बहतल? करके उन दोलों से चिमट रहे थे |

फिर राजकर्णी ने कह्य--“पाकिस्तान |!

सब बच्चे उसके पीछे चिल्लाए:--“किन्दाबाद )”?

फिर सतम्राई ने कहा-- पाकिस्तान |?

सब बच्चे फिर घिल्‍्लाए:--जिन्दाबाद |?

आर इस प्रकार जो कोई भी गली में से ग्ुजरता, बच्चे उसे पकड़ लेते झौर उसे उस समय तक छोड़ते, .जत्र तक वह नारा लगा दे, चाहे वह व्यक्ति कोई सिक्ख हो, खाहे हिन्दू हो, चाहे मुसलमान हो | और बच्चे, बूढ़े, घुबक, स्त्रियाँ और पुरुष सब-के-सब हँसते हुए, बच्चों के 'इस खेल में शामिल होते रहते |

राजकर्णी और सतभराई दालान में आकर फिर खिलखिलाकर हँसने लगीं | उन दोनों की हँसी सारे गाँव में प्रसिद्ध थी | छोंटी-सीं बात पर यदि हँसना आस कर देतीं, तो ईँसती ही रहती, हँसती ही रहती--आमें-आशे,

श्द

दिन, आधी-आधी रात हँसती रहती चौधरी अल्लादिता ने तो श्राज श्राना ही नहीं था, पर लड़कियों का विचार था कि सोहणे शाह भी श्रभी तक नहीं लोदा था हँसतीं-हँसतीं दोनों सहेलियाँ गाने ल्वगीं--- डच्सियाँ कस्बियाँ डालियाँ, बिच शुअरी दी पींग वे माहिया | पींगर झुडेवे दो जणे-- आशिक ते माशूक वे माहिया पींग छुटें दे ढह पये, हो गये चकनाचूर वे साहिया और तेहरणें शाह लेदे-लेटे उनको गावे सुनता रहा ज्वाले की लड़की का विवाह था और उसने सोचा--दोनों वहीं से रही होंगी जब किसी विवाह वाले घर गीत आरम्भ होते, ये दोगों वहाँ जरूर गीत गाने के लिए जातीं और फिर कितनी-कितनी देर घर आकर भी रौनक किये रखती | कभी कोई तान छेड़ देती, कभी कोई गीत शुनगुनाने लंगतीं, लेकिन जब कमी गातीं, एक स्वर होकर गातीं ! सोहरणें शाह सोंचता कि राजकर्णी और सतभराई दोनों जवान हो गईं हैं, अब वह दोनों के ह्वाथ पीले कर देगा | श्रल्लादिता तो मल्ा श्रादमी था, उसने कभी इस बआत की चिन्ता नहीं की थी, ऊपर-तले दो बरातें बुलवाकर वह निश्चिन्त हो जाएगा। गली के पिछवाड़े बच्चे पाकिस्तान जिन्दाबाद” के नारे लगाए जा रहे थे। इस बार ताई 'पारो! उतके हत्थे घढ् गई--ताई पारो जो जगत-ताई थी, जो हर समय पुरुषों के समान लाटी लेकर चलती | मर्द, औरतें, बच्चे और बूढ़े सभी ताईं पारो से डरते थे | यदि किसी से नाराज हो जाती, तो भरे बाजार में खड़ी होकर उसे मन-मन-भर की गालियां देती, जिन्हें सनकर पुरुष भी धरती में गड़ जाते और अब जमकि बच्चों ने ताई पारों को घेर लिया था, तो जाने कहाँ से वह तपी हुई भरा रही थी, ,

१६

'पजे भाड़कर बच्चों के पीछे पड़ गई |

“उहरो तुम्हारी माँ का पाकिस्तान-जिन्दाबाद निकालूँ |? आगे- आगे बच्चे और पीछे-पीछे ताई पारो दूर गली का मोड़ मुड़ गए बच्चे शोर मचाते, हँसते और सहमे हुए, निरन्तर भागते जाते, पीछे-पीछे पारों पाकिस्तान को लाख-लाख गालियों देती हुई लाठी घुमाती दौड़ती गई

सोहणे शाह ने सोचा कि वह अवकाश के समय पारों को समका देगा कि वह पाकिस्तान के बारे मेँ इस प्रकार हँसी उड़ाया करे, कहीं बात का बतंगड़ ही बन जाए, | उसने सुन्र रखा था कि शहर में इसी प्रकार हँसी-मजाक में लोगों ने बैर मोल ले लिया था।

सामने गली में फ़िर पारो हाँपती हुई गालियाँ देती श्रा रही थी। सके पीछे-पीछे बच्चे शोर मचाते हुए, परों को चिढ़! रहे थे

राजकर्णी और सतभराई ने इतने में एक और गीत छेड़ द्या--

निक्‍का मोटा बाजरा साही बे, मेढा क्ौन चरेसि ढोला !

भूखे-प्यासे सोहरे शाह की लेगे-लेटे आँख लग गई--

“यदि अ्रब्बा बाहर गया हुआ हो तो चचा भी जहाँ तक बस चलता है, घर नहीं आते |” सतभराई ने कहदा--

“कहीं झ्राकर ताऊ को लाने चले गए हों !” राजकर्णी सोचती |

* अभी-अभी सोते हुए सोहरे शाह ने सपने में देखा कि नेजों, छवियों,

बर्षों और बेलचों से भरे हुए छकड़े घावनी की ओ्रोर जा रहे थे और ठेकेदार को उनके बदले मैं सरकार की ओर से बन्दूफों, पिल्तौलों और राइफलों से भरे हुए, ट्रक मिल रहे थे ।' ' और फिर बन्दूकें घलने लगीं, राइफलें श्राग उगलने लगीं श्रातिशश्राजी-सी छूट रही थी, अनार छूद रहे ये, गोले फट रहे थे; ढोलक, चिमदे और शहनाइयोँ बज रही थीं। एक सौ एक घुड़- सवारों की सतभराई और राजकर्णीं की बरात रही थी। मुण्ेरों पर से फूल बरसाए जा रहे थे, रोशनी से सारा गाव जगमगा रहा था--दीपमाला 'के दिन सोहणे शाह अमृतसर के दरबार साहब में तीर्थयात्रा पर गया)

च्‌्ठ

कितनी जगमगाहट थी वहाँ | किस प्रकार भीड़ थी वहाँ | कब्मेत्से-कन्धा' छिल रहा था और इस कोलाहल् में राजकर्णी सोहरे शाह से कहाँ 'बिछुड़ गई ***** सोहरे शाह पसीने-पसीने हुआ चौंककर उठ खड़ा हुआ राजकर्णी उसे जगा रही थी--“हम तो नीचे बैठीं श्रापफी राह देख रही थीं |” राजकर्णी ने शिकायत की | और सोहणे शाह अपने-आप को सँभालकर उसके साथ खाना खाने के लिए. नीचे उतर आया। दालान में बैठी सतभराई ने सोहणें शाह को सलाम किया “सलाम वेटी”--सोहरणे शाह ने इतना कहा और चारपाई' पर उसके पास जा बैठा | सोहणे शाह ने देखा कि राजकर्णी और सतमराई के हुपट्टो एक ही रंग के थे, एक ही कपड़े के दो सूट उन्होंने पहने हुए. थे, एक ही से बेल-बूटे एक ही से फूल--बरिल्कुल एक ही ता उनका डीलडौल था--एक को छिपा दो और दूसरी को दिंखा वो | सतमभराई आयु में चाहे तनिक छोटी थी, किन्तु मुतलमान जर्मीदार की' ब्रेटी डीलडौल में राजकर्णी फे बरातर पहुँच खुकी थी “अल्लादिता सवेरे ग्रा जाएगा,” ततभराई को खुप देखकर सोहरे शाह ने उसे बताया, और फिर बह दोनों से दिन-भर की बालें करने लगा। ज्वाले जमादार की बेटी की थषार्ते होती रहीं--अपने विवाह पर श्राप गीत गाती थी | क्‍या मजाल जो कभी सिर पर आँचल रक्‍खे | हर घड़ी कुब-त-कुछ बोलती रहती, पुरुषों और स्त्रियों को तड़ाक-पड़ाक जवाब द्रेती सोहरणे शाह ने बताया कि ज्वाल्मासिंह एक बहुत बड़ा श्रफ़तर था और अब पेन्शन लेकर अपने साँव में आया था | उसकी बेटी ने गाँव के बाहर ही जन्म लिया, शहरों में उसका पालन-पोधरण हुआ; इसलिए अगर उसकी ये बातें उन्हें श्रजीत-ली लगती थीं तो इसमें उत्त बेचारी का अधिक दोष नहीं था।

सतभराई कहती--“चाचा, मैं भी पढ़ें गी [?

और सोहणे शाह लाड़ से कहता--“तू पढ़ने वाली बन, मैं सवेरे ही इन्तजाम किये देता हूँ |?

और फिर सतमराई छोटी-छोटी फ़रमाइशें करती रही--भुझे शहर से यह ला दो, वह ला दो, मैने ऊँची एड़ी वाली ज्ुती श्रमी तक नहीं पहनी | ज्याले जमादार की बेटी काली ठंडी ऐनक लगाती है |” कभी सतभराई कहतती--/उसे ऐज़क चहुत अच्छी लगती हे,” कभी कहती - “ऐनक भी क्या लगाने की चीज है |? और फिर ज्वाले की बेदी का रंग तो सांवला था, राजकर्णों की राय में सतमराई के चेहरे पर काले फेम वाली ऐनक बहुत अली मालूम हीगी।

सोहणे शाह सोचता कि अन्रकी बार वह शहर गया, तो कचहरी से लौटते हुए उसकी मँँगवाई हुई एक-एक चीज़ वह ला देगा |

और फिर सतमराई ने और ऑँचल फैलाया, कहने लगी कि उन्हें सिनेमा देखे बड़ी देर हो चुकी है | और सुनने में रहा था कि छावनी में उन दिनों एक बहुत अच्छी फ़िल्म लगी हुई थी | इस बात में राजकर्णी भी उसकी हाँ-में-हाँ मिला रही थी। सोहणें शाह वचन दिये जाता, दिये जाता, उसे कभी इतना साइस नहीं हुआ था कि वह सतमराई श्र राजकर्णी की इच्छाओं को पूरा करने से इन्कार कर दे |

चौधरी अल्लादिता की और बात थी जीवन के बारे में उसका दृष्टिकोण बड़ा कठोर था। जहाँ तक बस चलता, वह किसी बात पर समभौोता करता आज सोदणे शाह अकेला लड़कियों के हत्थे चढ़ गया था, उन्होंने 'जी भरके उससे वचन लिये |

आर सोहरणे शाह अपने वनों से ट्लने वाला इन्सान नहीं था|

रे

सोहर्ण शाह की अभी आँख लगी ही थी कि किसी ने ब्योढ़ी का दरबाजा खत्खटाना शुरू कर दिया।

बह उठा भाई और पलंग पर राजकर्णी और क्षतमराई बेसुध सोई पड़ी थीं।

सोहणे शाह बाहर चला गया---

गाँव के तीन मुसलमान और दो सिक्‍्ख नवयुवक श्रायें थे। उन्होंने चौधरी सोहणे शाह से सारा हाल कह सुनाया--

अगले दिन पोठोहार में चारों श्रोर आ्राग भड़कने वाली थी। इर हिन्दू! और सिकख को मारा जाना था, उनकी स्रम्पत्ति को फँका जाना था., उनके गुरुद्वारों और मन्दिरों में गोहत्या की जाने वाली थी, उनकी पत्नियों और बेटियों का सती भंग किया जाने वाला था |

अत्पेक मुसलमान नेजे, छु्ी, वेलवे, बच्चें और बन्दूक से लेस किया था चुका था। दर मुसल्लमान से मस्जिद में ले जाकर कसम उठवाई यई थी,

लोगों ने कृषनशरीफ़ आँखों से लगाकर प्रतिश की थी। पीरों ने, मौलवियों ने, सैयदों ने घर-वर घुप्कर यह आदेश दिया था कि कोई हिन्दू-सिक्‍्ख जीवित नहीं बचना ज्ाहिए.।

रावशपिण्डी की “जामा मस्जिद! से यह फरमान जारी हुआ था कि हिन्दुओं और सिकखों की औरतों को मुसलमान बना लेगा सब्राब है; काफ़िरों की जायदाद लूटने वाले के पास ही रहेगी; काफ़िरों के जितने कोई सिर उतारेगा, उसके उतने ही गुनाह कथ जाएँगे; कम-से-कम्त छु काफ़िरों को पौत के घाट उतारने वाला सीधा जन्नत में जाएगा; वे बच्चों को कत्ल करें, बूढ़े बूढ़ों का गला दबाएँ, जवान जवानों का खूत करें, सिफे हिन्दुओं और सिक्खों की दूध-मक्खन पर पली हुई पोटोहारनों को बिल्कुल छेड़ा जाए---वे तो हलाके की रौनक हैं !

श्रगले दिन हजारे! की श्रोर से पठानों ने भी पहुँच जाना था, 'छछ? के छु।-छः फुट ऊँचे युवकों ने देहात के गिद॑ घेरा डाल देना था | प्रत्येक पड़ोसी के लिए, पड़ोसी की छुरी चमक उठनी थी।

ट्रक वालों की पता था कि उन्होंने ट्रक कहाँ ले जाने थे, ँट वाले जानते थे कि उन्हें कहाँ-कहाँ पहुँचना है, बकड़े वालों फो शान था कि छुकड़े में कौन-सा सामान कहाँ ते जाना है |

यह भी निर्णय हो चुका था कि कौन लोग कहाँ जाकर दूट पड़ेंगे पहले हमला किस ओर से आरम्भ किया जायगा, किस-किस घर को श्राग लगानी है, किस-किस को बचाना है |

मीरासियों ने ढोल पीटने थे, शहनाइयाँ बज़ानी थीं। जिन्हें बन्वूक चलानी नहीं आ्राती थी उन्होंने नेज़ों और चवियों से लड़ना था | जो दिल के जरा कमजोर थे, उन्होंने मिट्टी के तेल और पेट्रोल के कनस्तर उठाए रखने थे और जब मैठान साफ हो, तो आंग लगानी थी। क़साइयों को तैयार किया गया था कि वे तेल के कड़ाह बच्चों को तलने के लिए तैयार रखें, आग के अला। में बूढ़ों को भूनें और हठीली स्त्रियों को गली में बृंकूण. लब्काएँ |

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प्रत्येक गाँव का चित्र तैयार हो खुका था प्रत्येक गाँव के निवासियों के नामों की सूची तैयार हो चुकी थी इस बात का भेद भी लगा लिया गया था कि गाँव में किस-किंस व्यक्ति के पास कौन-कौन-सा शस्त्र है, और जिरहँ पहले ही हल्ले में समाप्त कर देना था, उनके नाम अलग लिख लिए, गए. थे |

हिन्दुओं ने मुसलमानों के सांथ त्रिहार में भी बिल्कुल ऐसा ही किया था, और पोगेहार के मुतलमानों ने फैसला कर लिया था कि वे एक-एक खून का बदला दस-दस जनों से लेंगे कोई किसी के रोकने पर रुकने बाला नहीं था, वोई किसी के हटाने पर हटने वाला नहीं था | जो लड़ने-मरने के लिए, तैयार नही थे उनके नाम आदेश जारी किये गए थे कि वे इधर-उधर हो जाएँ इस्लाम पहले ही खतरे में था, इसलिए अंत्र और बाधीं डाले !

*' ओर सोहणे शाह ने सोचा--जमी शायद अ्ल्लादित्ता तीन दिन से बाहर गया हुआ था; इस विंचार के आते ही वह दृका-अका खड़ा सिर हिलाने ज्ञगा |

सोहरों शाह के हाथ-पाँव सुन्न हो गए,। उसके शरीर से जैसे सारे-का- सारा लहू छिंचा जा रहा था, उसका सिर कितनी देर तक हिलता रहा,--- आखिर दरवाजे का सहारा लेकर वह देहल्ी पर बैठ गया ।'

वे पाँचों युवक बोलते जा रहे थे--

धमियाल के मुसलमान रजवाड़ों ने वचन दिया था कि बह किसी रे कुछ नहीं कहेगे, बल्कि उन्होने तो किसी को छावनी मिजया ' दिया था कि बह ट्रकों का प्रबन्ध कर आए ताकि उस गाँव के बच्चे-बच्चे को शहर पहुँचा दिया जाय |

“तोहणे शाह, तू किस सोच में गुम हो गया है | यदि हमारे जिस्म में जान हुई तो कोई तेरा बाल भी बॉका नहीं कर सकेगा--” मुसलमान शुंबककों ने बार-बार वचन दिया |

निर्णय यह हुआ कि उस घड़ी के बाद कोई भी गाँव की सीमा से बाहर

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निकले | गाँव के बाहर जाने वालों की जिम्मेदारी कोई मी नहीं लेगा-- बाहर के लोग किसी के वश में नहीं थे।

चौधरी ने आखिर यह सुझाव दिया कि घर-घर घूम-घूसक्र यह बात सबको बताई जाय ! बिशेष रूप से जो लोग किले में काम करते थे, उन्हें यह बताया जाना बहुत जरूरी था। चौधरी ने बहुतों का नाप्त ले-लेकर बताया, बेचारों के पृस साइकलें नहीं थीं और मे ह-अँयेरे ही घर से निकल जाया करते थे

सुनते ही लोगों ने सामान धाँधना आरम्भ कर दिया, सारे गाँव में कुहराम मच गया | भरे कमरे देखकर किसी की समर में यह' बात आती कि क्या खले और क्या छोड़े | नवयुवतियाँ अन्दर चीणती फिरती, माता- की मक्षरों में जाने क्या-क्या कुछ लिखा हुआ देखती | धरती जगह नहीं दे रही थी कि बे उसमें समा जाएँ कोई सोचती--मैं कुएँ में कूद जाऊँगी; कोई सोचती--मैं चौबारे पर चढ़कर नीचे छलांग लगा वूँगी। किसी ने कह्दी से अफीम निकाल ली, किसी ने संखिया हूँ ढ़ लिया, कोई अपने आई से आग्रह करती और कोई पिता से विनय करती कि वे अपने हाथों से उनका” गला धौट दे | कोई मिट्टी का तेल सैभालकर रखती; कई कहती कि हम एक-दो को मारकर मरे और तीन फुट की कृपाणों की धार बार- बार तैज़ करतीं |

जवान लड़कों ने पत्थरों के ढेर अपने कोठों पर इकछ्ले कर लिये, पोठो- हार की नोकदार और ईस्पात-ऐसी कणेर चट्लानों के पत्थर | बन्दूक बालों ने बारूदः इकबट्ठी करनी प्रारम्भ कर दी, तलबारों को चमकाया जाने लगा, छुरों को रगड़ा जाने ल्गा। बूढ़ों और बच्चों ने चाकू और छुरियां संधाल कीं,

पंचकल्याणी मैंसे अपने मालिफों को विकल देखकर घार-बार डकारतीं; हल घचलाने वाले हलों के गले लग-लगकर रोते। कुत्ते चैन लेने देते | बार-बार गली मैं दौड़-दौड़कर ज़ाते। बार-बार दालान मे आकर प्रत्येक के कपड़े सँँजते | अनाज से भरी. हुई कोदरियाँ देख-देखकर ज्मींदारों के

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दिल में टीस उठती | पोठोहार के छले दालान, दालानों में “धरेके! की छाया, वेरियों के लाल-सुर्ख बेर, लोग सोचते कि वे क्यौंकर उन वस्तुओं को छोड़ सकेंगे है

सोहरो शाह बार-ब्रार अफसोस. से हाथ मलता, वार-ब्रार सोचता-- इस उम्र में मुझे यह आँबेर भी देखना था--जहाना, जुष्मां, फत्ता, सैदन, ममदू', मारनूँ, दीना, शरफू--सत्र उसे कत्ल करने के लिए. श्राएँगे |

सामने के पलंग पर राजकर्णी और सतमराई सोई पड़ी थी, गहरी सोई पड़ी थीं, अल्हड़ यौवन की मदमाती नींद | तारों के मन्द-मन्द आलोक में उसे इतना भी पता नहीं चलता था कि कौन कहाँ सोई पड़ी है। सोहणे शाह तो तमाम उमर कभी उनमें कोई श्रन्तर तही कर सका थां। कई बार उसे राजकर्णी को आवाज़ देनी होती तो उसके मुँह से सतमराई का नाम निकल जाता; और कई वार जब वह सतभराईं को बुला रहा होता, तो राजकर्णी-राजकर्णी पुकारता रहता और राजकर्णी पास ही बैठी खिल- खिलाकर हँसती रहती | सोहणे शाह सोचता--चौधरी अल्ला दित्ता अवश्य पहुँच जाएगा, अगले दिन का उसका वचन था और जीवन मैं आज तक उसने अपना वचन भंग नहीं किया था )

लेकिन वे पाँच नवयुवक् जाने छससे क्या कह गए थे | अल्ला- दित्ता से भी प्रतिशञ लेने को कहा गया होगा, उसके सिर पर भी कुरान शरीफ रखा गया होगा, उसे भी पाकिस्तान का वास्ता दिया गया होगा। उसे भी बाहर की धटनाएँ सुना-सुनाकर उकसाया गया होगा और अल्ला- दित्ता अपनी बेटी को भी छोड़कर चला गया तो !

पलंग पर गहरी नींद में सोई हुई दो लड़कियों में से एक ने करबट बदली एक भुजा ऊपर उठी और दूसरी ओर जा पड़ी सोहरे शाह ने अनुभव किया, जैसे कोई इस इन्तजार में, हो, कि उसकी आँख /लगे या इधर-उधर हो, तो वह दौड़कर सामने के बिंरोंधी दल में शामिल हो जाए |

सोहरोें शाह की दादी ने उसे बताया था कि सिक्‍खों के रा्य के अन्त में किस अकार भगदड़ मची थी और वे लोग गुजरात से भागकर ह॒ध्र

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गए थे | पहले आकर वे 'सुक्खों? में रहे, फिर उसकी ननद ने उन्हें यहाँ बुला लिया और यहीं सोहरेशाह की सम्पत्रि, बढ़ती रही और अत वह गाँव का वोचरी बन गया था। तोहणे शाह के पिता ने उसे गाँव में दिन-रात परिश्रम किया | सोहरणे शाह का दादा खच्चरों श्रौर गधों पर शुद्ध धी पुँछठ से लादकर लाया करवा था; और सर्दियों में जब सड़कें बन्द हो जाया करती थीं, तो ई० और बजरी जैसी पस्तुएँ एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया करता धा। और इत प्रकार कौड़ी-कौड़ी जोड़कर उसमे अपने लिये एक भोंपड़ी बनाली थी।॥ सोहरे शाह का पिता ढुकानदार था, साथ-ही-साथ साहूकारा भी किया करता, खेती-बाड़ी में भी हाथ पाँव मारता रहत्ता, खड़ी फसल का ठेका ले लेता, दोर-इंगर सस्ते दामों खरीद लेता और पिंडी की मश्डी मैं जा बेचता जो रावलपिंडी की मण्डी से मोल लेता, उन्हें 'गोलड़े! की मण्डी में जा बेचता ( आर इस ग्रकार कई पापड़ बेलकर सोहणेशाह के पिता ने अपने ठौर- ठिकाने को और भी दृढ़ कर लिया था जब उसने दुकान मोल ले ली, तो गाँव में उसका थीड़ा-बहुत सम्मान होने लगा। और फिर जब सोहस़े शाह की बारी" आई तो पहले उसने सोचा कि पटवारी बने; किन्तु वह अपने काम में कुछ इस प्रकार उलभ गया कि वह किसी दूसरी ओर ध्यान दे सका | उसके पिता ने कई काम छेड़ रखे थे, फिर उसने अपने पिता से भी अधिक परिश्रम किया | परिश्रम के साथ-साथ लोगों की सेवाएँ, भी बढ़- पक्षकर थीं | सारा अदेश 'सोहरणे शाह” 'सोहरोशाह” का गुशगान करने लगा--और बह गाँव का चौधरी बन गया | जब पुराना सरपंच चल बसा, तो हर कोई--क्या मुसलमान, क्‍या हिन्दू, कया सिख यही कहने लगा कि अग्र की बारी सोहरणे शाह की थी | ' सोहरे शाह ने पंचायती गशुरुद्धारे का नव-निर्माण किया, संगमरमर का फर्श लगवोया दीवारों को ४इलों से सुसज्जित किया सोहणे शाह ने प्रौपाल की खानकाह की मरम्मत करवाई, तकिये को पक्का कर दिया, गली- भुहह्ले में सफाई का प्रबन्ध किया

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जहाँ तक बस चलता, लोग सोहरे शाह का कहा ठालते; चाहे भाड़ा सिक्‍्तों में हो, चाहे झगड़ा मुसलमानों में हो, वादे भगड़ा सिकखों और मुसलमानों में हो | गाँव के मुतलमानों में दो घड़े बने हुए थे, यह पार्दीवाजी देर से चल्ली रही थी | कई वार उनका आपस में मंगड़ा हो जाता--सोहणे शाह बीच में पड़कर कगड़ा निपट दिया करता | एक बार तो उन्होंने परस्पर गोलियाँ भी चलाई, किन्ठ सोहणे शाह के सामने सिर उठा सके और मामला थाने तक जा सका। पुलिस वालों ने लाख सिर पठका कि वे उस भाड़े के बारे में पर्चा लिखवा दें, लेकिन गाँव बालों में से किसो एक ने भी आकर शिकायत की जिसने जाकर शिका- अत की थी, उसका मुंह काला करके गली-गली उसे घुमाया गया |

अभी तो पिछले सप्ताह एक भगड़ा हुआ था। श्रल्ला दित्ता की राय में सिकल्न ठीक कहते थे और उन्होंने जो कुछ किया था बह उच्बित था। परस्ु सोहरोशाह की सम्मति में सारा दोष सिक्‍खों का ही था। कितती देर तक उनकी सम्म में श्राया कि किस पक्के को अच्छा कहें और क्रितकों बुरा पाँचवे गुरु, गुद अजुनदेव के पिछले शुरु-पत्र पर राशन की चीनी मुसलमानों ने इकट्ठी कर-करके सिक्ख-पड़ोसियों के लिए शर्त की व्याऊ लगाई थी और गली-गली जाकर उन्हें ठए्डा शर्वत पिल्लाया था | सिकल्न और दिखू! भी ईद के दिन गलियां शीशे की तरह चमकाकर रखते ओर अपने पड़ोसियों के धर मिठाई मिजवाते |

यदि किसी मुसलमान को मुर्गा हलाल करना होता, तो चोरी-छिपे एक़ान्त में वे उसे इलाल करते; और यदि किसी सिकख को बकरा ऋटकाना होता, तो भीतर दूर अपनी कोठरी में ऐसा करता ताकि पड़ोसी उसका बुरा न. गाते,

सोहणेशाह सोचता--जैसे मुसलमान कहते हैं, यदि हिलू और सिक्खों को मार दिया गया, उन्हें यहाँ से भग्रा दिया गया तो फिर ये दुकानें कौन चलाएगा ! जायें और किसानों को कर्षा' कौन देगा, उनकी चिह्षियाँ कौन लिखेगा ! जब ये ग्रापस में लड़ पड़ेंगे, तो कौन समभौता-कराएंगा ! उनके

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दिलों में तो इतना जहर था कि एक-दूसरे को मार डालेंगे, बरबाद कर देंगे।

सामने वि हुए पलंगों में से एक पर फिर हलचल हुईं | फिर एक भ्ुजा उठी और दूसरी ओर जा पड़ी--एक गोरी शुजा--और सोहरेशाह उठकर देखने लगा कि किपकी नींद उच्चाट हो रही थी !

अगले दिन राजकर्णों ने देखा कि सतमराई कोटठे पर जाकर बार-बार शूड़ियाँ उठ|-उठाकर अपने अब्या की बाठ देख रही थी, किन्तु वह कहीं भी दिलाई नहीं दे रहा था! सबेरा दिन में बदल गया और पीले रंग की धूप फैलने लगी

सारे गाँव में कोलाइल मचा हुआ था। सोहणे शाह के गले लग-लग- कर लोग रोते, कई उसे एक और ले जाकर कानाफूसी करते हाथ मलतीं और छाती पीठती स्थियाँ, सहमे ओर घरराये हुए. बच्चे, वे युवक जो साहस तोड़ चुके थे, हलवाई जिनका आज बाहर से दूध नहीं श्राया था, कु जड़े ज़िमकी, आज़, बाहर, से. सहज, नहीं, आई थी---सभी. एक-ढपरे, का. मद. ताक. रहे थे। डाकिये के आने का तमय हो चुका था, वह डाक देने आया और वह डाक लेने आया |

सड़क, जिस पर लोग चींटियों के समान घलते, सुनसान पड़ी थी। पिछली रात को जंगली कुत्तों ने मरे हुए बचुड़े का पिंजर घसीट-घसीयकर

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सड़क के बीच ला फेंका था और वह वैसे-का-बैसा सड़क पर पड़ा था।

गली-गली घूमते सोहणेशाह को पता चला कि हस्नामे लीखल का लड़का घसन्ता और बड़े गुरुद्वारे के 'भाई” का लड़का पंजू किसी के रोकने पर रुके नहीं थे और सूँह-अन्धेरे ही किले में अपने काम पर जा चुके थे। जो कोई उन्हें समभाता, वे उतकी खिल्ली उड़ाते उन्होंने चौधरी के सन्देश की भी परवाह नहीं की थी। उ्सन्‍्ता तो 'सुखमणी साइब |? का पाठ ही करता रहा, किसी के प्रश्न का कोई उत्तर देता; बस इतना कर्ता-कभी- कमी हँस देता और नियमाजुसार प।ठ करता हुआ लोगों के देखते-देखते चला गया। लेकिन पंजू आज अपने साथ तलवार ले गया था; यदि उसे कोई सममभाता तो बार-बार म्यान पर हाथ रख-रखकर तलवार बाहर खींचता और अपने पद्चों को दिखाता।

“क्या हमने कंगन पहने हुए हैं ! क्या मैं कोई औरत हूँ जो कोई मुझ पर हाथ डाल देगा ? यदि कोई मेरी तलवार के आगे खड़ा इआ तो' * '? आर बह इस प्रकार बोलता हुआ चला गया |

किले की सीटियाँ चीखती रहीं, किन्तु और कोई घर से निकला | पैदल चलने वालों के लिए सीटियाँ बज चुकीं, तो साइकलों पर आने वालों के लिये सीटियाँ बनी आरम्भ हुईं अत्येक पद्दढ सिरटों के बाद तरइ- तरह की सीटियाँ लोगों को पुकारती रहीं, पुकारती रहीं '्वीज-चीखकर जैसे उनका गला बैठ गया हो, किन्तु और किसी ने उधर जाने का नाम नहीं लिया |

सोहणेशाह का जी चाहा कि पिछवाड़े की ओर जाकर मुसलमानों के मुहल्लों का चबकर लगाएं, किन्तु जाने क्यों उसके पाँव उस ओर नहीं उठ रहे थे। कई वार चह बढ़ा पर विचारधाराओं के भपेढ़े खाता लौट आया।

राजक़॒र्णी हैरान थी--चौधरी अ्रल्लादित्ता अभी तक नहीं आया था। सतभराई के द्वृदय में खलबली मची हुई थी, चौधरी अल्लादिता यूँ क्रमी '

“बाहर नहीं रहा करता था।

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फिर एक्राएक गाँव के बाहर निगरानी करने वाले स्वयंसेवकों ने कोला- इल मचा दिया--

फिसादी रहे थे--दूर क्षितिज के पास से--8ल्‍्ले अड्डियाले! की और से ढोल पीटे जाने की धीमी श्रावाज्ञ कानों में पड़ रही थी | श्रतगिनत हुँ चींटियों के समान चलते हुए सामने,दिखाई दे रहे ये हर घड़ी ढोल पीटे जानें की आवाजें दँल्‍वी हो रही थीं | तुर्रे और साफ दिखाई देने लगे सारे-कै-सारे गाँव में कुहराम मच गया। कई सोचते कि बाहर वदी में जाकर छिप जाएँ, कई कहते कि पंचायती गुरद्वारे मैं गुर के चरणों पर जा गिर, कई कहते---प्रस्येक व्यक्ति अपनी-अपनी गली में लड़े; अपने घर में या सार दे या मर जाय; कई कहते--चौधरी सोहरेशाह के चौबारे पर सभी इक हो जाएँ, मुसलमान पड़ोसियों की भी यही राय थी। थे छोचते--यहि फिसादी बिल्कुल माने तो बेशक गाँव को लूट लें, यदि उनकी यही घारणा हुईं तो नेशवौ गली-गली घर-घर को जलाकर भस्म कर दें,' किन्ठ 'धमियाल/ के किसी प्राणी पर वे हाथ नहीं उठने देंगे

"ूझर खौंएँ थे लोग--”

“ऐसी लूट कभी सुनने में नहीं आई---[!?

“मैं कहती हूँ कि क्या उन्हें अल्ला का कोई डर नहीं !?

“यह साली सरकार कहाँ गई--आज तो चाँदमारी भी नहीं हो रही १!

राजकर्णी और सतभराई ऊपर कोठे पर खड़ीं कभी फिसादियों की ओर देखती और कभी उनके तुररों की ओर, कमी दुंसरी तरफ बार-बार रावलपिण्डी की ओर छावनी के बंगलों को देखती, हवाई जहाजों के श्रैंडे पर ऊँचे उड़ते हुए, सरकारी रूणडे की ओर देखती, और देख-देखकर उतकी सप्तम से नहीं थ्रा रहा था कि यह क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है, किसलिये हो रह्म है !

दित्ता बढ़ई कितनी देर तक अपने हृथियारों की ओर देखता रहा, बाहर खेलते हुए. अपने बच्चे की ओर देखता रहा, बड़े कमरे में लगाए हुए, नये फूलदार दरवाजे की ओर देखता रहा, देखते-देखते उसकी दाई' भुजा कुछ

रे

इस प्रकार दुखने लगी जैसे वह दिन-भर विसोसा चलातो रहा हो |

सुन्दर सुनार और उसकी पत्नी, घाहर एक हवेली में कितनी देर तक गतका खेला करते थे। सुन्दर, माप्टर तारासिह का बहुत भक्त था, और आज से छः महीने पहले जब मास्टर जी 'धमियाल” अपने ससुराल, किसी विवाह के अवसर पर आये तो उन्होंने सबको बुलाकर ,खकरदार कर दिया था--“लोगों [ या तो शहरों मैं चले जाओ्रो, देहात को छोड़ दो; या अगर गाँवों में रहना है तो अ्रपने-आपको मज़बूत बनाओ, अपने घरों के गिर्द मोर्चे बनाक्नो, चारदीवारियाँ बनाओ, तलवारें रक्लो, कृपाएोँ और गतके का प्रयोग सीखो, नहीं तो तुप्त कहीं हूँ ढ़ने पर भी दिखाई दोगे, पोटोहारियों | तुम्हारा भामोनिशान तक प्रिठ जायगां, मुझे आ्रॉँधी आती हुईं दिखाई दे रही है। मैं अश्ुभव करता हूँ कि तृफान यहीं से उठेगा खालसे की परीक्षा का सप्रय फिर रहा है ।?-ओऔऔर मास्टर जी आंधी रात तक हंन्दों के कोटे पर मिलने के लिए. आए हुए लोगों को सममभाते रहे |

अगली ग्रातः को मारटर जी के कह्दे अजुसार सुर्दर और उसकी पत्नी ने दूसरे बहुतों के साथ अमृत छक्रा, और उस दिन से ये दोनों गाँव से बाहर अपनी हवेली में गतका खेलने लगे

“मैं कहती थी, मास्टर हीरा है हीरा--|”

“मै कहती थी कि वन्ती के पति को हर बात का पता होता है |!”

५सेहरा बाँधकर हमारे पड़ोस में श्राया था, में कहती हूँ कि मास्टर- जी से तो गोरे भी कंस्नी कतराते हैं ।”

“अ्राज मास्टर! यदि: यहाँ होते. . शेरों के समान उनका चेहरा दमकता रहता है [ई.

#सैंशिए्फ्परी है पलटी, मेरी: भी; रहिली थी; ९?

सवेरे से सुन्दर की पता अपने पड़ोसियों से पागलों की माँति बातें कर रही थी, और अब उन्होंने निर्येण किया था' कि जिस प्रकार मास्टर जी' ने उनसे कहा था, वे उसी प्रकार करेंगे, तलवार खींचकर बादर निकरगे और शेरों की तरह जान दे देगे।

डे

फिर जैसे सव की जान-में-जान आगई बाहर बैठे हुए स्वयंसेवकों मे आकर सूचना दी कि फिसादी मोरगाह वाली सड़क पर मुड़ गए थे, ढोल की आवाज ने अपनी दिशा वदल ली थी, मंडे दाई और की सद्धक पर हो लिए थे।

“धमियाल? के मुतलमान पड़ोसी हँस-हँसकर कह रहें थे--/किंसी की क्या ताकत है कि धमियाल की ओर आँख उठाकर देख सके |”

“अभी लो हम कहें कि ये कहाँ की तैयारियाँ करके आए ९?

और यों जान पड़ता था, जेंसे लोगों की आ्राकृतियाँ फिर से हिलने. जुलने लगी थीं। पलक भाषकते में दुकानदारों ने दुकानें खोलनी आरम्भ कर दीं, चूल्हों से धुँझ्ा उठना शुरू होगया, लोग खाने-पकाने की फिक्र में लग गए, |

पुरुष कहीं-कहीं टोलियाँ बनाकर झुसर-फुसर करने लगे |

राजकर्णी और सतभराई अभी तक कोठे पर बैठी हुईं थीं, “चौतरे! की ओर से कोई भी नहीं झा रहा था। सामने की सड़क जिस पर लोग चींटियों के सप|न बलते रहते थे, खामोश थी | राजकर्एी और सतभराई के दिलों में कई प्रकार के बुरे विचार उठ रहे थे, कभी वे कुष सोचती और कभी कुछ |

वे इस तरह व्याकुल हो रहीं थीं कि उन्होंने देखा--छावनी वाली सड़क पर से फौजी लारी झा रही है, लारी गाँव में आकर रुकी खजान उप्पल के लिए उसके भाई ने दो फौजी सैनिक और एक लारी भेजी थी। उसके घर का जिस प्रकार भी सामान उस लारी मैं सकता था, उसने लाद लिया | पहले तो लोग चुपके-चुपके खजान को, गंगा देखते रहे, किन्तु जब दारोगा ने कहा कि उसकी जवान लड़की के बच्चा होने बाला है -और बह किसी प्रकार उसे शहर उसके चचा के घर तक ले जाएँ, अधिक- से-अधिक एक ट्रंक या शक बिस्तर उसे कम ले जाना पड़ेगा, लेकिन जब खजान ने अपनी श्आयु-भर की मिन्नता की उपेक्षा करते हुए इन्कार कर दिग्या तो लोग बहुत झ४् हुए फोजी-सैनिकों ने बताया कि छः मील की दूरीः परः

देश

'रावलपिंडी शहर में क्या हो रहा था--सारी रात गोली चलती रही थी, चारों श्र आग लगी हुई थी, सड़के लाशों से श्रटी पड़ी थीं और सरकार की समस में नही आरा रहा था कि वह क्‍या करे और क्‍या करे |

दारोगा की नौजवान लड़की के पहला बच्चा होने वाला था। गाँव में कोई धाय थी, कोई नस; और यह भी पता नहीं था कि वह “इस गाँव में कब तक रुके पड़े रहे। फिर भी खजान उप्पल को दया आई | दारोगा बार-बार दाँत पीसता--और जब लारी चलने लगी, तो वे लोग जो खड़े सब-कुछ देख रहे थे, उन्होंने खिल्ली उड़ानी आरम्भ कर दी

खजान का ट्रक तेज दौड़ता हुआ, दृष्टि से ओम हो गया |

लोगों को थोड़ा-बहुत जो ढाढ़स बँधा था वह खजान के जाने के चाद हूट गया। दुकानें फिर बन्द होनी आ्रारम्भ होगई, लोगों ने दोबारा वस्तुएँ सैंभालनी शुरू कर दीं, और जो बातें फौजी-सैनिक बता गए थे, वे सारी धीरे-धीरे गाँव में फैल गई हाथों में पकड़े हुए ग्रास वहीं-के-घही रह गए, गलियों में छाछ्ष बिलोए जाने का स्वर वहीं-फा-वहीं धम गया, तनूर तपते के तपते रह गए, स्त्रियाँ जहाँ कहीं भी थीं सिर पकड़कर बैठ गई पुरुष कभी सोचतें कि लड़ते-लड़ते मर जायँंगे, कभी कहते लड़ने का क्‍या लाभ | किसी की समझ में कुछ नहीं आता था कि क्‍या होगा, किस प्रकार होगा

सोहरोेशाह पिछले दो घंटों ते अपने बड़े कमरे मैं बेंसुध पड़ा था | कोठें पर बैठीं हुईं राजकर्णी और सतभराई सोच रहीं थीं कि वह शायद